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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

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२८० ज्ञानयोग

की व्यर्थ वासना और फिर इसके आगे स्वर्ग जाकर उसी तरह रहने की वासना—अर्थात् सर्वदा इन्द्रिय और इन्द्रियसुख में लिप्त रहने की वासना ही मृत्यु को लाती है।

यदि हम पशुओं की उन्नत अवस्था मात्र है, तो जिस विचार से यह सिद्धान्त लब्ध हुआ उसी विचार से यह सिद्धान्त भी हो सकता है कि पशुगण मनुष्य की अवनत अवस्था मात्र है। तुमने यह कैसे समझा कि वैसा नहीं है? तुम जानते हो—क्रमविकासवाद का प्रमाण केवल यही है कि निम्नतम प्राणी से लेकर उच्चतम प्राणी तक सभी शरीर परस्पर-सदृश हैं, किन्तु उससे तुमने किस प्रकार यह सिद्धान्त निकाला कि निम्नतम प्राणी से क्रमशः उच्चतम प्राणी जन्मा है, न कि यह कि उच्चतम से क्रमशः निम्नतम प्राणी उत्पन्न हुआ है? दोनों ही ओर समान युक्ति है—और यदि इस मतवाद मे वास्तविक कुछ सत्य है, तो हमारा यह विश्वास है कि एकबार नीचे से ऊपर, फिर ऊपर से नीचे गति होती है—अर्थात् लगातार इस देहश्रेणी का आवर्तन हो रहा है। क्रमसंकोचवाद स्वीकार न करने पर क्रमविकासवाद किस तरह सत्य हो सकता है? जो कुछ भी हो, मै जो कह रहा था कि मनुष्य की लगातार अनन्त उन्नति नही हो सकती यह इससे अच्छी तरह स्पष्ट होजाता है।

'अनन्त' जगत् मे अवश्य अभिव्यक्त हो सकता है, इसे यदि मुझे कोई समझा सके तो मै उसे समझने को प्रस्तुत हूँ, किन्तु हम लगातार सरल रेखा मे उन्नति करते जा रहे है, इस बात पर मेरा बिलकुल विश्वास नहीं है। यह तो एक असंबद्ध प्रलाप मात्र है। सरल रेखा मे किसी प्रकार की गति हो ही नहीं सकती। यदि तुम अपने सामने ही

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सामने एक पत्थर फेको, तो अनन्त काल के बाद एक समय ऐसा आयेगा, जब वह घूमकर गोलाकार मे तुम्हारे निकट फिर आजायेगा। तुमलोगो ने क्या गणित के इस स्वत.सिद्ध सिद्धान्त को नही पढ़ा है कि सरल रेखा अनन्त रूप मे बढ़ाने पर वर्तुलाकार धारण करती है ? अवश्य ही यह ऐसा ही होगा, परन्तु संभव है, मार्ग पर अग्रसर होते होते कुछ इधर उधर होजाय । इसी कारण मै सर्वदा ही प्राचीन धर्मों का मत लेता हूँ — क्या ईसा, क्या बुद्ध, क्या वेदान्त, क्या बाइबिल, सभी कहते है — इस अपूर्ण जगत् को छोड़कर ही समय पर हम पूर्णता प्राप्त करेगे । यह जगत् कुछ भी नही है — अधिक से अधिक उस सत्य की एक भयानक विसदृश अनुकृति अर्थात् छाया मात्र है । सभी अज्ञानी मनुष्य इन इन्द्रियसुखो का उपभोग करने के लिये दौड़ते है ।

इन्द्रियो मे आसक्त होना अत्यन्त सहज है । और भी सहज यह है कि हम अपने प्राचीन अभ्यास के वशीभूत होकर केवल आहार-पान मे मत्त रहे । किन्तु हमारे आधुनिक दार्शनिक इन सभी सुखकर भावो को लेकर उनके ऊपर धर्म का छाप देने की चेष्टा करते है । किन्तु यह मत सत्य नही है । इन्द्रियो की मृत्यु अटल है । हमे मृत्यु से अतीत होना होगा । मृत्यु कभी भी सत्य नही है । त्याग ही हमे सत्य मे पहुँचायेगा । नीति का अर्थ ही त्याग है । हमारे प्रकृत जीवन का प्रत्येक अंग ही त्याग है । हम जीवन के उन्ही क्षणो मे वास्तविक साधुता से युक्त होते है और प्रकृत जीवन का संभोग करते है, जब हम 'मै' की चिन्ता से विरत होते है । 'मै' का जब नाश होता है — हमारे अन्दर के 'प्राचीन मनुष्य' ( 'Old man' ) की मृत्यु होती है, उसी समय हम सत्य मे पहुँचते है । और वेदान्त कहता है — वह

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सत्य ही ईश्वर है, वही हमारा प्रकृत स्वरूप है—वह सर्वदा ही तुम्हारे साथ रहता है और केवल यही नहीं, तुममें ही रहता है। उसी में सर्वदा वास करो। यद्यपि यह बहुत कठिन प्रतीत होता है, तथापि क्रमशः यह सहज हो जायगा। तब तुम देखोगे, उसमें रहना ही एकमात्र आनन्दपूर्ण अवस्था है, अन्य सभी अवस्थाये मृत्यु है। आत्म-भाव मे पूर्ण होना ही जीवन है, और सभी भाव मृत्यु है। हमारे वर्तमान समस्त जीवन को ही केवल शिक्षा के लिये विश्वविद्यालय कहा जा सकता है। प्रकृत जीवन लाभ करने के लिए हमे इसके बाहर जाना होगा।


