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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय

बाहिय ] १५ शास्ता ने यह धर्मदेशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय का कुबडा यह भिक्षु है। राजा आनन्द है। और पण्डित मन्त्री तो मैं ही हूँ। १०८. बाहिय जातक “सिक्खेय्य सिक्खितब्बानि...” को शास्ता ने वैशाली के आश्रित महावन की कूटागार शाला मे रहते समय एक लिच्छवि के सम्बन्ध से कहा। क. वर्तमान कथा वह लिच्छवि राजा श्रद्धाप्रसन्न था। उसने भिक्षुसंघ सहित बुद्ध को अपने घर निमन्त्रित कर महादान दिया। उसकी भार्या मोटी, सूजी हुई सी थी और उसको सलीके से रहने का शऊर नही था। शास्ता भोजनोपरान्त दानानुमोदन कर, विहार जा भिक्षुओ को उपदेश दे, गन्धकुटी में प्रविष्ट हुए। धर्मसभा मे भिक्षुओ ने बातचीत चलाई—'आयुष्मानो ! वह लिच्छवि-नरेश तो इतना सुन्दर है, लेकिन उसकी भार्या मोटी, सूजी हुई सी है तथा उसे सलीके से रहने का शऊर नहीं। राजा उसके साथ कैसे रहता है ?” शास्ता ने आकर पूछा— "भिक्षुओ ! इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?” "यह बातचीत" कहने पर शास्ता ने "भिक्षुओ ! न केवल अभी, किन्तु पहले भी यह मोटे शरीरवाली स्त्री के साथ ही रहता था" कह, उनके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा "पूर्व समय में वाराणसी में जब ब्रह्मदत्त राज्य करता था, उस समय बोधिसत्व उसके आमात्य थे। मुफस्सल की एक स्थूल शरीर स्त्री जिसे

१६ [ १.११.१०८

सलीक़ा नही था, मजदूरी करती थी। राजाङ्गन से थोड़ी दूर पर जाते हुए उसे शौच की हाजत हुई। जो वस्त्र पहने हुए थी, उसी से शरीर को ढक कर बैठ गई और हाजत रफ़ा कर तुरन्त उठ खड़ी हुई। झरोखे से राजाङ्गण देखते हुए वाराणसी राजा की उस पर नजर पड़ी। वह सोचने लगा—"इस प्रकार के (खुले) प्राङ्गन में बिना लज्जा को छोड़े वस्त्र से ढके ही ढके, शौच फिरकर यह जल्दी से खड़ी हो गई। यह निरोग होगी। इसकी कोख अति परिशुद्ध होगी। परिशुद्ध-कोख से उत्पन्न हुआ पुत्र भी अति पवित्र तथा पुण्यवान् होगा। मुझे चाहिए कि मैं इसे अपनी पटरानी बनाऊँ।"

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय के

कुण्डकपूव ] १७ इस प्रकार बोधिसत्व ने सीखनेयोग्य शिल्पो (के सीखने) का माहात्म्य कहा। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय के पति-पत्नी ही अब के पति-पत्नी। पण्डित अमात्य तो मैं ही था। १०६. कुण्डकपूव जातक “ययन्नो पुरिसो होति” यह शास्ता ने श्रावस्ती में रहते समय, एक महा दरिद्र (मनुष्य) के सम्बन्ध से कही। क. वर्तमान कथा श्रावस्ती म कभी एक ही परिवार बुद्ध तथा उनके सघ को दान देता, कभी तीन चार परिवार एक मे मिलकर, कभी एक गण, कभी एक गली के लोग, कभी सारे नगर के लोग मिलकर। उस समय एक गली के लोग मिलकर दान दे रहे थे। मनुष्य बुद्ध तथा सघ को यवागु परोसकर कहने लगे “खाजा लाभो।” उस गली में रहनेवाले, दूसरो की मजदूरी करके जीनेवाल, एक दरिद्र मनुष्य ने सोचा—"में यवागू नही दे सकता। खाजा दूँगा।" (यह सोच) उसने चावल की बहुत बारीक कनखी ले, छाज से फटक कर पानी से भिगो, आक के पत्तो में रख, भाग मे पकाया। फिर 'यह बुद्ध को दूंगा' सोच उसे ले जाकर शास्ता के सामने खडा हुआ। (लोगो ने) 'खाजा लाभो' पहली बार कहा ही था कि उसने सबसे पहले जाकर शास्ता के सामने वह पूडा रख दिया। शास्ता ने औरो के दिये हुए खाजो को अस्वीकार कर उसी पूडे-खाजे को ग्रहण किया। उसी समय सारे नगर में एक शोर मच गया कि सम्यक् सम्बुद्ध ने उस महादरिद्र का खाना बिना घृणा के खाया। २

