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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages
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जगत् १८७

ही स्वयं को प्रकाशित नहीं कर सकता। ज्ञान ही सब जड़ो को प्रकाशित करता है। यह जो सामने हॉल दिखाई दे रहा है ज्ञान को ही इसका मूल कहना पड़ेगा, क्योकि बिना किसी न किसी ज्ञान के सहारे उसका अस्तित्व हम कभी अनुभव ही नहीं कर सकते थे। यह शरीर स्वप्रकाश नहीं है—यदि वैसा ही होता तो मृत-शरीर भी स्वप्रकाशित होता। मन अथवा आध्यात्मिक शरीर भी कभी स्वप्रकाश नहीं हो सकता। वह ज्ञानस्वरूप नहीं है। जो स्वप्रकाश है उसका कभी ध्वंस नही होता। जो दूसरे के आलोक से आलोकित है उसका आलोक कभी रहता है, कभी नहीं। किन्तु जो स्वयं आलोकस्वरूप है उसके आलोक का क्या आविर्भाव-तिरोभाव, ह्रास अथवा वृद्धि कभी हो सकती है? हम देख पाते है कि चन्द्रमा का क्षय होता है, फिर वह बढ़ता जाता है—क्योंकि वह सूर्य के आलोक से ही आलोकित है। यदि लोहे का गोला आग मे फेंक दिया जाय और उसे लाल सा बनाया जाय तो उससे आलोक निकलता रहेगा, किन्तु वह दूसरे का आलोक है, इसलिये वह शीघ्र ही लुप्त हो जायगा। अतएव उसी आलोक का क्षय होता है जो दूसरे से प्राप्त किया गया हो, जो स्वप्रकाश आलोक नहीं है।

अब हमने देखा है कि यह स्थूल देह स्वप्रकाश नहीं है, वह स्वयं अपने को नहीं जान सकती। मन भी स्वयं को नहीं जान सकता। क्यो? क्योकि मन की शक्ति मे ह्रास-वृद्धि होती है, कभी उसमे बहुत जोर रहता है तो कभी वह कमज़ोर बन जाता है। कारण, बाह्य सभी वस्तुएँ उस पर अपना अपना प्रभाव डालकर उसे

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या तो शक्तिशाली बना सकती है, या शक्तिहीन भी। अतएव मन के भीतर से जो आलोक आ रहा है वह उसका निजी आलोक नहीं है। फिर वह किसका है? वह ऐसे किसी का आलोक अवश्य होगा जिसके लिये वह आलोक कोई उधार लिया हुआ नहीं है, या जो दूसरे किसी आलोक का प्रतिबिम्ब भी नहीं है, किन्तु जो स्वयं ही आलोकस्वरूप है। इसीलिये वह आलोक या ज्ञान उसी पुरुष का स्वरूप होने के कारण कभी नष्ट नहीं हो सकता, कभी उसका क्षय नहीं होता, वह न तो कभी बलवान हो सकता है, न कमजोर। वह स्वप्रकाश है, वह आलोकस्वरूप है। हम यों न समझें कि 'आत्मा जानता है,' वह तो ज्ञानस्वरूप है। यह नहीं कि आत्मा का अस्तित्व है, लेकिन वह अस्तित्व स्वरूप है। आत्मा सुखी है ऐसी कोई बात नहीं, परन्तु आत्मा सुखस्वरूप है। जो सुखी होता है वह उस सुख को किसी दूसरे से प्राप्त करता है—वह और किसी का प्रतिबिम्ब है। जिसका ज्ञान है उसने अवश्य ही उस ज्ञान को किसी दूसरे से प्राप्त किया है, वह प्रतिबिम्ब स्वरूप है। जिसका अस्तित्व है उसका वह अस्तित्व दूसरे किसी के अस्तित्व पर निर्भर करता है। जहाँ गुण व गुणी का भेद है वहाँ ऐसा समझना चाहिये कि वे गुण गुणी के ऊपर प्रतिबिम्बित हुए हैं। किन्तु ज्ञान, अस्तित्व या आनन्द—ये आत्मा के धर्म नहीं हैं, वे आत्मा के स्वरूप हैं।

फिर प्रश्न पूछा जा सकता है कि हम इस बात को क्यों स्वीकार कर लें? क्यों हम यह स्वीकार करले कि आनन्द, अस्तित्व तथा स्वप्रकाशत्व आत्मा का स्वरूप है, आत्मा का धर्म नहीं? इसका