१३. आत्मा का मुक्त स्वभाव

हम पहले जिस कठोपनिषद् की आलोचना करते थे, वह छान्दोग्योपनिषद् के, जिसकी हम आलोचना करेगे, बहुत समय बाद रचा गया था। कठोपनिषद् की भाषा अपेक्षाकृत आधुनिक है, उसकी चिन्तनशैली भी सबसे अधिक प्रणालीवद्ध है। प्राचीनतर उपनिषदो की भाषा कुछ अन्य प्रकार की थी। वह अति प्राचीन एवं बहुत कुछ वेद के संहिता-भाग की तरह थी। फिर उनमे अनेक बार अनेक अनावश्यक विषयो में से घूम फिर कर तब कही उनका सार मत प्राप्त होता है। इस प्राचीन उपनिषद् में कर्मकाण्डात्मक वेदांश का काफी प्रभाव है। इसीलिए इसका आधे से अधिक भाग अब भी कर्मकाण्डात्मक है। किन्तु अति प्राचीन उपनिषदो के अध्ययन से एक महान लाभ होता है। वह लाभ यह है कि उनके अध्ययन से आध्यात्मिक भावो का ऐतिहासिक विकास जाना जा सकता है। अपेक्षाकृत आधुनिक उपनिषदो मे ये आध्यात्मिक तत्व सब एकत्र संग्रहीत एवं सज्जित पाये जाते हैं। उदाहरण रूप भगवद्गीता को ही ले लीजिये। श्रीमद्भगवद्गीता को अन्तिम उपनिषद कहा जासकता है, क्योकि उसमे कर्मकाण्ड का लेशमात्र भी नहीं है। गीता का प्रत्येक श्लोक किसी न किसी उपनिषद से संग्रहीत है, मानो अनेक पुष्पो के संचयन से एक सुन्दर गुच्छ निर्मित हुआ हो, किन्तु उनमे इन सब तत्वो का क्रम-विकास देखने में नहीं आता। अनेक लोगो के मतानुसार इन आध्यात्मिक तत्वो के क्रम-विकास को जानने की सुविधा ही वेद के अध्य-

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यन की एक विशेष उपकारिता है। वास्तव में यह सत्य भी है, क्योंकि वेद को लोग इतनी पवित्रता की दृष्टि से देखते हैं कि संसार के अन्यान्य धर्मशास्त्रों में जिस तरह नाना प्रकार की मिलावट हुई है, वेद में वैसी नहीं होने पाई। वेद में अति उच्च विचार और निम्नतम विचारों का भी समावेश है। सार, असार, अति उन्नत विचार, और साथ ही सामान्य छोटी-छोटी बातें भी उसमें सन्निविष्ट हैं। किसीने भी उसमें परिवर्तन या परिवर्धन करने का साहस नहीं किया। हाँ, टीकाकारों ने अवश्य ही व्याख्या के बल से अति प्राचीन विषयों से अद्भुत-अद्भुत नये भाव निकालना आरम्भ किया, अनेक साधारण वर्णनों के भीतर वे आध्यात्मिक तत्त्व देखने लगे, किन्तु मूल जैसे का तैसा ही रहा—इसी मूल में ऐतिहासिक गवेषणा के अनेक विषय हैं। हम जानते हैं कि मनुष्य की चिन्तन-शक्ति जितनी ही उन्नत होती है उतना ही वे धर्म के पूर्व भावों को परिवर्तित कर उनमें नवीन नवीन ऊँचे भावों को मिलाते हैं। यहाँ एक, वहाँ एक—इस प्रकार नई नई बातें जोड़ी जाती हैं, कहीं कहीं एक आध बात निकाल भी दी जाती है। टीकाकार की ही तो कला ठहरी ! सम्भवतः वैदिक साहित्य में ऐसा नहीं किया गया। और यदि हुआ हो तो प्रथमतः उसका पता ही नहीं चलता। हमें इससे लाभ यह है कि हम विचार के मूल उत्पत्तिस्थान में पहुँच सकते हैं—देख सकते हैं कि किस प्रकार क्रमशः उच्च से उच्चतर विचारों का, किस प्रकार से स्थूल आधिभौतिक धारणाओं से लेकर सूक्ष्मतर आध्यात्मिक धारणाओं का विकास हो रहा है और अन्त में किस प्रकार वेदान्त में उन सबों की चरम परिणति हुई है। वैदिक साहित्य में अनेक प्राचीन आचार-व्यवहारों का भी आभास पाया जाता है। पर उपनिषद् में उन

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सभो का वर्णन अधिक नही है। वह एक ऐसी भाषा मे लिखा गया है जो अत्यन्त सक्षिप्त है और सरलता से याद रखी जा सकती है।

प्रतीत ऐसा होता है कि इस ग्रन्थ के लेखक मानो केवल कई घटनाओ को स्मरण रखने के उपाय लिख रहे है। मानो उनकी ऐसी धारणा है कि ये सब बाते सभी जानते है। इससे असुविधा यह होती है कि हम उपनिषद् मे लिखी कथाओ के वास्तविक तात्पर्य को ग्रहण नहीं कर सकते। इसका कारण यह है-यह सब जिन लोगो के समय मे लिखा गया था वे लोग उन घटनाओ को जानते थे, किन्तु आज उनकी किम्बदन्ती भी वर्तमान नही है,-और जो एकाध है भी, वह भो अतिरंजित होगई है। उनकी ऐसी नयी व्याख्या होगई है कि जब हम पुराणो मे उनके विवरण पढ़ते है तो देखते है कि वे उच्छ्वासात्मक काव्य बन गये है।