१८ [ १.११.१०६ राजा, राजा के महामन्त्री आदि, और तो और द्वारपाल तक आकर शास्ता को प्रणाम कर उस महादरिद्री से कहने लगे—"भो ! सौ लेकर, दो सौ लेकर या पांच सौ लेकर हमारा भी हिस्सा रक्खो ।" उसने 'शास्ता से पूछकर जाऊंगा' सोच शास्ता के पास जाकर यह बात कही । शास्ता ने उत्तर दिया "धन लेकर या बिना लिये जैसे भी हो सब प्राणियो को हिस्सेदार बनाओ । उसने धन लेना प्रारम्भ किया। मनुष्यो ने दुगुना, चौगुना, आठ गुना आदि दे देकर नौ करोड सोना दिया । शास्ता दानानुमोदन कर विहार चले गये । फिर भिक्षुओं के अपना अपना कर्त्तव्य करने पर शास्ता ने उन्हें उपदेश दे गन्धकुटी मे प्रवेश किया । शाम को राजा ने उस महादरिद्री को बुलवाया और श्रेष्ठी बना उसका सत्कार किया। धर्म-सभा मे भिक्षुओ ने बातचीत चलाई—"आयुष्मानो ! महान् दरिद्री के दिये हुए पूए, शास्ता ने बिना घृणा प्रगट किये ऐसे खाये जैसे अमृत । महान् दरिद्री भी बहुत सा धन और सेठ का पद प्राप्त कर बहुत सम्पत्तिशाली हो गया । शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ ! बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "अमुक बातचीत" कहने पर 'भिक्षुओ ! न केवल अभी मैने बिना घृणा दिखाये उसके पूए खाये बल्कि पहले जब मै वृक्ष-देवता था तब भी खाये थे" कह पूर्व-जन्म की कथा कही—

ख. अतीत कथा

पूर्व समय म वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य के समय बोधिसत्व अरण्डी के एक वृक्ष पर वृक्ष-देवता होकर पैदा हुए । उस गांवडे के मनुष्य तब देवता- विश्वासी¹ थे । एक त्योहार आने पर उन्होने अपने अपने वृक्ष-देवताओ को बलि दी । एक दरिद्री मनुष्य ने लोगो को वृक्ष-देवताओ की सेवा करते देख स्वय एक अरण्ड-वृक्ष की सेवा की । मनुष्य अपने अपने देवताओ के लिये

¹देवता मङ्गलिका, जिनका विश्वास हो कि देवताओ की पूजा करने से कल्याण होगा ।

कुण्डकपूव ] १६ नाना प्रकार के माला, गन्ध, लेपन आदि और खाद्य-भोज्य लेकर गये । लेकिन यह ले गया भूरे के पूए और कड्छी में पानी। अरण्ड-वृक्ष के समीप पहुँचा तो सोचने लगा—"देवता दिव्य-भोजन करते हैं। मेरे देवता यह घूरे का पूआ नहीं खायेंगे। इसे व्यर्थ क्यों नष्ट करें ? मैं ही इसे खा लूँगा।" यह सोच वहीं से लौट पड़ा। बोधिसत्त्व ने वृक्ष की शाखा पर खड़े होकर कहा—"भो ! यदि तुम धनी होते तो मुझे मधुर खाजा देते, लेकिन तुम दरिद्र हो। मैं तुम्हारा पूआ न खाकर और क्या खाऊँगा ? मेरे हिस्से को नष्ट न करो।" इतना कह यह गाथा कही— ययन्नो पुरिसो होति तथन्ना तस्स देवता, आहरेतं फणं पूर्व मा मे भागं विनासय ॥ [ जैसा आदमी, वैसा देवता । इस घूरे के पूए को ला । मेरे हिस्से को नष्ट मत कर।] ─── ययन्नो, जैसा भोजन, तथन्ना, उस आदमी का देवता भी वैसे ही भोजन का खानेवाला होता है। आहरेत फणं पूवं—इस घूरे के पके पूए को ला । मेरे हिस्से को नष्ट न कर । उसने वापिस लौट बोधिसत्त्व को देख बलि दी। बोधिसत्त्व ने उसमें से सार ग्रहणकर पूछा—"भले आदमी ! तू किस लिये मेरी सेवा करता है ?" "स्वामी ! मैं दरिद्र हूँ। चाहता हूँ कि दरिद्रता से मुक्त हो जाऊँ । इसी लिये सेवा करता हूँ।" "भले आदमी ! चिन्ता मत कर। तूने जो सेवा की है वह कृतज्ञ की, कृत-उपकार को न भूलनेवाले की की है। इस अरण्ड के चारो ओर खजाने से भरे घडे गर्दन से गर्दन मिलाकर रक्खे हैं। तू राजाको कह, गाड़ियों में धन लदवाकर राजाङ्गण में डलवा। राजा प्रसन्न होकर तुझे श्रेष्ठी का पद दे देगा।" यह कहकर बोधिसत्त्व अन्तर्धान हो गये। उसने वैसा ही किया। राजा