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उत्तर यह है कि हम पहले ही देख चुके है कि मन के प्रकाश मे शरीर का प्रकाश होता है। जब तक मन रहता है तब तक उसका प्रकाश होता रहता है, जब मन लुप्त हो जाता है तब इस देह का प्रकाश भी बंद हो जाता है। आँखो से यदि मन चला जाय तो तुम लोगो की ओर आँखे डालने पर भी हम तुम्हे नहीं देख पायेगे; अथवा श्रवणेन्द्रिय से वह यदि अनुपस्थित रहे तो हम जरा सी आवाज भी नहीं सुन सकते। यही हाल सभी इन्द्रियो के बारे मे है। अतएव हम देख रहे हैं कि मन के प्रकाश मे ही शरीर का प्रकाश है। फिर मन के विषय मे वही एक सी बात। बाहरी सभी वस्तुएँ उसके ऊपर अपना अपना प्रभाव डाल रही है, अति तुच्छ कारण से ही उसका परिवर्तन हो सकता है, मस्तिष्क के भीतर कोई मामूली गडबडी होने से ही उसमे परिवर्तन हो जाता है। अतएव मन भी स्वप्रकाश नहीं हो सकता, क्योकि यह तो प्राकृतिक नियम है कि जो किसी वस्तु का स्वरूप होता है उसका कभी कोई परिवर्तन नही हो सकता। केवल जो अन्य वस्तु का धर्म है, जो दूसरो का प्रतिबिम्ब स्वरूप है उसी का परिवर्तन हुआ करता है। किन्तु अब एक प्रश्न हमारे सामने आता है कि हम यह क्यो नहीं मान लेते कि आत्मा का प्रकाश, उसका ज्ञान व आनन्द भी उसी तरह दूसरे से लिये हुए हैं? इस तरह मान लेने से हमारी ग़लती यह होगी कि ऐसी स्वीकृति का कोई अन्त नही मिलेगा—फिर प्रश्न आयेगा उसे कहाँ से आलोक मिला है? यदि हम कहे कि वह दूसरी किसी आत्मा से मिला है तो फिर प्रश्न होगा कि उसने कहाँ से वह आलोक प्राप्त किया ? अतएव अन्त मे हमे ऐसे एक स्थान पर पहुँचना होगा जिसका आलोक दूसरे से नहीं आया है। इसलिये इस विषय मे न्यायसंगत सिद्धान्त यही है कि जहाँ पहले ही स्वप्रकाशत्व दिखाई देगा

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वहीं ठहरना होगा, और अधिक आगे जाने की जरूरत नहीं।

अतएव हमने देखा कि पहले मनुष्य की यह स्थूल देह है, उसके पीछे एक सूक्ष्म शरीर है, उसके पश्चात् मनुष्य का प्रकृत रूप छिपा हुआ है जिसे हम आत्मा कहते हैं। हमने देखा है कि स्थूल देह की सारी शक्तियाँ मन से प्राप्त होती है—मन फिर आत्मा के आलोक से आलोकित है।

आत्मा के स्वरूप के बारे मे फिर विविध प्रश्न पूछे जा सकते हैं। आत्मा स्वप्रकाश है, सच्चिदानद ही आत्मा का स्वरूप है। इस युक्ति से यदि आत्मा का अस्तित्व मान लिया जाय तो स्वभावतः यह प्रमाणित होता है कि वह शून्य से पैदा नही हो सकता। जो स्वय स्वप्रकाश है, जो अन्यवस्तुनिरपेक्ष है वह कभी शून्य से उत्पन्न नही हो सकता। हमने देखा है कि यह जड़ जगत भी शून्य से नहीं आया है—तो फिर आत्मा कैसे आ सकता है ? अतएव सर्वदा ही उसका अस्तित्व था। ऐसा समय कभी नही था जब उसका कोई अस्तित्व न था, क्योकि यदि तुम कहो कि कभी आत्मा का अस्तित्व नहीं था तो प्रश्न यह है कि समय का कहाँ अवस्थान था ? काल तो आत्मा के भीतर ही अवस्थित है। जब मन के ऊपर आत्मा की शक्ति प्रतिबिम्बित होती है और मन चिन्तनकार्य मे लग जाता है तभी काल की उत्पत्ति होती है। जब आत्मा नही था तो चिन्ता भी नहीं थी। फिर चिन्ता न रहने से समय भी नहीं रह सकता है। अतएव जब समय आत्मा मे अवस्थित है तब आत्मा समय मे अवस्थित है यह हम कैसे कह सकते हैं ? उसका न तो जन्म है, न मृत्यु, वह केवल विभिन्न स्तरो मे से आगे बढ़ती जाती है। धीरे धीरे वह निम्नावस्था से उच्च भाव मे स्वयं को प्रकाशित करती है। मन के

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भीतर से शरीर के ऊपर कार्य करके वह अपनी महिमा का विकास कर रही है, फिर शरीर से वहिर्जगत का ग्रहण तथा अनुभव कर रही है। वह एक शरीर ग्रहण कर उसका उपयोग करती है; जब उस शरीर के द्वारा और कोई कार्य करने की संभावना नहीं रहती है तब वह दूसरे शरीर को ग्रहण कर लेती है।

अब आत्मा के पुनर्जन्म के बारे मे प्रश्न आता है। पुनर्जन्म के नाम से आदमी डर जाते है और लोगो के कुसस्कार ने इस तरह अपनी जडे जमा रखी है कि चिन्ताशील आदमी भी विश्वास कर लेगे कि हम शून्य से पैदा हुए है, फिर महायुक्ति के साथ सिद्धान्त स्थापित कर यह निश्चय करने की कोशिश करेगे की यद्यपि हम शून्य से आये है तथापि हम चिरकाल तक रहेगे। जो शून्य से आया है वह जरूर शून्य मे ही मिल जायगा। हममे कोई भी शून्य से नहीं आया है इसलिये हम कभी शून्य मे नहीं मिट जायेगे। अनादिकाल से हमारी उपस्थिति है व चिरकाल तक हम रहेगे और जगतब्रह्माण्ड मे ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो हम लोगो का अस्तित्व मिटा दे। इस पुनर्जन्मवाद से हमे किसी तरह डरना नहीं चाहिये, क्योकि वही मानवो की नैतिक उन्नति का प्रधान सहायक है। चिन्ताशील व्यक्तियो के मतानुसार यही न्यायसगत सिद्धान्त है। यदि भविष्य में चिरकाल के लिये तुम्हारा अस्तित्व रहना सम्भव हो तो यह भी सच है कि अनादिकाल से तुम्हारा अस्तित्व था। इस बात को कोई अस्वीकार नहीं कर सकता है। इस मत के विरुद्ध कई आपत्तियाँ उठाई गई हैं, इनका निराकरण करने की चेष्टा करूँगा। यद्यपि ये आपत्तियाँ कुछ साधारण सी ही हैं तथापि हमे इनका उत्तर देना