पाश्चात्य देशो मे जैसे हम पाश्चात्य जाति की राजनीतिक उन्नति के विषय मे एक विशेष भाव देख पाते है कि वे किसी प्रकार अनियन्त्रित शासन सहन नही कर सकते, वे किसी प्रकार के बन्धन को-जैसे कोई उनके ऊपर शासन करे-सहन नही कर सकते, वे जैसे क्रमशः उच्च से उच्चतर प्रजातन्त्र-शासन-प्रणाली की उच्च उच्चतर धारणा तथा बाह्य स्वाधीनता की उच्च से उच्चतर धारणा प्राप्त कर रहे हैं ठीक वैसी ही घटना दर्शन मे घटती है; किन्तु भेद यही है कि यह आध्यात्मिक जीवन की स्वाधीनता है। 'अनेक-देववाद' से क्रमशः लोग 'एकेश्वरवाद' मे पहुँचते है-उपनिषद मे फिर मानो इसी एकेश्वरवाद के विरुद्ध युद्धघोषणा हुई है। जगत

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के अनेक शासनकर्ता अपने भाग्य को नियंत्रित कर रहे है केवल यही धारणा उन्हे असह्य होती हो सो नहीं, बल्कि एकजन उनके अदृष्ट का विधाता होगा--यह धारणा भी उन्हे सह्य न हो सकी। उपनिषद् की आलोचना करने पर यही सबसे पहले हमारे सामने आता है। यही धारणा धीरे धीरे बढ़कर अन्त मे उसकी चरम परिणति हुई प्रायः सभी उपनिषदो मे अन्त मे हम यही परिणति पाते है। वह है-जगदीश्वर को सिहासनच्युत करना। ईश्वर की सगुण धारणा जाकर निर्गुण धारणा उपस्थित होती है। तब ईश्वर जगत् का शासनकर्ता एक व्यक्ति नहीं रह जाता, वह फिर एक अनन्तगुणसंपन्न मनुष्य-धर्मविशिष्ट नही रहता, प्रत्युत वह एक भाव मात्र, एक परम तत्व मात्र रूप मे ज्ञात होता है। हममे, जगत् के सभी प्राणियों मे, यहाँ तक कि समस्त जगत् मे वही तत्व ओत-प्रोत भाव से विराजमान है। और यह निश्चित है कि जब ईश्वर की सगुण धारणा निर्गुण धारणा मे पहुँच गई तब मनुष्य भी सगुण नहीं रह सकता। अतएव मनुष्य का सगुणत्व भी उड़ गया-मनुष्य भी एक तत्व-मात्र हुआ। सगुण व्यक्ति बाह्य प्रदेश मे विराजित है;-प्रकृत तत्व अन्तर्देश मे-पश्चात्। इसी तरह दोनो ओर से ही क्रमशः सगुणत्व चला जाता है और निर्गुणत्व का आविर्भाव होता रहता है।

सगुण ईश्वर की क्रमशः निर्गुण धारणा होती है एव सगुण मनुष्य का भी निर्गुण मनुष्यभाव आता रहता है-तब इन दो दिशाओ मे विभिन्न भाव से प्रवाहित इन दो धाराओ का विभिन्न वर्णन पाया जाता है। ये दो धाराये जिस क्रम से क्रमशः आगे होकर मिल जाती हैं, उसके वर्णन से उपनिषद् पूर्ण है एव प्रत्येक उपनिषद् की शेष

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कहा है—तत्वमसि। केवल एक मात्र नित्य आनन्दमय पुरुष ही है, और वही परम तत्व इस जगत् रूप मे अनेक प्रकार से प्रकाशित होता है।

अब दार्शनिक आए। उपनिषद् का कार्य यहीं समाप्त हुआ—दार्शनिक लोगो ने उसके बाद अन्यान्य प्रश्नो पर विचार आरम्भ किया। उपनिषद मे मुख्य बात मिली—अब विस्तार पूर्वक व्याख्या करना, विचार करना दार्शनिक लोगो के लिए ही रहा।

यह स्वाभाविक है कि पूर्वोक्त सिद्धान्त से अनेक प्रश्न उठते हैं। यदि यही स्वीकार किया जाय कि एक निर्गुणतत्व ही परिदृश्यमान नाना रूपो मे प्रकाशित होता है, तो यही जिज्ञासा होती है कि एक क्यो अनेक हुआ? यह वही प्राचीन प्रश्न है जो मनुष्य की अमार्जित बुद्धि मे स्थूल भाव से उत्पन्न होता है। जगत् मे दुःख अशुभ क्यो है? उसी प्रश्न ने स्थूल भाव त्यागकर सूक्ष्म रूप धारण किया है। अब फिर हमारी बाह्य दृष्टि ऐन्द्रियक दृष्टि से वह प्रश्न नहीं पूछा जारहा है, बल्कि भीतर से दार्शनिक दृष्टि से इस प्रश्न का विचार होरहा है। क्यो वह एक तत्व अनेक हुआ? इसका उत्तर—सर्वोत्तम उत्तर भारतवर्ष मे मिला। इसका उत्तर—मायावाद—वास्तव मे वह अनेक नहीं हुआ, वास्तव मे उसके प्रकृत स्वरूप की लेशमात्र भी हानि नही हुई। यह अनेकत्व केवल आपातप्रतीयमान मात्र है, मनुष्य आपात दृष्टि से व्यक्ति रूप से प्रतीयमान होरहा है, किन्तु वास्तव मे वह निर्गुण है। ईश्वर भी आपाततः सगुण या व्यक्ति रूप से प्रतीयमान होरहा है, यद्यपि वास्तव मे वह इसी समस्त ब्रह्माण्ड मे अवस्थित निर्गुण पुरुष है।