शास्ता ने यह धर्म-देशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय जो

२० [ १.११.११० ने उसे सेठ के पद पर नियुक्त किया। इस प्रकार वह बोधिसत्त्व (की कृपा) से महासम्पत्तिशाली हो स्वकर्मानुसार परलोक गया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय जो दरिद्र था, वही इस समय दरिद्र। अरण्ड-वृक्ष का देवता तो मै ही था। ११०. सब्ब संहारक पञ्हो “सब्ब संहारको नत्थि”—यह सब्बसहारकपञ्ह (जातक) सारी की सारी उम्मग्ग जातक¹ में प्रगट होगी। महाउम्मग जातक (५४६)

“हंसी त्वं मञ्जसि” यह गद्रभपञ्ह (जातक) भी उम्मग जातक¹ म

पहला परिच्छेद १२. हंसी वर्ग १११. गद्रभ पञ्हो “हंसी त्वं मञ्जसि” यह गद्रभपञ्ह (जातक) भी उम्मग जातक¹ म ही आयेगी । ११२. अमरादेवी पञ्ह “येन सत्तुकिलङ्गा च” यह अमरादेवी पञ्ह (जातक) भी वही (उम्मग जातक¹ में) आयेगी । ११३. सिगाल जातक “सद्दहासि सिगालस्स...”यह गाथा शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय देवदत्त के बारे में कही । १ उम्मग जातक (५४६)

क. वर्तमान कथा

२२ [ १.१२.११३ क. वर्तमान कथा उस समय धर्म-सभा में बैठे हुए भिक्षु बातचीत कर रहे थे—'आयुष्मानो ! देवदत्त पाँच सौ भिक्षुओं को लेकर गयाशीर्ष चला गया। वहाँ जाकर उसने उन भिक्षुओं को कहा कि श्रमण गौतम जो करता है वह धर्म नहीं है बल्कि जो मैं करता हूँ वह धर्म है। इस प्रकार उन्हें अपने मत का बना, यथास्थान झूठा आचरण कर संघ में फूट डाल एवं सीमा¹ में दो उपोसथ² (-गृह) बना दिए।" यूँ वे देवदत्त के दोष कह रहे थे। भगवान् ने आकर पूछा— "यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "यह बातचीत ।" "भिक्षुओ ! देवदत्त केवल अभी झूठ बोलनेवाला नहीं। यह पूर्व- जन्म में भी झूठ बोलनेवाला ही रहा है" वह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधि- सत्त्व श्मशान-वन में एक वृक्ष-देवता होकर उत्पन्न हुए। उस समय वारा- णसी में नक्षत्र की घोषणा हुई। मनुष्यों ने यक्षों को बलि देने की इच्छा से चौराहों और दूसरे रास्तों पर मत्स्य-मांस आदि बखेर कर खप्परों में शराब रक्खी। एक गीदड़ आधी रात के समय चुपके से नगर में दाखिल हुआ। मत्स्य- मांस और शराब पीकर व पुन्नाग-वृक्ष के बीच जाकर सो रहा। सोते सोते सूर्य निकल आया। आँख खोलने पर प्रकाश हुआ देख उसने सोचा— "अब मैं नगर से निकल नहीं सकता।" इसलिए वह रास्ते के पास जाकर छिपकर लेट रहा। दूसरे मनुष्यों को आते-जाते देख वह कुछ नहीं बोला, लेकिन एक ब्राह्मण को मुँह धोने के लिये जाते देख उसने सोचा—"ब्राह्मण ¹ सीमित-प्रदेश। ² जहाँ भिक्षु एकत्र हो सांघिक-कृत्य करते हैं।

सिगाल ] २३ धन के लोभी होते हैं। मैं ऐसा उपाय करूँ कि यह ब्राह्मण मुझे अपनी चादर में छिपा, गोद में ले जाकर नगर से बाहर कर दे।" उसने मनुष्य-भाषा में कहा—"ब्राह्मण।" ब्राह्मण ने लौटकर पूछा—"मुझे कौन बुला रहा है ?" "ब्राह्मण ! मैं।" "किस कारण ?" "ब्राह्मण, मेरे पास दो सौ कार्षापण हैं। यदि मुझे गोद में ले चादर से ढक जिससे कोई न देखे, इस प्रकार नगर से निकाल सके, तो मैं तुझे यह कार्षा- पण दे दूंगा।" धन के लोभ से ब्राह्मण 'अच्छा' कह स्वीकार कर, उस गीदड़ को वैसे ले नगर से निकल थोड़ा आगे गया। गीदड़ ने पूछा—'ब्राह्मण यह कौन सी जगह है ?" "अमुक जगह।" "और भी थोड़ा आगे तक ले चल।" इस प्रकार बार बार कहकर उसे महाश्मशान तक ले जा, वहाँ पहुँचकर कहा—"मुझे यहाँ उतार दे।" ब्राह्मण ने उसे उतार दिया। "अच्छा तो ब्राह्मण चादर फैला।" ब्राह्मण ने धन-लोभ से चादर फैला दी। 'तो इस वृक्ष की जड़ में खोद' कह गीदड़ ब्राह्मण को जमीन खोदने में लगा, उसकी चादर पर चढ़ उसके चारों कोनों तथा बीच में—पाँच जगहों पर . पाखाना कर, उसे लबेड़ श्मशान-वन में दाखिल हो गया। बोधिसत्त्व ने वृक्ष की शाखा पर खड़े हो यह गाथा कही— सद्दहासि सिगालस्स सुरापीतस्स ब्राह्मण, सिप्पिकानं सतं नत्थि कुतो फसता दुवे॥ [ ब्राह्मण ! तू शराब पिए हुए गीदड़ का विश्वास करता है। उसके पास सौ सीपियाँ भी नहीं, दो सौ कार्षापण तो कहाँ होंगे।] सद्दहासि या सद्दहेसि। इसका मतलब है कि विश्वास करता है।