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ही पडेगा; क्योकि हम जानते है कि बड़े वडे चिन्ताशील व्यक्ति भी कभी कभी वालकोचित बाते किया करते है। लोग जो कहते है कि ‘ऐसा कोई असंगत मत नहीं है जिसका समर्थन करने के लिये कोई दार्शनिक आगे नहीं बढता है’ यह बिलकुल सच है। पहली शका यह है कि हमे अपने जन्म-जन्मान्तर की बाते क्यो याद नही रहती है? इस पर यह पूछा जा सकता है कि क्या इसी जन्म की सव वीती घटनाओ को हम याद कर सकते है? तुम लोगों मे से कितने वचपन की घटनाओं को स्मरण कर सकते है? बचपन की कोई वात तुम नही याद कर सकते, फिर यदि स्मृति-शक्तियो के ऊपर अस्तित्व निर्भर रहे तो यह कहना पड़ेगा कि वचपन मे तुम्हारा अस्तित्व ही नहीं था, क्योकि उस समय की कोई बात तुम याद नही कर सकते हो। यह कहना वेकार है कि यदि हम स्मरण कर सके तभी हम पूर्वजन्म का अस्तित्व स्वीकार करने को तैयार है। क्या इसका कोई कारण है कि पूर्वजन्म की बाते हमारे स्मरण मे रहेगी ही? उम समय का मस्तिष्क भी बिलकुल नष्ट हो गया है एव एक नये मस्तिष्क की रचना हुई है। अतीतकाल के सस्कारों का जो समष्टिभूत फल है वही हमारे मस्तिष्क मे आया है—उसी को लेकर मन हमारे इस शरीर मे अवस्थित है।

मै अब जिस दशा मे हूँ वह मेरे अनत अतीतकाल के कर्म के परिणाम का फल है; किन्तु मुझे उस अतीत का स्मरण करने से क्या प्रयोजन? कुसस्कारो का ऐसा प्रभाव है कि जो लोग पुनर्जन्मवाद नहीं मानते वे ही फिर कहते है कि एक समय हम वन्दर थे; किन्तु फिर उन्हे उस मर्कट-जन्म का स्मरण क्यो नही है? इसके कारणो की

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खोज करने का उन्हे साहस नही होता है। जब हम सुनते है कि प्राचीन काल के किसी साधु या ऋषि ने सत्य को प्रत्यक्ष किया है तो हम कह देते है कि वह सब भूल है; परन्तु यदि कोई कहे कि हक्सले का मत है या टिण्डाल ने बताया है तो हम तुरन्त सारी बाते मान लेते है। प्राचीन कुसस्कारों की जगह हम आधुनिक कुसंस्कार लाये है, धर्म के प्राचीन पोप के बदले हमने विज्ञान के आधुनिक पोप का स्वागत किया है! अतएव हमे मालूम हो गया कि स्मृति-सम्बन्धी शंका खोखली है। और पुनर्जन्म के बारे मे जिन आपत्तियो की अवतारणा की गयी है उनमे यही एक है जिसे विज्ञ लोग सामने ला सकते है।

हमने यह देखा है कि पुनर्जन्मवाद सिद्ध करने के लिये साथ ही साथ स्मृति भी रहे—यह प्रमाणित करने की कोई आवश्यकता नहीं है। फिर भी हम दावे के साथ यह कह सकते है कि अनेको मे ऐसी स्मृति आयी है और जिस जन्म मे तुम लोगो को मुक्तिलाभ होगा उस जन्म मे तुम लोग भी ऐसी स्मृति के अधिकारी बनोगे। तभी तुम्हे मालूम होगा कि जगत् स्वप्न-सा है, तभी तुम अन्तस्तल से अनुभव कर सकोगे कि तुम इस जगत् मे नट मात्र हो और यह जगत् रंग-भूमि है, तभी प्रचण्ड अनासक्ति का भाव तुम्हारे भीतर उदित होगा—तभी सब भोगवासनाएँ, जीवन से इतना प्रेम—यह संसार आदि, सब चिरकाल के लिये लुप्त हो जायेगे। तब तुम्हे स्पष्ट मालूम हो जायगा कि जगत् मे तुम कितने बार आये हो, कितने लाखो बार तुमने पिता, माता, पुत्र, कन्या, स्वामी, स्त्री, बन्धु, ऐश्वर्य, शक्ति लेकर इसी जगत् मे जीवन बिताया है। यह सब कितने बार हुआ था, फिर कितने बार चला गया था। कितने बार संसार-तरंग के सर्वोच्च शिखर पर तुम चढ़े थे और कितने ही बार नैराश्य के अतल गर्त में

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तुम गिर गये। जब स्मृति यह सब तुम्हारे मन मे ला देगी केवल तभी तुम वीर-से खडे हो सकोगे तथा ससार के कटाक्ष तुम हॅसकर उडा दे सकोगे। तभी वीर की तरह खडे होकर तुम कह सकोगे, “मृत्यो, तुझसे मै जरा भी नहीं डरता, तुम व्यर्थ क्यों मुझे डराने की चेष्टा कर रहे हो?” जब तुम जान जाओगे कि तुम पर मृत्यु का कोई प्रभाव नहीं है, तभी तुम मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकोगे एवं धीरे धीरे हम सभी इस मृत्युजयी अवस्था मे पहुचेगे।