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यह उत्तर भी एकदम ही प्राप्त नहीं हुआ। उसके भी विभिन्न सोपान हैं। इस उत्तर के सम्बन्ध में दार्शनिकों में मतभेद है। माया-वाद भारत के सभी दार्शनिकों को मान्य नहीं है। सम्भवतः उनमें से अधिकांश दार्शनिकों ने इस मत को स्वीकार नहीं किया। कुछ तो द्वैतवादी हैं—उनका मत द्वैतवाद है—निश्चय ही उनका यह मत विशेष उन्नत तथा मार्जित नहीं है। वे इस प्रश्न की जिज्ञासा ही नहीं होने देंगे—वे इस प्रश्न के उत्पन्न होते ही इसे दबा देते हैं। वे कहते हैं—"तुमको इस प्रश्न के पूछने का अधिकार नहीं है—क्यों इस तरह हुआ, इसकी व्याख्या पूछने का तुम्हें कुछ भी अधिकार नहीं। वह तो ईश्वर की इच्छा है—हमें शान्त भाव से उसे सहन करना होगा। जीवात्मा को कुछ भी स्वाधीनता नहीं है। सब कुछ पहले से ही निर्दिष्ट है—हम क्या करेंगे, हमें क्या क्या अधिकार है, हम क्या-क्या सुख-दुःख भोगेंगे, सभी कुछ पहले से ही निर्दिष्ट है। हमारा कर्तव्य है—धैर्य से उन सभों का भोग करते जाना। यदि हम ऐसा न करें तो और भी अधिक कष्ट पायेंगे। किस तरह से हमने इसको जाना है?—क्योंकि वेद ऐसा कहते हैं।" वे भी वेद के श्लोक उद्धृत करते हैं, उनके मत-सम्मत वेद का अर्थ भी है; वे इन सभों को प्रमाण कह कर सभी को उन्हें मानने के लिए कहते हैं और तदनुसार चलने का उपदेश देते हैं।

फिर अनेक ऐसे भी दार्शनिक हैं जो मायावाद स्वीकार नहीं करते, पर उनका मत मायावाद और द्वैतवाद के बीच का है। वे हैं परिणामवादी। वे कहते हैं, जीवात्मा की उन्नति तथा अवनति—विभिन्न परिणाम ही—जगत् की प्रकृत व्याख्या है। वे रूपक भाव से वर्णन करते हैं कि समस्त आत्मा एक बार संकोच को और फिर विकास को

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प्राप्त होते हैं । समस्त जगत् ही जैसे भगवान का शरीर है । ईश्वर समस्त प्रकृति एव आत्माओ के आत्मा स्वरूप है ।

सृष्टि का अर्थ है ईश्वर के स्वरूप का विकास—कुछ समय तक यह विकास जारी रहकर फिर संकुचित होने लगता है। प्रत्येक जीवात्मा के लिए इस संकोच का कारण है—असत् कर्म। मनुष्य के असत् कर्म करने से उसकी आत्मा की शक्ति क्रमशः संकुचित होने लगती है—जितने दिनो तक वह सत्कर्म आरंभ नही करता । तब फिर उसका विकास होने लगता है। इन भारतीय विभिन्न मतो मे—एव मेरे विचार मे, जान मे या अनजान मे जगत् के सभी मतो मे—एक साधारण भाव दिखाई देता है, मै उसे “मनुष्य का देवत्व” या ईश्वरत्व कहना चाहता हूँ । जगत् मे ऐसा कोई मत नहीं है, प्रकृत धर्म नाम के उपयुक्त ऐसा कोई धर्म नहीं है जो किसी न किसी तरह पौराणिक या रूपक मात्र से ही हो अथवा दर्शनो की परिमार्जित स्पष्ट भाषा मे हो, यह भाव प्रकाशित न करता हो कि जीवात्मा जो कुछ भी हो, अथवा ईश्वर के साथ उसका जो भी सम्बन्ध हो, वह स्वरूपतः शुद्ध स्वभाव एव पूर्ण है। पूर्णानन्द और ऐश्वर्य उसके प्रकृतिगत हैं; दुःख या अनैश्वर्य उसकी प्रकृति नहीं है। यही दुख किसी रूप मे उसमे आगया है । सभी अमार्जित मतो मे इस अशुभ के व्यक्तित्व ( Personified Evil ) की कल्पना कर शैतान या अहीमन को इन अशुभो का सृष्टिकर्ता कहकर अशुभो के अस्तित्व की व्याख्या की जा सकती है ।

दूसरे मतो के अनुसार एक ही आधार मे ईश्वर और शैतान दोनों का भाव आरोपित किया जा सकता है, एव किसी प्रकार की

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युक्ति दिए बिना ही वे कहते है कि वह चाहे जिसे सुखी या दुखी करता है। फिर कुछ अधिक चिन्ताशील व्यक्तिगण मायावाद आदि के द्वारा अशुभ की व्याख्या करने की चेष्टा कर सकते हैं। किन्तु एक विषय सभी मतो मे अत्यन्त स्पष्ट रूप से प्रकाशित है और वह है हमारा प्रस्तावित विषय—आत्मा का मुक्त स्वभाव। ये सभी दार्शनिक मत और प्रणालियाँ केवल मन के व्यायाम और बुद्धि की कसरत मात्र हैं। एक महान उज्ज्वल धारणा है—जो मुझे विशेष स्पष्ट प्रतीत होती है, एवं जो सभी देश तथा धर्म के कुसंस्कारो के बीच प्रकाश पाती है, और वह यही है कि मनुष्य देवस्वभाव है,—देवभाव ही हमारा स्वभाव है, हम ब्रह्मस्वरूप हैं।

