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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

सच्चे गुरुकी पहिचान

कवीरकृष्णगीता ।

२७

छूटे भँवर होय दोय दीशा । दोमहँ एक रोक नहिं दीसा ॥ कुशल काहुकहँ पूछहिं भाई । ऐसी संगत हमरि गोसाईं ॥

दोहा सुन नारद अचरज भये, हरि पहुँ कीन्ह पयान । हरिसे चरित्र कहा सब, धन निरमोह सुजान ॥

ऋषि उवाच ।

कहँ ऋषि सुन दीन दयाला । नृप निरमोह जियत कलिकाला ॥ अस २ संत आहिं जग माहीं । धन्य जो सतकवीर जेहि छाहीं ॥ अस योहि दया करो भगवाना । वस्ती तज वन करहिं पयाना ॥ कुल परिवार झूठ हम जानी । सत्तनाम एक सार बखानी ॥

कृष्ण वचन ।

कहँ कृष्ण वन किभि चलि जाहू । गुरुके गूह निज भाकि कमाहूँ ॥ हम ब्रह्मा सुत सब ते जेठे । जगमें और सकल मम हेठे ॥ कहँ कृष्ण जो करता आवे । बिन गुरु ते उबार नहिं पावे ॥ तुम कितने आहू किह माहीं । मम निरवाह गुरु बिन नाहीं ॥ गुरु बिन साकट प्रेत समाना । साकटके सिर जमको थाना ॥ धरती कहँ साकट है भारी । औ प्राणी भारी बेविचारी ॥ जस चंदा बिन रैन औधरी । तस साकट ले जिव जन घेरी ॥ रवि न दिवस ईश बिन सैना । गुरु बिन साकट अंध जन नैना ॥ बिन देवल देवस्थल जैसे । बिन गुरुके प्राणी है तैसे ॥ बिन दीपक जस घर औधियारा । तस गुरु बिन साकट जम चारा ॥ कहँ नारद गुरु का कहँ करऊं । जेहिने तुम्हरे चित संचरऊं ॥

२८

कबीरकृष्णगीता ।

कहैं कृष्ण गुरु कर निरबंदा । नारी तजै तजै कुल दंदा ॥ विष्णव गृह त्यागीं वैरागी । ऐसे गुरुके शरणन लागी ॥ गुरु कबीर पंथतन धारी । सदुरुके सब जिव निस्तारी ॥ सदुरु सत्कबीर निरवाना । जाके त्रास काळ भय माना ॥ अब तो गुरु तुम प्रातहिं करहु । प्रात प्रथम मिलै तेहि पण धरहु ॥

दोहा-नारद गवने निज मठ, प्रात जाय गुरु कीन्ह ।

मछवा मिलै पंथ महँ, तासो दीक्षा लीन्ह ॥

दीक्षा ले वैकुंठ पगु धारे । हरिके आगे वचन उचारे ॥ गुरु कियौपै जातके हीना । तुव आज्ञा मछवा गुरु कीन्हा ॥ कहैं कृष्ण गुरु कहैंपै लाऊ । अब ऋषि तुम चौरासी जाऊ ॥ बेगि जाहु तुम गुरुके पास । अपने औगुण करहु प्रकाशा ॥ तब गुरु आज्ञा जैसी होई । किये निसतार सुनहु ऋषि सोई ॥ चले ऋषि तेहि जग महँ आथे । बहुर तहां गुरु दर्शन पाथे ॥ चरण सीस दे विनती लाई । मोहिसे अवगुण भयउ गोसाई ॥ कैसे अवगुण बेगि सो कहहु । गुरुसे कह अंतर अवकरहु ॥ गुरुसे कपट करे गुरु जिंदा । साधु द्रोह नर यमके बंदा ॥ सुनत ऋषि थरहर पगु धरेऊ । केहि अवगुणसे प्रगट कहेऊ ॥ भयउ दया तुम दीक्षा दीन्हा । ठाकुर मोसन पूछन लीन्हा ॥ कहहु ऋषी गुरु कैसन कीन्हा । तब हम कहैं गुरु कीन्ह कर्थाना ॥ ऐसे कहि हम वचन अधीना । हमरे जोग नहीं गुरु ध्याना ॥ औपै नीच जातपै आना । * * * * *