आत्मा का पुनर्जन्म होता है इसका कौन सा युक्तियुक्त प्रमाण है? अब तक हम शका का समाधान कर रहे थे। हमने देखा कि पुनर्जन्मवाद अप्रमाणित करने के लिये जो युक्तियाँ उठाई जाती है वे खोखली है। अब पुनर्जन्मवाद के पक्ष मे जितनी युक्तियाँ हैं उनकी हम आलोचना करेगे। पुनर्जन्मवाद के बिना ज्ञान असंभव है। मानो मैने रास्ते पर एक कुत्ता देखा। मै कैसे जान पाया कि वह कुत्ता ही है? जैसे ही मेरे मन पर उसकी छाप पडी वैसे ही उसे मै अपने मन के पूर्वसंस्कारो के साथ मिलाने लगा। मैने देखा कि वहाँ मेरे समस्त पूर्व-संस्कार स्तर स्तर मे अवस्थित हैं। ज्योही कोई नया विषय आया त्योही मैने प्राचीन संस्कारो से उसकी तुलना की। जैसे ही मैने अनुभव किया कि उसी की भाँति और भी कई संस्कार वहाँ विद्यमान हैं, वैसे ही उसकी तुलना करने लगा—तभी मै तृप्त हुआ। मैने तब उसे कुत्ते के नाम से जान पाया, क्योकि पहले के कई संस्कारो के साथ वह मिल गया। जब हम उस जैसे संस्कार को अपने भीतर नहीं देख पाते हैं तभी हममे असतोप पैदा होता है। इसीको अज्ञान कहते है। और सन्तोष मिल जाने से ही ज्ञान कहलाता है। जब एक सेव

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जगत्

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गिरा तो मनुष्य को असंतोष हुआ। इसके बाद मनुष्य ने क्रमश इसी प्रकार की कई घटनाएँ देखीं। श्रृंखला की तरह ये घटनाएँ एक दूसरे से बंधी हुई थी। यह शृंखला क्या थी ? वह शृंखला यह थी कि सभी सेब गिरते है। और इसीको उसने 'माध्याकर्षण' का नाम दिया। अतएव हमने देखा कि पहले की अनुभूतियाँ न रहने से कोई नई अनुभूति प्राप्त करना असंभव है, क्योकि उस नयी अनुभूति से तुलना करने के लिये कुछ भी नही मिल सकेगा। इसलिये कई यूरोपीयन् दार्शनिको का जो मत है कि 'पैदा होते समय बच्चा ससारशून्य मन लेकर आता है' यदि सच हो तो संसार से उसे संस्कारशून्य मन लेकर जाना पड़ेगा क्योंकि नयी अनुभूति के साथ मिलने के लिये उसने कोई सस्कार ही नहीं हैं। अतएव हमने देखा कि इस पूर्वसंचित ज्ञान-भाडार के बिना कोई नया ज्ञान प्राप्त करना असंभव है। वस्तुतः हम सभी को पूर्वसचित ज्ञान-भांडार अपने साथ लेकर आना पडा है। ऐसे ज्ञान के बिना जानने का और कोई दूसरा उपाय नहीं है। यदि हमे यहाँ पर वह ज्ञान नहीं मिला हो तो अवश्य ही हमने अन्य कहीं से उसे प्राप्त किया होगा। मृत्यु से हम सर्वदा डर जाते है, लेकिन क्यों ? मुर्गी का एक बच्चा जो अभी पैदा हुआ है, एक चील को आते देखकर भाग गया। उसने कहाँ से तथा कैसे सीखा कि चील मुर्गी के बच्चों को खा जाती है। इसका एक पुराना विश्लेषण है, किन्तु उसे हम सिर्फ विश्लेषण ही नहीं कह सकते। वह स्वाभाविक सस्कार (Instinct) कहा जाता है। मुर्गी के उस छोटे बच्चे मे कहाँ से मरने का डर आया ? अंडे से अभी अभी निकली बत्तक पानी के निकट आते ही क्यो कूद पडती है तथा तैरने लगती है ? वह तो पहले कभी तैरना नहीं जानती थी, न तो पहले उसने किसीको तैरते

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देखा है। लोग कहते हैं कि वह "स्वाभाविक ज्ञान" है। "स्वाभा- विक ज्ञान" कहने से हमने एक लम्बे चौड़े शब्द का प्रयोग किया है इतना ही, किन्तु उसने हमें नयी कोई वस्तु नहीं सिखाई। अब आलोचना की जाय कि यह स्वाभाविक ज्ञान है क्या। हमारे भीतर ही अनेक प्रकार के स्वाभाविक ज्ञान वर्तमान हैं। मानो एक व्यक्ति ने पियानो पर गाना बजाना सीखना शुरू किया। पहले 'सरगम' की ओर गहरा ध्यान देकर उंगलियों को चलाना पड़ता है, किन्तु कई महीनो तथा सालो अभ्यास हो जाने पर उंगलियाँ आप ही आप ठीक ठीक स्थानो पर चलती फिरती है और वह स्वाभाविक हो जाता है। किसी समय जिसमे ज्ञानपूर्वक इच्छा का प्रयोजन होता था, उसमे और उसकी कोई ज़रूरत न रह गई, एवं ज्ञानपूर्वक इच्छा के बिना ही वह अब सम्पन्न हो सकता है और उसी को स्वाभाविक ज्ञान कहते है। पहले यह इच्छा के साथ था, अन्त मे उसमे इच्छा का कोई प्रयोजन न रहा। किन्तु स्वाभाविक ज्ञान का तत्व अभी पूरा नहीं कहा गया है, अब भी आधा रह गया है। वह यह है कि जो सब कार्य अब हमारे लिये स्वाभाविक हैं, प्रायः उन सभी को हम अपनी इच्छा के वश मे ला सकते है। शरीर की प्रति पेशी को ही हम अपने वश मे ला सकते है। आजकल यह विषय हम सभो को अच्छी तरह से ज्ञात है। अतएव अन्वयी व व्यतिरेकी इन दोनो उपायो से ही प्रमाणित किया गया है कि जिसे हम स्वाभाविक ज्ञान कहते हैं वह इच्छाकृत कार्य के अवनत भाव के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। अतएव जब सारी प्रकृति मे एक ही नियम का राज्य है तो समग्र सृष्टि मे 'उपमान-प्रमाण' का प्रयोग करके इस सिद्धान्त पर हम पहुंच