वेदान्त कहता है, और जो अन्य कुछ है, वह उसका उपाधि-स्वरूप मात्र है। कुछ मानो उसके ऊपर आरोपित हुआ है, किन्तु उसके देवस्वभाव का किसी से भी विनाश नहीं होता। वह जैसा अतिशय साधुप्रकृति व्यक्ति मे है, वैसा ही एक बडे पतित व्यक्ति में भी वर्तमान है। इस देवस्वभाव को जगाना पडेगा, तभी उसका कार्य होगा। हमे उसका आह्वान करना होगा, तभी वह प्रकाशित होगा। पुराने लोग समझते थे, चकमक पत्थर में आग रहती है, उसी आग को बाहर निकालने के लिये केवल इस्पात का घर्षण आवश्यक है। आग सूखी लकडी के दो टुकड़ों मे वास करती है, घर्षण केवल उसे प्रकाशित करने के लिये आवश्यक है। अतएव यह अग्नि—यह स्वाभाविक मुक्तभाव और पवित्रता प्रत्येक आत्मा का स्वभाव है, आत्मा का गुण नहीं, क्योंकि गुण तो उपार्जित किया जा सकता है, अतएव वह फिर नष्ट भी हो सकता है। मुक्ति या मुक्त स्वभाव कहकर जो

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समझा जाता है, आत्मा कहने से भी उसी का बोध होता है—इस प्रकार सत्ता या अस्तित्व एवं ज्ञान भी आत्मा का स्वरूप है—आत्मा के साथ अभिन्न है। यह सत् चित् आनन्द आत्मा का स्वभाव है, आत्मा का जन्मजात अधिकार स्वरूप है, हम जो इन सभी अभिव्यक्तियों को देखते हैं, वे आत्मा के स्वरूप के विभिन्न प्रकार मात्र हैं—वह किसी समय अपने को मृदुभाव से और किसी समय उज्ज्वल भाव से प्रकाशित करती है। यहाँ तक कि मृत्यु अथवा विनाश भी उसी प्रकृत सत्ता का प्रकाश मात्र है। जन्म-मृत्यु, क्षय-वृद्धि, उन्नति-अवनति, सभी उस एक अखण्ड सत्ता के विभिन्न प्रकाशमात्र है। इसी प्रकार हमारा साधारण ज्ञान भी, वह चाहे विद्या अथवा अविद्या किसी भी रूप से प्रकाशित क्यो न हो, उसी चित् का, उसी ज्ञान स्वरूप का प्रकाश है; उसकी विभिन्नता प्रकारगत नहीं है, अपितु परिमाण-गत है। छोटे कीड़े जो तुम्हारे पैर के पास घूमते हैं, उनके ज्ञान में और स्वर्ग के श्रेष्ठतम देवता के ज्ञान मे भिन्नता प्रकारगत नहीं है, किन्तु परिमाणगत है। इसी कारण वेदान्ती मनीषी निर्भय होकर कहते हैं कि हम अपने जीवन मे जो सब सुखोपभोग करते हैं, यहाँ तक कि अतिघृणित आनन्द भी – वे आत्मा के ही स्वरूपभूत, उसी एक ब्रह्मानन्द के प्रकाश हैं।

यही भाव वेदान्त का सर्वप्रधान भाव ज्ञात होता है, और जैसा मैंने पहले ही कहा है, मुझे मालूम होता है कि सभी धर्मों का यही मत है। मै इस प्रकार का कोई धर्म नहीं जानता, जिसके मूल मे यह मत नहीं है। सभी धर्मों के भीतर यह सार्वभौमिक भाव रहा है। उदाहरण के तौर पर बाइबिल की कथा ले लीजिए—उसमें

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रूपक के ढंग से कथा वर्णित है,—आदि मानव आदम अत्यन्त पवित्र स्वभाव के थे, अन्त मे उनके असत्कार्यों से उनकी पवित्रता नष्ट हुई। इस रूपक से यह प्रमाणित होता है कि इस ग्रन्थ के लेखक विश्वास करते थे कि आदिम मानव का ( अथवा वे उसका अन्य किसी भी भाव से वर्णन क्यो न करे ) या प्रकृत मानव का स्वरूप आदि से ही पूर्ण था। हमें जो तरह तरह की दुर्बलताये अथवा अपवित्रता दिखाई देती है, वह सब उसके ऊपर आरोपित आवरण या उपाधि मात्र है, एवं उसी धर्म का परवर्ती इतिहास यह बतलाता है कि उसके अनुयायी केवल उसी पूर्व अवस्था को पुनः प्राप्त करने की सम्भावना मे ही नहीं, वरन् उसकी निश्चितता में भी विश्वास करते है। यही समस्त बाइविल का—प्राचीन तथा नवीन टेस्टामेण्ट का—इतिहास है।

मुसलमानों के सम्बन्ध मे भी ऐसा ही है। वे भी आदम तथा उसकी जन्मजात पवित्रता पर विश्वास करते है। और उनकी यह धारणा है कि हज़रत मुहम्मद के आगमन से उस लुप्त पवित्रता के पुनरुद्धार का उपाय प्राप्त हो चुका है।

बौद्धो के विषय मे भी यही है। वे भी निर्वाण नामक अवस्था-विशेष पर विश्वास रखते है। यह अवस्था द्वैत जगत् से अतीत अवस्था है। वेदान्ती लोग जिसे ब्रह्म कहते है, यह निर्वाण अवस्था भी ठीक वही है। और बौद्ध धर्म के सम्पूर्ण उपदेश का यही धर्म है कि उस विनष्ट निर्वाण अवस्था को फिरसे प्राप्त करना होगा।