शास्ता ने यह धर्म-देशना ला, जातक का मेल बैठाया।

२४ [ १.१२.११४ सिप्पिकानं सतं नत्थि—इसके पास सौ सीपियां भी नही हैं। कुतो कंससता दुवे दो सौ कार्षापण तो कहाँ होगे। बोधिसत्व यह गाथा कह 'हे ब्राह्मण ! जा अपनी चादर धोकर, स्नान करके अपना काम कर' कह अन्तर्ध्यान हो गए। ब्राह्मण वैसा कर 'हाय ठगा गया' सोचता हुआ चला गया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय गीदड देवदत्त था। हाँ, वृक्ष-देवता में ही था। ११४. मितचिन्ती जातक “बहुचिन्ती अप्पचिन्ती च” यह गाथा शास्ता ने जेतवन मे विहार करते समय दो वृद्ध स्थविरो के बारे मे कही। क. वर्तमान कथा उन्होने एक जनपद के जगल मे वर्षा-काल बिताकर सोचा कि अब शास्ता के दर्शन के लिए जायेगे, रास्ते के लिये आवश्यक सामग्री तैयार कर 'आज जाते हैं, कल जाते हैं' करते करते एक मास बिता दिया। फिर दुबारा सामग्री तैयार कर 'आज जाते है, कल जाते हैं' करते करते एक मास और बिता दिया। इसी प्रकार अपने आलस्य और निवास-स्थान से मोह होने के कारण तीसरा महीना भी बिता दिया। तीन महीने गुजारकर जेतवन पहुँच, अपने योग्य- स्थान पर पाँच चीवर रख बुद्ध के दर्शनो को गए। भिक्षुओ ने पूछा—“आयु- ष्मानो ! आप बुद्ध की सेवा में बहुत दिन के बाद उपस्थित हुए। इतनी देर क्यो हुई ? उन्होने कारण बताया। उनका यह आलस्य तथा सुस्ती करने

मितचिन्ती ] २५ का स्वभाव भिक्षुओ पर प्रगट हो गया। भिक्षुओ ने धर्म सभा मे उन स्थविरो के आलसी स्वभाव की चर्चा चलाई। शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बात कर रहे थे ?" "यह बातचीत" कहने पर उन स्थविरो को बुलवाकर पूछा— "भिक्षुओ, क्या तुम सचमुच आलसी हो ?" "भन्ते ! सचमुच ।" "भिक्षुओ ! न केवल अभी आलसी हो, पूर्वजन्म में भी आलसी ही थे और निवास-स्थान के प्रति मोह था" कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय वाराणसी नदी में तीन मच्छ थे। उनके नाम थे बहुचिन्ती, अल्प चिन्ती और मित-चिन्ती। वे जगल (की नदी) से वस्ती के पास आ गए। मितचिन्ती ने बाकी दोनो को कहा—"यह वस्ती है। यहाँ सशकित रहने की तथा भय- भीत रहने की जरूरत है। मछुवे लोग नाना प्रकार के मछली पकड़ने के जाल आदि फेंककर मछलियां पकड़ते है। हम जगल को ही चले।" बाकी दोनो जनो ने आलस्य के कारण और लोभ के कारण 'आज चले, कल चलें' कहते हुए तीन महीने गुजार दिए। मछुओ ने नदी में जाल फेंका। बहुचिन्ती और अल्प चिन्ती खाने की चीज को ग्रहण करते हुए आगे आगे जाते थे। वे अपनी मूर्खता के कारण जाल की गन्ध का ख्याल न कर जाल में ही जा फँसे। मितचिन्ती ने पीछे आते हुए जाल की गन्ध सूंघकर समझ लिया कि वे दोनो जाल में जा फँसे। उसने सोचा—इन दोनो आलसी तथा मूर्खों को जीवन-दान दूँ। यह सोच यह बाहर की तरफ से जाल मे घुस जाल फाड कर निकलते हुए की तरह पानी को आलोडते हुए जाल के आगे गिरा; फिर पिछली तरफ से फाडकर निकलते हुए की तरह पानी को आलोडते हुए पिछली तरफ गिरा। मछुओ ने यह समझकर कि मच्छ जाल फाडकर निकल गए जाल के सिरो को खोल फेंक दिया। वे दोनो मच्छ जाल से छूटकर पानी में जा पडे। इस प्रकार मितचिन्ती ने उनके प्राण बचाए। शास्ता ने यह पूर्व-जन्म की कथा कह बुद्ध होने पर यह गाथा कही—