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सकते है कि तिर्यग् जाति व मनुष्य मे जो स्वाभाविक ज्ञान के रूप मे प्रकट होता है वह केवल इच्छा का अवनत भाव है।

बहिर्जगत् मे हमें जो नियम मिला था, अर्थात् “प्रत्येक क्रम-विकास-प्रक्रिया के पहले एक क्रम-संकोच-प्रक्रिया रहती है और क्रमसकोच के साथ साथ क्रमविकास भी रहता है” इस नियम से हम स्वाभाविक ज्ञान का कौनसा तात्पर्य निकाल सकते है? यही कि स्वाभाविक ज्ञान विचारपूर्वक कार्य का क्रम-सकुचित भाव है। अतएव मनुष्य अथवा पशु मे जिसे हम स्वाभाविक ज्ञान कहते है वह अवश्य ही पूर्ववर्ती इच्छाकृत कार्य का क्रम-संकोच भाव होगा। और ‘इच्छा-कृत कार्य’ कहने से पहले यह अपने आप ही स्वीकृत हो जाता है कि हमने अभिज्ञता या अनुभव का लाभ किया था। पूर्वकृतकार्य से वह संस्कार आया था और वह संस्कार अब भी विद्यमान है। मरने का भय, जन्म से ही तैरने लगना तथा मनुष्य मे जितने अनिच्छाकृत स्वाभाविक कार्य पाये जाते है वे सभी पूर्व-कार्य व पूर्व-अनुभूति के फल है—ये ही अब स्वाभाविक ज्ञान के रूप मे परिणत हुये हैं। अब तक इस विचार मे हम आसानी से आगे बढ़ सके है और यहाँ तक आधुनिक विज्ञान भी हमारा सहायक रहा। आधुनिक वैज्ञानिक धीरे धीरे प्राचीन ऋषियो से सहमत हो रहे है एवं प्राचीन ऋपियो के मत को वैज्ञानिक जहाँ तक मान लेते हैं वहाँ तक कोई गड़बड़ नही है। वैज्ञानिक मानते है कि प्रत्येक मनुष्य एवं प्रत्येक पशु कई अनुभूतियो की समष्टि लेकर जन्म लेते है, वे यह भी मानते है कि मन के ये सब कार्य पूर्व अनुभूति के फल है। किन्तु यहाँ पर वे लोग और एक प्रश्न पूछते है: उन लोगो का कहना है कि यह बात कहने की क्या आवश्यकता है कि ये अनु-

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भूतियों आत्मा की हैं ? ऐसा कहना ही ठीक है कि वे सब शरीर के धर्म हैं। इसे आनुवंशिक संचार (Hereditary Transmission) ही कह सकते हैं। यही शेष प्रश्न है। जिन सब संस्कारों को लेकर मैंने जन्म लिया है वे हमारे पूर्वजो के संचित संस्कार हैं, ऐसा हम क्यो न कहे ? छोटे जीवाणु से लेकर सर्वश्रेष्ठ मनुष्य तक सभी के कर्मसंस्कार मुझमे मिले हुए हैं, किन्तु आनुवंशिक संचार के कारण ही मुझमें वे आकर मिल गये हैं। यदि हम ऐसा कहते तो कौनसी बाधा होती ? यह प्रश्न बहुत ही सूक्ष्म है। हाँ, इस आनुवंशिक संचार को कुछ अंश तक हम मानते हैं। लेकिन हम इतना ही मानते हैं कि इससे आत्मा को रहने के लिये एक स्थान मिल जाता है। हम अपने पूर्व कर्मों के द्वारा शरीरविशेष का आश्रय लेते हैं। और जिन्होंने उस आत्मा को संतान के रूप में प्राप्त करने को स्वयं को उपयुक्त किया है, उनसे ही वह आत्मा उपयुक्त उपादान ग्रहण करती है। आनुवंशिक संचारवाद (Doctrine of Heredity) किसी प्रमाण के बिना ही एक अद्भुत बात मानता है कि मन के संस्कारों की छाप जड़ में रह सकती है। जब मैं तुम्हारी ओर देखता हूँ तब मेरे चित्त-ह्रद में तरंग उठती है। वह तरंग थोड़े ही समय में लुप्त हो जाती है; किन्तु सूक्ष्म रूप में वह तरंग के रूप में ही वर्तमान रहती है। हम यह समझ सकते हैं। हम यह भी समझ सकते हैं कि भौतिक संस्कार शरीर में रह सकते हैं। किन्तु इसका क्या प्रमाण है कि शरीर के भग्न होने पर मानसिक संस्कार शरीर में रहते हैं ? किसके द्वारा ये संस्कार संचारित होते हैं ? मानो, मन का प्रत्येक संस्कार शरीर में रहना सम्भव है; मानो आनुवंशिकता के अनुसार आदिम मनुष्य से लेकर सब पूर्वजों के संस्कार मेरे पिता के शरीर में वर्तमान हैं एवं पिता के शरीर से मैं उन्हें प्राप्त कर रहा हूँ। कैसे ?