इस तरह देखा जाता है कि सभी धर्मों में यही एक तत्व पाया जाता है कि जो तुम्हारा नहीं है उसे तुम कभी नहीं पा सकते। इस

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विश्वब्रह्माण्ड मे तुम किसी के भी निकट ऋणी नही हो। तुम्हे अपना जन्मप्राप्त अधिकार ही प्राप्त करना है। एक प्रसिद्ध वेदान्ताचार्य ने यही भाव अपने किसी ग्रन्थ के नाम में ही बड़े सुन्दर भाव से प्रकट किया है। ग्रन्थ का नाम है 'स्वराज्यसिद्धि' अर्थात् हमारा अपना राज्य, जो खो गया था, उसकी पुनःप्राप्ति। वही राज्य हमारा है, हमने उसे खो दिया है, फिर हमे उसे प्राप्त करना होगा। किन्तु मायावादी कहते है—यह राज्यनाश केवल हमारा भ्रम मात्र है, हमारे राज्य का नाश तो कभी हुआ ही नही—बस यही दोनों मे भेद है।

यद्यपि इस विषय में कि हमारा जो राज्य था, उसे हमने खो दिया ह, सभी धर्म-प्रणालियाँ एकमत है तथापि वे उसे फिर से पाने के उपाय के बारे मे विभिन्न उपदेश दिया करती है। कोई कहते है—कुछ विशिष्ट क्रियाकलाप, प्रतिमा आदि की पूजा-अर्चना करने से और स्वयं कुछ विशेष नियमानुसार जीवन यापन करने से वह स्वराज्य मिल सकता है। कुछ और लोग कहते है—यदि तुम प्रकृति से अतीत पुरुष के सम्मुख अपने को नतकर रोते रोते उसके निकट क्षमा प्रार्थना करो, तो तुम पुनश्च उस राज्य को प्राप्त कर लोगे। दूसरे कोई कहते है—यदि तुम इस पुरुष से अन्तःकरणपूर्वक प्रेम कर सको, तो तुम फिरसे इस राज्य को प्राप्त कर सकोगे। उपनिषद मे ये सभी उपदेश पाये जाते है। क्रमशः हम तुम्हे जितना उपनिषद् समझायेगे, उतना ही तुम यह समझते जाओगे। किन्तु सर्वश्रेष्ठ अन्तिम उपदेश यह है कि तुम्हारे रोने का कुछ भी प्रयोजन नहीं है। तुम्हारे इन क्रियाकलापो की किंचिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं है। क्या क्या करने से राज्य की पुनः प्राप्ति होगी, इस चिन्ता की तुम्हे कोई आवश्यकता

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नहीं है, क्योकि तुम्हारा राज्य तो कभी नष्ट हुआ ही नहीं। जिसे तुमने कभी खोया ही नहीं, उसे पाने के लिये इस प्रकार की चेष्टा की आवश्यकता ही क्या? तुम स्वभावतः मुक्त हो, तुम स्वभावतः शुद्ध-स्वभाव हो। यदि तुम अपने को मुक्त समझकर भावना कर सको, तो तुम इसी मुहूर्त मे मुक्त हो जाओगे, और यदि तुम अपने को बद्ध समझकर भावना करो, तो तुम बद्ध ही रहोगे। केवल इतना ही नहीं; इस बार अवश्य ही जो कुछ हम कहेंगे, उसे हम अत्यन्त साहस के साथ कहेगे—यह बात मैने इन वक्तृताओं के आरम्भ करने के पूर्व ही कही थी। तुम्हे यह सुनकर इस क्षण भय हो सकता है, किन्तु तुम जितना चिन्तन करोगे, एव प्राण प्राण मे अनुभव करोगे, उतना ही देखोगे कि मेरी बात सत्य है। कारण, कल्पना करो कि मुक्त भाव तुम्हारा स्वभावसिद्ध नहीं है; तब तुम किसी भी प्रकार मुक्त नहीं हो सकोगे। कल्पना करो कि तुम मुक्त थे, इस समय किसी कारण से उस मुक्त स्वभाव को खोकर बद्ध हुए हो तो ऐसा होने पर प्रमाणित होता है कि तुम पहले से ही मुक्त नहीं थे। यदि तुम मुक्त थे तो किसने तुम्हे बद्ध किया? जो स्वतन्त्र है, वह कभी भी परतन्त्र नहीं हो सकता; और यदि हो सकता है तो प्रमाणित हुआ कि वह कभी भी स्वतन्त्र नहीं था—यह स्वातन्त्र्य-प्रतीति भ्रम मात्र थी।

अब तुम इन दोनों पक्षों मे कौन सा पक्ष ग्रहण करोगे? दोनो पक्षों की युक्ति-परंपरा को स्पष्ट करने पर हमें निम्नलिखित बाते दिखाई देती है। यदि कहो कि आत्मा स्वभावतः शुद्धस्वरूप एवं मुक्त है, तो अवश्यमेव यह सिद्धान्त स्थिर करना होगा कि जगत् मे ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो उसे बाँध सके। किन्तु जगत् में यदि इस

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प्रकार की कोई वस्तु हो, जिससे उसे बद्ध किया जा सके, तो अवश्य यह कहना होगा कि आत्मा मुक्तस्वभाव थी ही नही, अतएव तुमने उसे जो मुक्तस्वभाव कहा था वह तुम्हारा भ्रम मात्र है। अतएव तुम्हे यह सिद्धान्त अवश्य ही स्वीकार करना होगा कि आत्मा स्वभाव से ही मुक्तस्वरूप है। इसके अतिरिक्त और कुछ हो ही नही सकती। मुक्त-स्वभाव का अर्थ है—किसी बाह्य वस्तु के अधीन न होना—अर्थात् उसके अतिरिक्त कोई भी दूसरी वस्तु उसके ऊपर हेतु रूप मे कोई कार्य नही कर सकती।

