भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कवीरकृष्णगीता.

२१

नारद वचन ।

प्रभु तुम कहेउ प्रथम हम ईशा । पुन बूझा तो निरंजन सीसा ॥ सीस जाय अब अंते लागा । सत्कवीर सीस अब जागा ॥ बिन कवीर मुक्ति जिव नहीं । योग यज्ञ बहु जतन कराहीं ॥ यह दंडवत तुमकाकंह कीन्हा । ताकर मोहि बतावो चीन्हा ॥

विष्णुवचन ।

सुन नारद हरि कहैं बुझाई । गुरु पितु मात साधु सिर नाई ॥ सत्कवीर कहैं कीन्ह प्रणामा । आय दरश दीजे सुखधामा ॥ कवीरके शिष्य राजा निरमोहा । ताहि प्रणाम कीन्ह बहु छोहा ॥ धन्य राजा निरमोहकी वाणी । हर्ष विशेष कछु लाज न हानी ॥

नारद उवाच ।

कह नारद मैं देखों राजा । तिनके दरश होय मम काजा ॥ धन्य निरमोह जेहि कृष्ण सराहा। उनके दरश करें चित चाहा ॥ आज्ञा करहु जो श्रीयदुराई । तो निरमोह दरश कर आई ॥ आज्ञा किये दरश गये करहु । दरश निरमोह जियत जिव तरहु ॥

राजा निरमोहकी कथा ।

चले ऋषी दरश निरमोहा । सभा निरमोह तर गये निरमोहा। नृप निरमोहके एकहिं बारा । गयेउं कुटम चार सुत बारा ॥ नारद जाय द्वार होय वैसे । ससै शुल भूप धर जैसे ॥ सुंदरी एक अब कहा बुझाई । नृपकर सुत नियते मर जाई ॥ ले संदेश नृप सुतके आयऊं । भये परले ऋषि रौर करायऊं ॥