कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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कवीररुणगीता ।
पुन नारद रानीकहैं पूछा । सुत विन तोर गोद भयो छूछा ॥ गुरु विन राम नाम नहिं पावा । रामचंद्र गुरु नाम लखावा ॥ कहैं रानी गहुं नृपके पाऊं । छूछा सोईजो गुरु न कराऊ ॥ गुरु विन राम नाम नहिं पावा । रामचंद्र गुरुनाम लखावा ॥ हमरे स्वाधी सिरपर आहीं । गुरु साधन बल हर्ष कराहीं ॥ कहा कृपी तैं डाइन आही । तेही पुत्र स्वाय निज चाही ॥ सही ऋषितै निहचे यह भाषा । ऐसी बोले सहे तुव साखा ॥ मात पिता जो सुतकहैं खाले । कहु जन्म छटी प्रतिपाले ॥ जैसे निरंजन पाले वाले । ऐसी चाल तुमहिं कहैं चाले ॥ हमरे साहेब सत्कव्वीरा । अमित प्राप्त तेही अजर शरीरा ॥ सो पालक बालक निराकाला । ताहिगिसल तुमवो अस चाला ॥ निरंकार बहु तन धर मूवा । पुरुषके वंश निरंजन तूवा ॥ दश अवतार महा दगपाला । हरि हर अज धर खाये काला ॥ कवीरके हंससे काल निनारा । सो पहुँचे सतपुरुष दरवारा ॥ सत् पुरुष सोई सत्कव्वीरा । कोइ जन भूले देख शरीरा ॥ ऐसी मम संगत ऋषिराई । कैसी संगत कहहु बुझाई ॥ जश पंछी लिये वृक्ष बसेरा । चुगन चले जित कित तब फेरा ॥ को केहि पूछ कुशल औ क्षेमा । ऐसो पुन निरयोह व्रत नेमा ॥ पुन नानाविध भावना कीन्हा । एक रती कछु मोह न चीन्हा ॥ नारद पूछा कुंभर बियाही । तुव मन बहुर जारके पांही ॥ कहैं बहुर नृपके सिर नाहीं । सास बंद गुरु स्वाधी सुख चाही ॥ हमरे स्वामी सुवा न मरि हैं । तजके देह अमर तन धरिहैं ॥