आत्मा कार्य-कारण-सम्बन्ध से अतीत है, और इसीसे आत्मा के सम्बन्ध मे हमारी उच्च उच्च धारणाये उत्पन्न होती है। यदि यह अस्वीकार किया जाय कि आत्मा स्वभावतः मुक्त है अर्थात् बाहर की कोई भी वस्तु उसके ऊपर कार्य नही कर सकती तो आत्मा के अमरत्व की कोई धारणा प्रस्थापित नहीं की जा सकती। क्योंकि, मृत्यु हमारे बहिःस्थित किसी वस्तु के द्वारा किया हुआ कार्य है। इससे ज्ञात होता है कि हमारे शरीर के ऊपर बाहरी कोई दूसरा पदार्थ कार्य कर सकता है, मानलो मैने थोड़ा सा विष खाया, उससे मेरी मृत्यु हुई—इससे जाना जाता है कि हमारे शरीर के ऊपर विष नामक बाहरी कोई पदार्थ कार्य कर सकता है। यदि आत्मा के सम्बन्ध में यह सत्य हो, तो आत्मा भी बद्ध है। किन्तु यदि यह सत्य है कि आत्मा मुक्तस्वभाव है, तो यह भी स्वभावतः ज्ञात होता है कि बाहरी कोई भी पदार्थ उसके ऊपर कार्य नहीं कर सकता है और न कर ही सकेगा। ऐसा होने पर आत्मा कभी मर नहीं सकती, एवं आत्मा कार्य-कारण-सम्बन्ध मे अतीत भी होगी। आत्मा का मुक्त स्वभाव, उसका अमरत्व एवं

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उसका आनन्द स्वभाव, सभी इस बात के ऊपर निर्भर है कि आत्मा कार्य-कारण-सम्बन्ध एवं इस माया से अतीत है। अब यदि इस समय तुम कहो कि आत्मा का स्वभाव पहले पूर्ण मुक्त था, इस समय वह बद्ध हो गई है, तो इससे यही जाना जाता है कि वस्तुतः वह मुक्त-स्वभाव थी ही नहीं। तुम जो कहते हो कि वह मुक्तस्वभाव थी, वह असत्य है। किन्तु दूसरी ओर हम देखते हैं कि हम वास्तविक मुक्त-स्वभाव हैं; यह जो हम बद्ध हुए हैं ऐसा ज्ञात हो रहा है यह हमारी केवल भ्रान्ति है। अब इन दोनों पक्षों में कौन सा पक्ष लोगे ? या तो पहले पक्ष को भ्रान्ति कहो या दूसरे पक्ष को भ्रान्ति कह कर स्वीकार करो। मैं तो निश्चय ही द्वितीय पक्ष को भ्रान्ति कहूँगा। यही हमारे समुदय भाव और अनुभूति के साथ संगत है। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि मैं स्वभावतः मुक्त हूँ। बद्ध भाव सत्य एवं मुक्त भाव भ्रमात्मक हो, यह ठीक नहीं।

सभी दर्शनों में स्थूल भाव से यही विचार चलता है। यहाँ तक देखा जाता है कि अत्यन्त आधुनिक दर्शन मे भी यह विचार प्रविष्ट हुआ है। इस सम्बन्ध में दो दल हैं; एक दल कहता है, आत्मा नामक कोई वस्तु नहीं है, वह तो केवल भ्रान्ति है। इस भ्रान्ति का कारण सभी जडकणों का वारंवार स्थान-परिवर्तन है; यह समवाय—जिसे तुम शरीर, मस्तिष्क आदि नामों से पुकारते हो, उसी के स्पन्दन से, उसी की गतिविशेष से एवं उसके सभी अंशों के लगातार स्थान-परिवर्तन से यह मुक्त स्वभाव की धारणा आती है। कुछ बौद्ध सम्प्र-दाय भी थे, उनका कहना था कि एक मशाल लो, और उसे चारों ओर लगातार ज़ोर से घुमाओ, तो एक वर्तुलाकार प्रकाश दिखाई पड़ेगा। वस्तुतः इस गोलाकार प्रकाश का कोई अस्तित्व नहीं है, क्योंकि यह

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मशाल प्रत्येक क्षण में स्थान-परिवर्तन करती है। उसी तरह हम भी छोटे छोटे परमाणुओ की समष्टि मात्र हैं, उन परमाणुओं के ज़ोर से घूमने से यह ‘अहं’ भ्रान्ति उत्पन्न होती है। अतएव एक मत यह हुआ कि शरीर सत्य है, आत्मा का कोई अस्तित्व ही नहीं है। दूसरा मत यह है कि चिन्ताशक्ति के द्रुत स्पन्दन से, जड़ रूप एक भ्रान्ति की उत्पत्ति होती है, वस्तुतः जड का कोई अस्तित्व ही नहीं है। यह तर्क आज तक चल रहा है,—एक दल कहता है—आत्मा भ्रम मात्र है, दूसरा इसी तरह जड़ को भ्रम कहता है। तुम कौन सा मतलोगे ?