२६ [ १.१२.११५ बहुचिन्ती अप्पचिन्ती च उभो जाले अबज्झरे, मितचिन्ती प्रमोचेसि उभो तत्थ समागता ॥ [बहुचिन्ती और अप्पचिन्ती दोनो जाल में फँस गए। मितचिन्ती ने दोनो को छुड़ा दिया। ये दोनो उसके साथ आ गए ।] बहुचिन्ती, बहुत चिन्तन करनेवाला होने से अथवा बहुत सङ्कल्प-विकल्प वाला होने से बहुचिन्ती नाम हुआ। बाकी दोनो भी इसी प्रकार हैं। उभो तत्थ समागता, मितचिन्ती के कारण प्राण बचाकर वे दोनो फिर पानी मे मितचिन्ती के साथ आ गए। इस प्रकार शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। (आर्य-) सत्यो की समाप्ति पर स्थविर भिक्षु श्रोतापन्न हुए। उस समय के बहुचिन्ती और अल्प-चिन्ती यह दोनो थे, मितचिन्ती तो मै ही था। ११५. अनुसासिक जातक “यायञ्चमनुसासति .” यह गाथा शास्ता ने जेतवन मे विहार करते समय एक उपदेश देनेवाली भिक्षुणी के बारे में कही। क. वर्तमान कथा यह श्रावस्ती-निवासिनी एक कुल में उत्पन्न हुई थी। जिस समय से प्रव्रजित होकर उपसम्पन्न हुई, उस समय से लेकर वह श्रमण-धर्म मे न लग

अनुसासिक ] २७ चीजो की लोभी होने से नगर के एक ऐसे हिस्से मे जहां दूसरी भिक्षुणियां नही जाती थी, भिक्षा मांगने जाती । मनुष्य उसे बढ़िया भोजन देते । उसने रस तृष्णा के कारण सोचा, यदि दूसरी भिक्षुणियां भी उसी ओर भिक्षा मांगने जाएंगी, तो मेरी प्राप्ति मे फरक पडेगा। इस लिए मुझे ऐसा करना चाहिए, जिसमे दूसरी भिक्षुणियां उधर भिक्षा मांगने न जाएं । वह भिक्षुणियो के निवास-स्थान पर गई और बोली—बहनो ! अमुक जगह पर चण्ड-हाथी है, चण्ड-घोडा है, चण्ड-कुत्ता है। वह खतरनाक जगह हैं। वहाँ पिण्ड-पात के लिए मत जाएं। उसकी बात सुन एक भिक्षुणी ने भी उधर गर्दन निकालकर नही देखा। उसके एक दिन उधर भिक्षा माँगने के समय, जब वह जल्दी से एक घर मे घुसने जा रही थी एक मरखने मेढे ने उसे टक्कर मारकर उसकी जांघ की हड्डी तोड दी । मनुष्यो ने दौडकर उस दो टुकडे हुए जांघ की हड्डी को एक में बाँधा और उसे चारपाई पर लिटाकर भिक्षुणी आश्रम लाए। 'यह दूसरी भिक्षु- णियो को उपदेश देती थी, स्वय उधर जाकर जांघ की हड्डी तुडाकर आई है' कह भिक्षुणियो ने हंसी उडाई। यह बात शीघ्र ही भिक्षु-सघ तक पहुँच गई। एक दिन धर्म-सभा में बैठे हुए भिक्षु उसकी निन्दा कर रहे थे—आयु- ष्मानो ! दूसरो को उपदेश देनेवाली भिक्षुणी स्वय उधर जाकर मरखने मेंढे से जांघ की हड्डी तुडा लाई है। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बात चीत कर रहे हो ?' 'यह बातचीत' कहने पर 'भिक्षुओ, केवल अब ही नही, पहले भी यह दूसरो को तो उपदेश देती रही है, लेकिन स्वय तदनुसार आचरण न करने के कारण दुख भोगती रही है' कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय मे वाराणसी मे राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधि- सत्व जगल मे पक्षी की योनि म जन्म ग्रहण कर बडे होने पर सैकडो पक्षियो को ले हिमालय को गए। उनके वहीं रहते समय चण्ड-स्वभाव की एक चिडिया राज-मार्ग में जाकर पडी रहती, वहाँ उसे गाडियो पर से गिरे हुए धान, मूँग आदि के दाने मिलते। उन्हे पाकर वह सोचती कि अब ऐसा उपाय करूँ जिससे

