कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकवीरकृष्णगीता ।
२७
छूटे भँवर होय दोय दीशा । दोमहँ एक रोक नहिं दीसा ॥ कुशल काहुकहँ पूछहिं भाई । ऐसी संगत हमरि गोसाईं ॥
दोहा सुन नारद अचरज भये, हरि पहुँ कीन्ह पयान । हरिसे चरित्र कहा सब, धन निरमोह सुजान ॥
ऋषि उवाच ।
कहँ ऋषि सुन दीन दयाला । नृप निरमोह जियत कलिकाला ॥ अस २ संत आहिं जग माहीं । धन्य जो सतकवीर जेहि छाहीं ॥ अस योहि दया करो भगवाना । वस्ती तज वन करहिं पयाना ॥ कुल परिवार झूठ हम जानी । सत्तनाम एक सार बखानी ॥
कृष्ण वचन ।
कहँ कृष्ण वन किभि चलि जाहू । गुरुके गूह निज भाकि कमाहूँ ॥ हम ब्रह्मा सुत सब ते जेठे । जगमें और सकल मम हेठे ॥ कहँ कृष्ण जो करता आवे । बिन गुरु ते उबार नहिं पावे ॥ तुम कितने आहू किह माहीं । मम निरवाह गुरु बिन नाहीं ॥ गुरु बिन साकट प्रेत समाना । साकटके सिर जमको थाना ॥ धरती कहँ साकट है भारी । औ प्राणी भारी बेविचारी ॥ जस चंदा बिन रैन औधरी । तस साकट ले जिव जन घेरी ॥ रवि न दिवस ईश बिन सैना । गुरु बिन साकट अंध जन नैना ॥ बिन देवल देवस्थल जैसे । बिन गुरुके प्राणी है तैसे ॥ बिन दीपक जस घर औधियारा । तस गुरु बिन साकट जम चारा ॥ कहँ नारद गुरु का कहँ करऊं । जेहिने तुम्हरे चित संचरऊं ॥