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तुम शायद कहोगे जीवाणुकोप (Bio plasmic Cell) के द्वारा। किन्तु यह कैसे संभव हो सकता है? क्योंकि पिता का शरीर तो संतान मे सम्पूर्ण रूप से नहीं आता है। एक ही पिता-माता की कई संतान हो सकती है। इसलिये यदि हम यह आनुवंशिक संचारवाद् मान ले तो यह भी हमे अवश्य स्वीकार करना पडेगा कि प्रत्येक संतान के जन्म के साथ-ही-साथ पिता-माता को भी अपनी निजी मनोवृत्ति का कुछ अंश खोना पडेगा, (चूँकि उन लोगो के मत से संचारक व संचार्य एक अर्थात् भौतिक है) एवं यदि तुम कहोगे कि उनकी सारी मनोवृत्तियाँ ही संचारित होती है तो यह बात माननी पड़ेगी कि प्रथम सन्तान के जन्म के बाद ही उन लोगो का मन पूर्ण रूप से शून्य हो जायगा। फिर यदि जीवाणुकोप में चिरकाल के अनन्त सस्कार रह जायें तो पूछा जायगा कि ये कहाँ रहते हैं और किस रूप से? यह पक्ष बिलकुल असम्भव है। जब तक ये जड़वादी प्रमाणित न कर सके कि कैसे वे संस्कार उस कोष मे रह सकते है तथा कहाँ रह सकते है एव “भौतिक कोष मे ये मनोवृत्तियाँ निद्रित रहती है” इसका तात्पर्य वे जब तक समझा नहीं सकते तब तक उनका सिद्धान्त मान लेना असम्भव है। इतना तो हम अच्छी तरह समझ जाते है कि ये संस्कार मन के भीतर ही निवास करते है। मन ही बार बार जन्म ग्रहण करता आता है, मन ही अपने उपयोगी उपादान ग्रहण करता है और इस मन ने जिस शरीरविशेष के धारण करने के उपयुक्त कर्म किये है, तन्निर्माणोपयोगी उपादान जब तक वह नहीं पाता, तब तक उसे राह देखनी पड़ती है। यह हम अनुभव करते है। अतएव आत्मा के लिए देहगठनोपयोगी उपादान प्रस्तुत करने तक ही आनुवंशिक संचारवाद स्वीकृत किया जा सकता है। परन्तु

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आत्मा देह के बाद देह ग्रहण करती है, शरीर के बाद शरीर प्रस्तुत करती है; और हम जो कुछ चिन्ता करते है, हम जो कुछ कार्य करते है वही सूक्ष्म भाव मे रह जाता है और समय आने पर वे ही स्थूल रूप मे व्यक्त भाव धारण करके आत्मप्रकाश के लिये उन्मुख होते हैं। मैं अपना अभिप्राय तुम्हे और भी अधिक स्पष्ट रूप से कह दूँ। जब कभी मैं तुम लोगों की ओर देखता हूँ तो मेरे मन मे एक तरग उठती है। वह मानो मेरे चिन्ताह्रद के भीतर डूब जाती है, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती जाती है, परन्तु वह बिलकुल ही नष्ट नहीं हो जाती। मन मे वह किसी भी मुहूर्त मे स्मृति-तरंग के रूप मे प्रकट होने को प्रस्तुत रहती है। इसी तरह मेरे मन के भीतर ही यह समस्त संस्कारसमष्टि विद्यमान है जो मृत्यु के समय पर साथ ही बाहर हो जायगी। मानो, इस कमरे मे कहीं एक गेंद पड़ी है और हम सब एक एक छड़ी से सब ओर से उसे मारने लगे। गेंद कमरे के एक कोने से दूसरे कोने मे दौड़ने लगी, दरवाज़े के नजदीक जाते ही वह बाहर चली गई। वह किस शक्ति से बाहर चली जाती है ?—जितनी छड़ियाँ उसे मारी गई थीं उनकी सम्मिलित शक्ति से। किस ओर उसकी गति होगी, यह भी इन सभी के समवेत फल से निर्णित होगा। इसी प्रकार, शरीर का पतन होने पर आत्मा की गति का निर्णायक क्या होगा ? उसने जैसे कर्म किये है, जैसी चिन्ताएँ की है, वे ही उसे किसी विशेष दिशा मे परिचालित करेगी। अपने भीतर उन सबो की छाप लेकर वह आत्मा अपने गन्तव्य की ओर अग्रसर होगी। यदि समवेत कर्मफल इस प्रकार हो कि भोग के लिये उसे पुनः एक नया शरीर गढ़ना होगा तो वह ऐसे पिता-माता के पास जायगी जिनसे वैसे शरीर गठन करने के उपयुक्त उपादान प्राप्त कर सके और उन्ही उपादानो के द्वारा वह एक नया

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शरीर धारण कर लेगी। इसी तरह वह आत्मा एक देह से दूसरी देह मे जाती रहेगी, कभी स्वर्ग मे जायगी तो कभी पृथ्वी पर आकर मानव देह धारण करेगी अथवा अन्य कोई उच्चतर या निम्नतर जीव-शरीर धारण करेगी। और इस प्रकार वह तब तक आगे बढ़ती जायगी जब तक उसका भोग समाप्त होकर वह अपने निजी स्थान पर लौट न आयेगी। तभी वह अपना स्वरूप जान सकती है, जान सकती है कि वह यथार्थतः क्या है। तब समस्त अज्ञान दूर हो जाता है और उसकी सारी शक्तियाँ प्रकाशित होजाती है। वह तब सिद्ध हो जाती है, पूर्णता प्राप्त कर लेती है, तब उसके लिये स्थूल शरीर की सहायता से कार्य करने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। सूक्ष्म शरीर के द्वारा कार्य करने की भी आवश्यकता नहीं रहती। वह तब स्वयंज्योति व मुक्त हो जाती है, उसका फिर जन्म या मृत्यु कुछ भी नहीं होता।