दूसरे पक्षी इधर न आयें। वह पक्षियो को उपदेश देती—राज-मार्ग बड़ा खतरनाक है। हाथी, घोड़े और मरकहे वैलोवाली गाडियां आती जाती है। शीघ्रता से उड़ा भी नही जा सकता। वहाँ नहीं जाना चाहिए। पक्षियो ने उसका नाम अनुशासिका रख दिया। एक दिन वह राजपथ पर चुग रही थी। जोर से आती हुई गाड़ी के शब्द को सुन उसने पीछे मुंह कर देखा। 'अभी दूर है' सोच, चुगती ही रही। हवा के जोर से गाड़ी शीघ्र ही आ पहुँची। वह उड़ न सकी। पहिये से उसके दो टुकड़े हो गए। बोधिसत्त्व ने पक्षियो के लौटने पर उनकी गिनती करते समय उसे न देख कर कहा—अनुशासिका दिखाई नही देती, उसे खोजो। पक्षियो ने खोज करते हुए, उसे राजपथ पर दो टुकड़े हो पड़े देखा। बोधिसत्त्व से आकर निवेदन किया। 'वह दूसरो को जाने से रोकती थी लेकिन स्वयं वहाँ चुगने जाकर दो टुकड़े हुई' कह यह गाथा कही— यायञ्जमनुसासति सय लोलुप्पचारिणी, साय विपक्खिका सेति हता चक्केन साळिका ॥ [ जो दूसरो को उपदेश देती थी लेकिन स्वयं थी लोभी, वह यह चिड़िया पहिये के नीचे आकर पंख-रहित होकर मरी पड़ी है। ] यायञ्जमनुसासतीति, इसमें 'य' केवल दो पदो की सन्धि के कारण है। अर्थ है, जो दूसरो को उपदेश देती है। सय लोलुप्पचारिणी, अपने लोभी स्व- भाव वाली। साय विपक्खिका सेति, वह पंखरहित होकर राजपथ पर पड़ी है। हता चक्केन साळिका, गाड़ी के पहिये से मारी गई चिड़िया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय उप- देश देनेवाली चिड़िया यह उपदेश देनेवाली भिक्षुणी ही थी। ज्येष्ठ-पक्षी तो मैं ही था।

११६. दुब्बच जातक

दुब्बच ] २६ ११६. दुब्बच जातक “अतिक्करमकराचरिय” यह गाथा शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक बात न माननेवाले भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा यह कथा नवें निपात में गिज्झ जातक¹ में आयेगी। शास्ता ने उस भिक्षु को बुला, ‘भिक्षु, तू केवल अभी बात न माननेवाला नहीं है, बल्कि पहले भी तूने पण्डितों का कहना न करके शक्ति के आघात से जान गँवाई’ वह, पूर्व- जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व ने लङ्घन² के घर में जन्म लिया। बड़े होने पर वह बुद्धिमान तथा व्यवहार- कुशल हुआ। वह एक नट से शक्ति लाँघने की कला सीखकर आचार्य के साथ हुनर दिखाते हुए घूमता था। बोधिसत्त्व का उस्ताद चार ही शक्तियों के लाँघने का हुनर जानता था, पाँच के लाँघने का नहीं। एक दिन उसने एक गामड़े में तमाशा दिखाते समय शराब के नशे में मस्त होकर, ‘पाँच शक्तियों को लाँघूँगा’ कह उन्हें क्रम से रखा। बोधिसत्त्व ने कहा— आचार्य, आप पाँच शक्तियों को लाँघने का हुनर नहीं जानते; इसलिए एक शक्ति को हटा दें। यदि पाँचों को लाँघेंगे तो पाँचवीं शक्ति से बिंधकर मरेंगे। ———————— ¹ गिज्झ जातक—नवें निपात की पहली जातक। ² लङ्घनट=बाजीगर।

३० [ १.१२ ११६ आचार्य उस समय बिलकुल मदहोश था। इसलिए उसने कहा—तू मेरी सामर्थ्य को नही जानता। इस प्रकार बोधिसत्व के उपदेश का अनादर कर, चार शक्तियो को लांघ पांचवी को लांघते समय डण्ठल से महुए के फूल के गिरने की तरह, चीखता हुआ गिरा; उसे देख बोधिसत्व ने कहा—यह पण्डितो का कहना न कर इस आपत्ति में पडा। इसके बाद यह गाथा कही— अतिकरमकराचरिय ! मय्हम्पेतं न रुच्चति, चतुत्थे लंघयित्वान पञ्चमियास्मि¹ आवुतो ॥ [ आचार्य, आज तुमने अति कर दी। मुझ तक को यह अच्छा नही लगा। चारो लांघकर पांचवी में गिर पडे । ] ———— अतिकरमकराचरिय, आचार्य, आज तुमने अति कर दी। अर्थात् अपनी शक्ति से बाहर काम किया। मय्हम्पेतं न रुच्चति, मुझ आपके शिष्य तक को यह अच्छा नही लगा। इसीलिए मैने पहले कह दिया था। चतुत्थे लंघयि- त्वान, चौथे शक्ति-फलक पर बिना गिरे लांघकर, पञ्चमियास्मि आवुतो, पण्डितो की बात न मानकर पांचवी शक्ति पर गिर पडे । ———— इतना कह आचार्य को शक्ति पर से उठा, जो करना उचित था, किया। शास्ता ने इस पूर्व-जन्म की कथा को ला जातक का मेल बैठाया—उस समय का आचार्य, यह बात न माननेवाला भिक्षु था, शिष्य तो मैं ही था। ———— ¹ 'पञ्चमायसिं' भी पाठ है।