नारदके गुरु करने और चौरासी भोगसे छूटनेकी कथा

कवीरकृष्णगीता ।

२९

यह सुन कृष्ण कहा मोहि सेती । जात मनुष्य गुरु कहे अनेती ॥ तुम ठाकुर कहो कौन सजाई । कहे नारद तुम कहो बुझाई ॥ कृष्ण कहा भरमो चौरासी । तब छूटे ऋषि यम गर फांसी ॥ ताते तुम पहुँ आयउँ स्वामी । कहो सो करहुँ मैं अंतयंगिनी ॥ अब तुम कहो कृष्णसों जाई । क्षित चौरासी लिख दिसलाई ॥ तब हरि लिखें पृथ्वी चौरासी । लोट पोट कर छटे फांसी ॥ चले ऋषि गुरु कहैं सिर नाई । ठाकुरसे गये विनती लाई ॥ लिख देव स्वामी मम चौरासी । बूझ लेव तब भर्मउ दासी ॥ लिखा कृष्ण भूतल अघरवानी । लोटहिं नारदमुनि विलखानी ॥ कहे कृष्ण तुम यह का काहूँ । महि महीं लोट रेहे तुम करहूँ ॥ भरमो चौरासी हरि सुन वैना । हरि भर आये जल धर नैना ॥ कहें ऋषी यह बुध किन दीन्हा । कहें ऋषी गुरु मोक्ष मम कीन्हा ॥ कहा कृष्ण अस गुरु परतापा । गुरुसम जग हित नहिं पितुभाता ॥ पिता निरंजन गुरुसम मोरा । गुरु दुरवासा ऋषि गतघोरा ॥ सदृढ़ सचकवीर हमारे । कवीरके शरण इकोतर तारे

दोहा—कहें कृष्ण सुन नारद गुरु, बढेके द्विजराज ।

कह ऋषि गुरु सबते बढे, गुरु गरीब निवाज ॥

गुरुसम काहु न देख गोसाई । करता पितु जननी ओ भाई ॥ गुरु हैं सवपर ईश गोसाई । कहें कृष्ण नारद समुझाई ॥ नारद ऋषि उठ चरणन लागे । श्रीपति तुम मोहि कीन्ह सुभागे ॥ जो हम ब्रह्मा सुत बड ज्ञानी । गुरु विन इतने बात न जानी ॥

३०

कबीरकृष्णगीता ।

धन्य गुरु अब धन्य सो कहिये । जासु चिन्हाये गुरुपद लहिये ॥ यथमहि रजगुण गुरुकी महिमा । सुनहु सतोयुण गुरुकी महिमा ॥ तमगुण गुरुकी कहहुँ सुभाऊ । देवी पंथकर चाल लखाऊ ॥ देव निरंजन पंचम कहिये । जोत अकाश होय दरशन लहिये ॥ छठयें जीव सतयें सतनामा । सत्यनाम संतन सुखधामा ॥ संतके प्राण सब जीव सुखदाई । सोई सत कबीर गोसाई ॥ एक जीव त्रिगुण दरशावे । इंगला पिंगला सुखमन भावे ॥

दोहा-वौये इंगला दहिने पिंगला, मध्यसुषुम्णा नार । तापर मनपर मन निज मन है, सोई रूप हमार ॥

निज मनपर तिहासन साजा । तापर सतकबीर विराजा ॥ तहैं न काल जंजाल न व्यापा । नहिं तहैं पुन्य नहीं तहैं पापा ॥ तहां न रवि शाशिके उजियारी । एक रोम विध कोट चिकारी ॥ पांच पचीस तीन नहिं तहां । त्रिगुण न नाम कबीरसो जहां ॥ रूप स्वरूप सो निर्मल काया । अजरहिरंवर हंस रहाया ॥

दोहा-एक हंसकी शोभा, रवि शाशिको कोटन तूल । तहां सो सत्यकबीर विराजे, सब जीवनके मूल ॥ पूरण पुन्यमान जिव होई । सतकबीर कहैं सेवे सोई ॥ लखन कोट माहीं एक जीवा । सो करिहैं कबीरको पीवा ॥ जेहि होय दाम सो खाय मिठाई । मकरा घांस रंक ले खाई ॥ तैसे दाम सहज सतदाया । पूरण पुण्य सदुरु पद पाया ॥ सदुरु सत्यकबीर जिव व्याही । जीव व्याह अयरलोकलै जाही ॥