अब इस विषय पर हम और अधिक कुछ आलोचना नहीं करेगे। पुनर्जन्म के बारे मे केवल एक और बात की ओर आप लोगो का ध्यान आकर्षित कर हम यह आलोचना समाप्त करेगे। यही मत केवल जीवात्मा की स्वाधीनता की घोषणा करता है। केवल यही एक मत है जो हमारी सारी दुर्बलताओ का दोष दूसरे के मत्थे नहीं मढ़ता। अपने निज के दोष दूसरे के मत्थे मढ़ना मनुष्य की स्वाभाविक दुर्बलता है। हम अपने दोष नहीं देखते है। क्या आँखे कभी अपने को देख पाती है ? किन्तु वे दूसरे सभी की आँखे देख सकती है। हम मनुष्य है, अपनी दुर्बलताये, अपनी गलतियाँ मानने को हम तब तक राजी नहीं होते जब तक हम दूसरो पर ये सब लाद सकते है। साधारणतः मनुष्य अपने दोषों तथा अपनी भूलो

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को पडोसियो पर लाढना चाहता है। और यदि यह न बन सके, तो ईश्वर को इसके लिये उत्तरदायी बनाने की चेष्टा करता है—और यदि इसमे भी सफल न हुआ तो भाग्य नामक एक भूत की कल्पना करता है और उसी को इसके लिये उत्तरदायी करके निश्चिन्त रहता है ! परन्तु प्रश्न यह है कि ‘भाग्य’ नाम की यह वस्तु है क्या और रहती कहाँ है ? हम तो जो कुछ बोते है उसीको पाते है।

हमने स्वय ही अपने अपने भाग्यो की सृष्टि की है। यद्यपि ‘हमारा भाग खोटा हो तब भी हम किसी को उत्तरदायी नहीं बना सकते और यदि हमारे भाग्य अच्छे हो तो भी किसी की प्रशंसा करने की आवश्यकता नहीं है। वायु सर्वदा बह रही है। जिन सब जहाजों के पाल उठे रहते है उन्हीं का वायु साथ देती है और वे ही उसके सहारे आगे बढ़ते है। किन्तु जिनके पाल लगाये नहीं गये उन पर वायु का कोई असर नहीं होता। किन्तु यह क्या वायु का दोष है ? हममे कोई सुखी है तो कोई दुःखी। क्या यह भी उन करुणामय पिता के कारण है जिनकी कृपा-रूपी वायु दिनरात बहती रहती है, जिनकी दया का अन्त नही है ? हम स्वयं ही अपने भाग्यों के निर्माता है। उनका सूर्य सभों के लिये उगता है चाहे वे दुर्बल हो या बलवान। साधु, पापी सभी के लिये उनकी वायु बह रही है। वे सभो के प्रभु है, पिता है, वे दयामय तथा समदर्शी है। क्या तुम लोगो की यह धारणा है कि हम छोटी छोटी चीजों को जिस दृष्टि से देखते है, वे भी उसी दृष्टि से देखते है ? भगवान के सम्बन्ध मे हमारी यह कितनी क्षुद्र धारणा है। कुत्ते के पिल्लो की

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जगत् २०३

तरह हम नाना विपयो के लिये प्राणपण से चेष्टा कर रहे है और मूर्ख की तरह हम समझ रहे है कि भगवान भी उन विपयों को ठीक उसी तरह सत्य समझकर ही ग्रहण करेंगे। इन पिल्लो के इस खेल का क्या अर्थ है, वे अच्छी तरह जानते है। उन पर सब दोप लाद देना या यह कहना कि वे ही दण्ड-पुरस्कार देने के मालिक है, मूर्खता की वाते है। वे किसी को दण्ड नहीं देते, पुरस्कार भी किसी को नहीं देते। प्रत्येक देश मे, प्रत्येक काल मे और प्रत्येक दशा मे प्रत्येक जीव उनकी अनंत दया प्राप्त करने का अधिकारी है। किस तरह उसका व्यवहार किया जायगा यह हम पर निर्भर रहता है। मनुष्य, ईश्वर या और किसी पर दोप लादने की चेष्टा न करो। जब तुम स्वय कष्ट पाते हो तो अपने को ही उसके लिये दोषी समझो एवं जिससे अपना कल्याण हो सके उसी की चेष्टा करो।

पूर्वोक्त समस्या का यही समाधान है। जो लोग अपने दुःखो या कष्टो के लिये दूसरों को दोपी बनाते है (दुःख इस वात का है कि ऐसे लोगो की संख्या दिनो दिन बढ़ती जा रही है) साधारणतया वे लोग दुर्बल-मस्तिष्क है; अपने कर्म-दोष से वे ऐसी परिस्थिति में आ पडे है, किन्तु अव वे इसलिये दूसरों को उत्तरदायी वना रहे हैं—इससे उनकी दशा मे तनिक भी परिवर्तन नहीं होता वरन् दूसरो पर दोप लादने की चेष्टा करने के कारण वे और भी दुर्बल वन जाते हैं। अतएव अपने दोप के लिये तुम किसी को उत्तरदायी न समझो. अपने ही पैरो पर खडे होने की चेष्टा करो, सव कामों के लिये अपने को ही उत्तरदायी समझो। कहो कि जिन कष्टो को हम