११७. तित्तिर जातक (२)

तित्तिर ] ३१ ११७. तित्तिर जातक (२) "अच्चुग्गता अतिबलता "यह (गाथा) शास्ता ने जेतवन मे विहार करते समय कोकालिक¹ के बारे मे कही थी। क. वर्तमान कथा उसकी वर्तमान कथा तेरहवे निपात की तक्कारिय जातक² म प्रगट होगी। शास्ता ने कहा—भिक्षुओ, न केवल अभी कोकालिक अपनी वाणी के कारण नष्ट हुआ है, पहले भी नष्ट हुआ है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व ने उदीच्य ब्राह्मण कुल म जन्म ग्रहण कर बड़े होने पर तक्षशिला जा सब विद्याएँ सीखीं। फिर काम-भोग के जीवन को छोड़ ऋषि प्रव्रज्या के अनुसार प्रव्रजित हो पाँच अभिज्ञा तथा आठ समापत्तियो को प्राप्त किया । हिमवन्त प्रदेश के सभी ऋषियो ने उन्ह अपना उपदेशक आचार्य बनाया और उनके आस-पास रहने लगे। वे भी पाँच सौ ऋषियो के उपदेशक-आचार्य बन ध्यान मग्न हो हिमवन्त मे रहते थे । उस समय पाण्डु रोग से पीडित एक तपस्वी कुल्हाडी लेकर लकडियाँ फाड रहा था। उसके पास बैठे एक वाचाल तपस्वी ने 'यहाँ पर मारें, यहाँ पर मारें' बार बार कहकर उस तपस्वी को क्रोधित कर दिया। उसने क्रोध ¹ कोकालिक देवदत्त के पक्ष का एक सघ-भेदक था। ² तक्कारिय जातक (४८१)

३२ [ १.१२.११७ में आकर कहा, 'तू मुझे अब लकडी चीरना सिखाना चाहता है', और अपनी तेज कुल्हाड़ी उठा उसे एक ही प्रहार से मार डाला। बोधिसत्व ने उसका शरीर-कृत्य किया। उसी समय आश्रम से कुछ ही दूर वल्मीक पर एक तित्तिर रहता था। यह सुबह शाम वल्मी के ऊपर खड़ा हो बडे जोर से आवाज लगाता। उसे सुन एक शिकारी ने सोचा कि तित्तिर होगा और शब्द के पीछे पीछे जा, उसे मार घर ले गया। बोधिसत्व ने उसकी आवाज न सुनाई देती देख तपस्वियों से पूछा- उस जगह एक तित्तिर रहता था। उसकी आवाज नहीं सुनाई देती ? उन्होंने बोधिसत्त्व को सब हाल कहा। बोधिसत्त्व ने ऊपर की दोनों बातों को मिला ऋषियों के सामने यह गाथा कही— अच्चुग्गता अतिबलता अतिवेलं पभासिता, वाचा हनति दुम्मेधं तित्तिरं वातिवस्सितं ॥ [ अति-ऊँची, अति जोर से अत्यधिक देर तक बोली गई वाणी मूर्ख आदमी को वैसे ही मार डालती है जैसे जोर से चिल्लाने से तित्तिर मारा गया।] अच्चुग्गता, अति उद्गता। अतिबलता, बार बार बोलने से बहुत बलशाली हो गई। अतिवेलं पभासिता उचित से बहुत ज्यादा देर तक भाषित। तित्तिरं वातिवस्सितं, जैसे बहुत बोलने से तित्तिर मारा गया, वैसे ही इस प्रकार की वाणी मूर्ख आदमी को मार गिराती है। इस प्रकार बोधिसत्त्व ऋषियों को उपदेश दे चारो ब्रह्म-विहारों की भावना कर ब्रह्म-लोक गामी हुए। शास्ता ने 'भिक्षुओ, न केवल अभी कोकालिक अपनी वाणी के कारण विनष्ट हुआ, किन्तु पहले भी नष्ट हुआ' कहा, और यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय दुर्वचन बोलनेवाला तपस्वी कोकालिक हुआ। ऋषिगण बुद्ध-परिषद। और ऋषिगण का शास्ता तो मैं था ही।

११८. वट्टक जातक (२)