सुपथ कुपथका वर्णन व त्रिगुणी जीवका वर्णन

कवीरकृष्णगीता ।

३१

अमरलोक सुख वराणि न जाई । छिप एक महमें गये अघाई ॥ अजर सुक चाहे जो कोई । सो सद्गुरु कवीर शिष्य होई ॥ बिना कवीर सांच कहु नाहीं । तीन लोकसो आवहि जाई ॥ सत्कवीर सो सचनिवासी । सत्यलोक अमरपुरवासी ॥ जीव दयाको जन पगु धारा । दासा तन धरि शब्दपुकारा ॥ दास कहाय प्रगट भये काशी । शिष्य कहाय रामानंद विलासी ॥ सन्यासीसे भये वैरागी । रामदत्त रामानंद अनुरागी ॥ कवीर ब्रह्म आपन जगआदा । तिन गुरु कीन्ह बाध भरजादा ॥ पाछे तब हमहूं गुरु कीन्हा । तब गुरु कीन्ह सबन भल दीन्हा ॥ रामानंद आनंद सरूपी । जन कवीर परमानंद रूपी ॥ रामानंद कला एक मोरा । सत्यकवीर समर्थ बंदीछोरा ॥ बडा नवे छोटा अभिमाना । शीतल ज्ञानकोध अज्ञाना ॥ ताते अमरपद चीन्है भाई । सुपंथ चले सो कवीर घर पाई । कछु सुपंथ कछु पंथे चाहे । सो तो रामचरणचित्त आहे ॥ झूठे लंपट चोर छिनारा । यह लक्षण रजगुण निरवारा ॥ क्रोध कपट पारसंड बढाई । यह तम गुण जीव दुखदाई ॥ सतगुण सत् कपट नहिं भावे । प्रेम भक्त गुरु दर्शन पावे ॥ गुरुदर्शन प्रभुदर्शन मानो । साधु दर्श गुरु दर्श बखानो ॥ सत्कवीर सतगुणके मूला । उनकी पटतर कोई नहिं तूला ॥ और सवे छल छुद्र समाना । रागद्वेष मान अभिमाना ॥ कहैं कृष्ण मोहि मन वच सेवे । हरदम नाम ह्यारा लेवे ॥

पाण्डव और कृष्ण संवाद

३२

कवीरकृष्णगीता ।

दया क्षमा सत गहे सो पंथा । दीन दुखी पातक भगवंता ॥ गुरु साधमहैं मोकहैं देखे । घात द्रोह तज पंथ परेखे ॥ भेटो आप मृतककी नाई । प्रेत पिशाच असुर औतरई ॥ रहे जो पुण्य सो प्राणी । रामनाम भज वरतन जानी ॥ नरतन पाय जो भजे कबीरा । कवीर भेंट मिटे तनपीरा ॥ शिव तमगुणकी भक्तिजो करई । प्रेत पिशाच असुर औतरई ॥ देवि भक्त चौरासी वासा । भक्त करे तन परे यम फांसा ॥ शूकर भान गिद्ध मंजारी । परे चौरासी मांस अहारी ॥ दिन रस चेटक भूत यसाना । नामभक्त बिन यमघर थाना ॥ जाहि ज्ञान जाके मन थाका । आतम परमातम पंथ ताका ॥ परआतम सब आतम कीन्हा । बिरलेआतम परमातम चीन्हा ॥ जिन चीन्हा तिन्ह सद्गुरु सेवा । सद्गुरु सत्कवीर निज भेवा ॥ नारद मगन भये सुन वाणी । धन्य कवीरजो कीन्ह वखानी ॥

अर्जुनउवाच ।

अर्जुन पूछे सीस नवाई । अवलग्न हय नहीं पूछ गोसाई ॥ को कवीर कहवाते आये । जाकी ऐसी स्तुति लाये ॥ भक्त कवीर जो रहे एक तोरा । तुमते कौन बड़ा सुन मोरा ॥

