भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 479 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 36

बाहिय ] १५ शास्ता ने यह धर्मदेशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय का कुबडा यह भिक्षु है। राजा आनन्द है। और पण्डित मन्त्री तो मैं ही हूँ। १०८. बाहिय जातक “सिक्खेय्य सिक्खितब्बानि...” को शास्ता ने वैशाली के आश्रित महावन की कूटागार शाला मे रहते समय एक लिच्छवि के सम्बन्ध से कहा। क. वर्तमान कथा वह लिच्छवि राजा श्रद्धाप्रसन्न था। उसने भिक्षुसंघ सहित बुद्ध को अपने घर निमन्त्रित कर महादान दिया। उसकी भार्या मोटी, सूजी हुई सी थी और उसको सलीके से रहने का शऊर नही था। शास्ता भोजनोपरान्त दानानुमोदन कर, विहार जा भिक्षुओ को उपदेश दे, गन्धकुटी में प्रविष्ट हुए। धर्मसभा मे भिक्षुओ ने बातचीत चलाई—'आयुष्मानो ! वह लिच्छवि-नरेश तो इतना सुन्दर है, लेकिन उसकी भार्या मोटी, सूजी हुई सी है तथा उसे सलीके से रहने का शऊर नहीं। राजा उसके साथ कैसे रहता है ?” शास्ता ने आकर पूछा— "भिक्षुओ ! इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?” "यह बातचीत" कहने पर शास्ता ने "भिक्षुओ ! न केवल अभी, किन्तु पहले भी यह मोटे शरीरवाली स्त्री के साथ ही रहता था" कह, उनके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा "पूर्व समय में वाराणसी में जब ब्रह्मदत्त राज्य करता था, उस समय बोधिसत्व उसके आमात्य थे। मुफस्सल की एक स्थूल शरीर स्त्री जिसे

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · पृष्ठ 36, कुल 479 में से · BharatKosha