२०३ ज्ञानयोग

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२०३ ज्ञानयोग

अभी झेल रहे हैं वे हमारे ही कृत कर्मों के फल हैं। यदि यह मान लिया जाय तो यह भी प्रमाणित हो जायगा कि वे फिर हमारे ही द्वारा नष्ट भी किये जा सकेंगे। हमने जो कुछ सृष्ट किया है उस सभी का ध्वंस भी हमीं कर सकते हैं, जो कुछ दूसरों ने बनाया है उसका नाश हमसे कभी नहीं हो सकता। अतएव उठो, साहसी बनो, वीर्यवान होओ। सब उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लो—यह याद रखो कि तुम स्वयं ही अपने भाग्य के निर्माता हो। तुम जो कुछ बल या सहायता मागते हो वह तुम्हारे भीतर ही विद्यमान है। इसलिये इसी ज्ञानरूपी शक्ति के सहारे तुम बल प्राप्त करो और अपना भविष्य अपने हाथों बनाओ। 'गतस्य शोचना नास्ति'—अब समस्त भविष्य तुम्हारे सामने पड़ा हुआ है। सर्वदा तुम इस बात का स्मरण रखो कि तुम्हारी प्रत्येक चिन्ता, प्रत्येक कार्य सचित रहेगा, और यह भी याद रखो कि जैसे तुम्हारी प्रत्येक असत् चिन्ता या असत् कार्य शेरों की तरह तुम पर कूद पड़ने की चेष्टा करेगा वैसे ही सत् चिन्ताएँ एवं सत् कार्य भी हजारों देवताओं की शक्ति लेकर सर्वदा तुम्हारी रक्षा के लिये उद्यत रहेंगे।


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१०. बहुत्व में एकत्व

पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूस्तस्मात् पराङ् पश्यति
नान्तरात्मन् ।
कश्चिद्धीर . प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥
—कठोपनिषद्, द्वितीय अध्याय, प्रथम वल्ली ।

“ स्वयंभू ने इन्द्रियो को वहिर्मुख होने का विधान बनाया है, इसीलिये मनुष्य सामने की ओर ( विपयो की ओर ) देखता है. अन्तरात्मा को नहीं देखता । कोई कोई ज्ञानी व्यक्ति जो विपयो की ओर से निवृत्तदृष्टि है और अमृतत्व प्राप्ति की इच्छा रखता है, अन्तरस्थ आत्मा को देखा करता है।” हम देख चुके है कि वेदो के संहिता भाग मे तथा अन्य ग्रन्थो मे भी जगत् के तत्व का जो अनुसन्धान हो रहा था उससे बाहरी प्रकृति की तत्वालोचना द्वारा ही जगत् के कारण का अनुसन्धान करने की चेष्टा की गई थी, उसके बाद इन सभी सत्य की खोज करने वालो के हृदय मे एक नवीन प्रकाश आलोकित हुआ; उन्होंने समझ लिया कि वहिर्जगत् के अनुसन्धान द्वारा वस्तु का वास्तविक स्वरूप जानना असम्भव है। फिर किस प्रकार उसको जानना होगा ? बाहर की ओर से दृष्टि को फिरा कर अर्थात् भीतर की ओर दृष्टि करके जानना होगा। और यहाँ पर आत्मा का विशेषण स्वरूप जो 'प्रत्यक् ' शब्द प्रयुक्त हुआ है वह भी एक विशेष भाव का द्योतक है। प्रत्यक् अर्थात् जो भीतर की ओर गया है —हमारी अन्तरतम वस्तु

२०६ ज्ञानयोग

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२०६ ज्ञानयोग

हृदय-केन्द्र, वही परम वस्तु जिससे मानो सब बाहर आया है, वही मध्यवर्ती सूर्य जिसकी किरणे है मन, शरीर, इन्द्रियाँ और जो कुछ हमारा है वह सब।

'पराचः कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम्।
अथ धीराः अमृतत्व विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते॥
(कठ—पूर्वोक्त)

"बालबुद्धि मनुष्य बाहरी काम्य वस्तुओं के पीछे दौड़ते फिरते है। इसीलिये सब ओर व्याप्त मृत्यु के पाश मे बंध जाते है, किन्तु ज्ञानी पुरुष अमृतत्व को जान कर अनित्य वस्तुओं मे नित्य वस्तु की खोज नही करते।" यहाँ पर भी यही भाव प्रकट होता है कि सीमित वस्तुओ से पूर्ण बाह्य जगत् मे असीम और अनन्त वस्तु की खोज व्यर्थ है—अनन्त की खोज अनन्त मे ही करनी होगी और हमारी अन्तर्वर्ती आत्मा ही एक मात्र अनन्त वस्तु है। शरीर, मन आदि जितना भी जगत्प्रपञ्च हम देखते हैं अथवा जो हमारी चिन्ताये अथवा विचार है कुछ भी अनन्त नही हो सकता। इन सभी की उत्पत्ति काल मे है और लय भी काल मे है। जो द्रष्टा साक्षी पुरुष इन सब को देख रहा है, अर्थात् मनुष्य की आत्मा, जो सदा जाग्रत है वही एक मात्र अनन्त है, वही जगत् का कारणस्वरूप है; अनन्त की खोज करने के लिये हमे अनन्त मे ही जाना पडेगा—उस अनन्त आत्मा मे ही हम जगत् के कारण को देख पायेगे। 'यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह। मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति' (कठ—पूर्वोक्त)। 'जो यहाँ है वही वहाँ भी है; जो वहाँ है वही