युधिष्ठिरवचन ।

कहैं युधिष्ठिर सुनहु महिंदा । गुरु साधकर जितकर निंदा ॥ गुरुके निंदा साधुके खोटी । जुरेनसे जन वस्तर रोटी ॥ ताकर वंश होय निर्दंशा । जो साधुके निंदा परसंसा ॥

कबीरकृष्णगीता ।

३३

भीम वचन ।

कहे भीम अर्जुन भल कहा । सुना कबीर जुल्हा एक रहा ॥ ताकी एतिक करे बड़ाई । तब सहदेन बोले रिस आई ॥ तुम कबीर कह सके बूझा । अबहिं तोहिं गुरुमत नहिं सुझा ॥ कबीर नाम करता आविनासी । कबीर भजे तेहि छूटे चौरासी ॥

नकुल वचन ।

कहे नकुल भक्त कहा गोसाईं । जेहि मधु तारे सो तर जाई ॥ सुनिके कृष्ण कहा सुन भीमा । अर्जुन पठे तिनहु नहिं चीन्हा ॥ दोहा—सोई कबीर तुम चीन्हहु, जेहि शिष्य घंट बजाय ॥ द्वार भक्त सुदरसन, डोम स्वपच बरणाय ॥

कबीर सोई जाको अस शिष्या। हम सब जीव कबीर घर भीषा ॥ जोलहा आद जासु जगताना । सुरझे साथ साकट अरुझाना ॥ चंदसूर जाके दोय तारा । करि गह काया बिनहि रिसारा ॥ इंगला पिंगला चले दोय घोटी । मध्य सुषुम्णा हांथ जोटी ॥ सरसों तीन साठ लग जानी । अर्ध उर्ध दोय खूँटी तानी ॥ तानी ताना भरनी सुत स्वासा । निहचल बिनहि कबीरा दासा ॥ धरती अकाश पवन औ पानी । रचा कबीर सकल रजधानी ॥ फिरहिं जगतमहँ आप छिपाये । भक्त सुक पथ इनाहिं चलाये ॥ जासे तबहिं निरंजन राई । हम तुम कौन गलीमहँ भाई ॥ संकट माहिं कबीर सहाई । बंदी छोर कबीर गोसाईं ॥ करताका कोइ अंत न पावे । तरे सोई जो भक्त कमावे ॥

कपिल मुनि वचन (निज वृत्तान्त)

३४

कबीरकृष्णगीता ।

अर्जुन भीम कृष्ण पग लगे । निहचछ सोयते अब जाये ॥ कृष्ण युधिष्ठिर कहैं इसारा । अधम उधारन नाम कबीरा ॥ राम नाम कबीर प्रकाशा । राम कबोर दोष एक अवासा ॥

युधिष्ठिर वचन ।

कहैं युधिष्ठिर सुनहु स्वामी । आज कहों तोहि अंतर्धारिनी ॥ जा दिन कहा तुव पुर्षा तारे । बुढ़े नरकते जाय विकारे ॥ तब तुव आज्ञा सिरपर राखा । बांये अंगुली नरकमहैं नांखा ॥ पांव पकड़ मोहिं पित्रन रैंचे । नाम कबीर सुमर तब बांचे ॥ और नाम बहु सुमरेहुं जाई । तजहिं न पित्र मोहिले जाई ॥ तब मैं सचकबीर पुकारा । तत्तिछिण भयउँ नरकते न्यारा ॥ तबसे हम कबीरको चीन्हा । कबीर कहत भये अघते भिन्ना ॥ जबहिं हम युधिष्ठिर ऐसी कहा । तबहिं कपिलमुनि उठकर गहा ॥

कपिलमुनि वचन ।

धन्य युधिष्ठिर कह दुलराये । तुमहु लख कबीर कहैं पाये ॥ कबीर आप हैं समर्थ साई । जाकी रची सकल दुनिआई ॥ आपन बढाई विष्णुहिं दीन्हा । आप दास भये अस अधीना ॥ एक दिन व्यास निरंजन ईशा । औरहिं भया चितवे यम दीसा ॥ सवा लाख सँग पहुँचे जाई । सूर्य दैय यम चला गौसाई ॥ तब कबीर कहैं कीन्ह चिकारा । भिन्यर के मोहि निरंजन डारा ॥ दूतहिं कहा हंस केहि आना । भाष बेग नतो करौ निदाना ॥ बोला श्रीहर दूत होय आगे । डरहिं दूत सब कांपन लागे ॥