वट्टक ] ३३ ११८. वट्टक जातक (२) “नाचिन्तयन्तो पुरिसो....” यह गाथा शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय उत्तर नाम के श्रेष्ठि के पुत्र के बारे में कही। क. वर्तमान कथा श्रावस्ती में उत्तर श्रेष्ठि महाधनवान था। उसकी भार्या की कोख में एक बालक पैदा हुआ। वह पुण्यवान् था, ब्रह्मलोक से च्युत होकर यहाँ जन्म ग्रहण किया था। बडा होने पर वह ब्रह्मा की तरह सुन्दर वर्ण का हुआ। एक दिन श्रावस्ती में कार्तिक महोत्सव की घोषणा होने पर सभी लोग उत्सव मनाने मे मस्त थे। उस तरुण के मित्रो—सभी दूसरे श्रेष्ठि-पुत्रो की पत्नियां थी। उत्तर श्रेष्ठि पुत्र बहुत समय तक ब्रह्मलोक में रहा था, इसलिए उसकी कामभोग में आसक्ति न थी। उसके मित्रो ने सोचा कि उत्तर श्रेष्ठि पुत्र के लिए भी एक स्त्री लाकर उत्सव मनाएगे। वे उसके पास जाकर बोले “सौम्य ! इस नगर में कार्तिक रात्रि का उत्सव घोषित हुआ है। तुम्हारे लिए भी एक स्त्री लाकर उत्सव मनाएं ?” 'मुझे स्त्री की आवश्यकता नही हैं' कहने पर भी बार बार आग्रह करके स्वीकार करवा लिया। तब एक वेश्या को सब अलकारो से सजा, उसके घर ले जाकर उसे श्रेष्ठिपुत्र का सोने का कमरा दिखाकर कहा कि तू श्रेष्ठिपुत्र के पास जा। उसे कमरा दिखा वे स्वय चले गए। उसके शयनागार मे प्रविष्ट होने पर भी श्रेष्ठिपुत्र ने न उसकी ओर देखा, न बातचीत की। उसने सोचा यह मेरे जैसी सुन्दर उत्तम विलास-युक्त स्त्री की ओर न देखता है, न बातचीत करता है। इसे अब स्त्री-लीला से देखने पर मजबूर करूँगी। तब वह स्त्री-लीला दिखाते हुए प्रसन्न-मुख की भाँति ३

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आगे के दांत निकालकर मुस्कराई। श्रेष्ठिपुत्र ने देखा, तो दांतो की हड्डियां उसके लिए ध्यान का विषय हो गईं। उसमें अस्थि-सञ्ज्ञा पैदा हुई। उसे वह सारा शरीर हड्डियों के पञ्जर की तरह मालूम देने लगा। उसकी मजदूरी दे, उसने कहा 'जाओ'। उसने घर से निकलने पर बीच-बाजार में खड़ा देख एक ऐश्वर्यशाली आदमी उसे खर्चा दे अपने घर ले गया। सप्ताह बीतने पर उत्सव समाप्त हुआ। वेश्या की माता ने जब देखा कि लडकी नहीं आई तो वह श्रेष्ठिपुत्रों के पास गई और पूछा कि वह कहाँ है? उन्होने उत्तर श्रेष्ठिपुत्र के यहाँ जाकर पूछा कि वह कहाँ है। उसने कहा "उसी समय खर्चा देकर विदा कर दिया।" उसकी माँ रोने लगी। 'मैं अपनी लडकी को नहीं देखती। मेरी लडकी लाओ' कहते हुए वह उत्तर-श्रेष्ठि-पुत्र को ले राजा के पास गई। राजा ने मुकद्दमे का फैसला करते हुए पूछा- "इन श्रेष्ठिपुत्रों ने तुम्हे वेश्या लाकर दी ?" "देव ! हाँ।" "अब वह कहाँ है ?" "नहीं जानता हूँ। उसी समय उसे विदा कर दिया था।" "अब उसे लिया आ सकता है ?" "देव ! नहीं सकता हूँ।" "यदि नहीं ला सकता है, तो इसे राज-दण्ड दो।" उसके हाथ पीछे की तरफ बाँध राज-दण्ड देने के लिए उसे पकडकर ले गए। वेश्या को न ला सकने के कारण राजा श्रेष्ठिपुत्र को राज-दण्ड दे रहा है, सुन सारे नगर मे हल्ला मच गया। लोग छाती पर हाथ रखकर 'स्वामी ! यह क्या आपके योग्य है ?' कहते हुए रोने लगे। सेठ भी रोता पीटता पुत्र के पीछे पीछे जा रहा था। श्रेष्ठिपुत्र सोचने लगा, 'यह जो मुझे इस प्रकार का दुख हुआ, यह घर में रहन के ही कारण हुआ, यदि मैं इससे मुक्त हुआ तो गोतम सम्यक सम्बुद्ध के पास प्रब्रजित होऊँगा।' वेश्या ने हल्ला सुना तो पूछा यह क्या हल्ला है? समाचार मालूम होने पर वह जल्दी से उतर "स्वामी ! हटो हटो" मुझे राज पुरुषो को देखने दें कहती हुई राज-पुरुषो के पास पहुँची। राज-पुरुषो ने उसे देख माता को सौंपा