हम तो निश्चय ही आत्मास्तित्ववाद को स्वीकार कर जड़ को भ्रमात्मक कहेगे। युक्ति दोनों ओर बराबर है, केवल आत्मा के निरपेक्ष अस्तित्व की ओर वाली युक्ति अपेक्षाकृत प्रबल है; क्योंकि जड़ क्या है इसे किसी ने कभी देखा नहीं। हम केवल स्वयं को ही अनुभव कर सकते हैं, मैंने ऐसा मनुष्य नहीं देखा, जिसने स्वयं के बाहर जाकर जड का अनुभव किया हो। कोई कभी कूद कर अपनी आत्मा के बाहर नहीं जा सकता। अतएव आत्मा के पक्ष मे यह एक दृढ़तर युक्ति हुई। द्वितीयतः आत्मवाद जगत् की सुन्दर व्याख्या हो सकता है, किन्तु जड़वाद नहीं। अतएव जड़वाद के द्वारा जगत् की व्याख्या अयौक्तिक है।

पहले जो आत्मा के स्वाभाविक मुक्त और बद्ध भाव सम्बन्धी विचार का प्रसंग उठा था, जड़वाद और आत्मवाद का तर्क उसी का केवल स्थूल भाव है। दर्शनसमूह का सूक्ष्म भाव मे विश्लेषण करने पर तुम देखोगे कि उनमे भी इन दोनों मतों का संघर्ष है। अति आधुनिक दर्शनसमूह में भी हम किसी दूसरे रूप मे उसी प्राचीन

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विचार को ही देखते हैं। एक दल कहता है—मनुष्य का तथाकथित पवित्र और मुक्त स्वभाव भ्रम मात्र है—दूसरे इसी प्रकार बद्धभाव को ही भ्रमात्मक कहते हैं। इस जगह भी हम दूसरे दल के साथ ही सहमत है—हमारा बद्धभाव ही भ्रमात्मक है।

अतएव वेदान्त का सिद्धान्त यह है कि हम बद्ध नहीं है, अपितु नित्यमुक्त है। इतना ही नहीं बल्कि यह सोचना भी कि हम बद्ध है, अनिष्टकर है, भ्रम है, अपने आपको मोह मे डालकर अभिभूत करना है। जहाँ तुमने कहा कि मै बद्ध हूँ, दुर्बल हूँ, असहाय हूँ, तभी तुम्हारा दुर्भाग्य आरम्भ होगया, तुमने अपने पैरो मे और एक शृंखला डाल ली। इसलिये ऐसी बात कभी न कहना और न इस प्रकार कभी सोचना ही। मैने एक आदमी की कहानी सुनी है; वह वन मे रहता था, एवं दिनरात 'शिवोऽहं, शिवोऽहं' उच्चारण करता था। एक दिन एक बाघ ने उसके ऊपर आक्रमण किया और उसे पकड़कर ले चला। नदी के दूसरे तट पर कुछ लोग यह सब दृश्य देख रहे थे। परन्तु उस व्यक्ति की 'शिवोऽह, शिवोऽहं' की ध्वनि लगातार जारी थी। जितनी देर तक उसमे बोलने की शक्ति थी, बाघ के मुख मे पड़कर भी वह 'शिवोऽह, शिवोऽहं' कहता ही रहा, चुप नहीं हुआ। इस प्रकार और भी अनेक व्यक्तियों की बात सुनी गई है। कई व्यक्तियों के शत्रुओं ने उनके टुकडे टुकडे कर डाले, परन्तु वे उन्हे आशीर्वाद ही देते रहे। 'सोऽहं सोऽह, मै ही वह, मै ही वह, तुम भी वही'। मै निश्चित पूर्णस्वरूप हूँ, मेरे सभी शत्रु भी पूर्णस्वरूप है। तुम भी वही हो, और मै भी वही हूँ। यही वीर की बान है।

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फिर भी द्वैतवादियों के धर्म मे भी अनेक अपूर्व उत्तम उत्तम भाव है—प्रकृति से पृथक् हमारे उपास्य और प्रेमास्पद सगुण ईश्वर हैं—ऐसा सगुण ईश्वरवाद अत्यन्त अपूर्व है। अनेक समय इससे प्राण शीतल होजाता है—किन्तु वेदान्त कहता है, प्राण की यह शीतलता अफीम खानेवालो की नशा के समान अस्वाभाविक है। और इससे दुर्बलता आती है और जगत् में पहले बलसंचार की जितनी आवश्यकता नहीं थी, आज जगत् मे उसी बलसंचार—शक्तिसंचार की उतनी ही अधिक आवश्यकता है। वेदान्त कहता है—दुर्बलता ही संसार में समस्त दुःख का कारण है, इसीसे सारे दुःख-भोग पैदा होते है। हम दुर्बल है इसीलिये इतने दुःख को भोगते हैं। हम दुर्बलता के कारण ही चोरी-डकैती, झूठ-ठगी तथा इसी प्रकार के अनेकानेक अन्य दुष्कर्म करते हैं। दुर्बल होने के कारण ही हम मृत्यु के मुख मे गिरते है। जहाँ हमे दुर्बल बनाने वाला कोई नहीं है, वहाँ मृत्यु अथवा दूसरा किसी प्रकार का दुःख नही रह सकता। हम लोग केवल भ्रान्तिवश ही दुःख भोगते है। इस भ्रान्ति को उन्मूलित करो, सभी दुःख चले जायेंगे। यह तो बहुत सरल बात है। इन सभी दार्शनिक विचारो और कठोर मानसिक व्यायाम के भीतर से होकर हम समस्त ससार के सर्वापेक्षा सहज एव सरल आध्यात्मिक सिद्धान्त पर पहुँच जायेंगे।

अद्वैत वेदान्त जिस रूप मे आध्यात्मिक सिद्धान्त स्थापित करता है, वही सबसे अधिक सहज तथा सरल है। भारत तथा अन्य सभी स्थानो मे इस विषय मे एक बड़ा भ्रम उत्पन्न हुआ था। वेदान्त के आचार्यों ने स्थिर किया था कि यह शिक्षा सार्वजनीन नहीं बनाई