कबीरकृष्णगीता ।

३५

इन नहिं कीन्ह कबीरपुकारा । निरसत जोत तहाँ हम मारा ॥ यहां आय कबीर गोहरायै । वहाँ जोगके गर्भ खुलायै ॥ जोग भोग नहिं जानो भाई । कबीर नाम भज काल न खाई ॥ तबहिं निरंजन दूतहिं बुझावा । यहि धारि डार तुरत तब नावा ॥

दोहा—इतना कहा निरंजन, तत्क्षण प्रगट कबीर ॥ किन मम हंस दुखावा, केहि भारी भौ शरीर ॥ दूत अंध भय पैल पुराने । चल न सके बलहीन तुलाने ॥ देख कबीर निरंजन नीरा । धाय कबीरके चरणन गीरा ॥ थरहर कहे चूक नहिं मोरा । अलग हंस बैठारडं तोरा ॥ सतकबीर सुनि कपिलहि पूछा । कहा कपिल कुछ नाहिं विगूचा ॥ दोहा—तब कबीर दाय़ा करि, मोहे ले चलेउ लियाय ॥

कहे काल मैं चेशो ते ये, तुम राखो मम ठान ॥ तब हम कबीर उर धारा । कहे कबीर भये जभते न्यारा ॥ कहे कपिल सुनि सुन हो भीमा । धन्य कबीर निरंजन सीमा ॥ जहां निरंजन कहैं सब धावे । वहाँ अंत जीवन झरकावे ॥ कहैं कपिल सुनि सुन सहदेवा । विरले पावे कबीरको भेवा ॥ अब हम लेव कबीर प्रवाना । भज कबीर निज घर कहैं जाना ॥ सुने कबीर के महिमा भारी । इच्छा दर्श सबन चित धारी ॥ अर्जुन विनति कृष्णसों करही । हमहुं सतकबीर पगु धरही ॥ कहे कृष्ण तुम हमहीं चीन्हा । अबही कस साहेब चित दीन्हा ॥

३६

कवीरकृष्णगीता ।

हम कहैं तुम मानुष कर जाना । तुम नहिं वचन हमारा माना ॥ अजुन कह तोहे मोहन छूटा । मोह मार सिद्ध सुनि लूटा ॥ जेठा बढा जो कहै सिखाई । मानिये ताको सीस नवाई ॥ राय युधिष्ठिर कबीर गुण कहा । हमहू कहा सो चित नहिं रहा ॥ हम सब कहैं कबीर सिखावा । मनसे मोह प्रगट सब भावा ॥ दीन्ह निरंजन कहैं बिलोका । जीवन सुखदे तुमाहिं निसोका ॥ सकल जीव औ सतकी दाया । जोत अष्टंगी पुरुष निरमाया ॥ दीन्ह निरंजन कहैं जागरी । ओइ पुरुष सोइ सत्तकवीरा ॥ सतलोकवासी अविचल नामा । अविचल नाम कबीर सुखधामा ॥ सत्तकवीर हम सबहि सिखावा । राम निरंजन जगहि ददावा ॥ राम निरंजन प्रगट विस्तारी । कृष्ण अज औ हर संसारी ॥ इन सब कहैं लूटवे हर साजा । क्षौर असवारी पीछे राजा ॥ जो निरगुणकी सब महिमा पावे । तोसरगुणके कोइ निकट न आवे निरगुण कबीर त्रिगुणते न्यारा । निरंजन त्रिगुण सरगुण पक्षारा ॥ निरंजन कहैं जग निरगुण कहता । निरगुण तो जोइन नहिं वहता ॥ निरंजन तो जोइन मह आये । तन धर कृतम नरक भुगतये ॥ क्रीतम सखा त्रिगुण कियो कर्ता । कर्ता हर्ता भर्ता नहिं मरता ॥ जो कर्ता आपहि भर जाई । तो तेहि क्रीतम कहिये भाई ॥ निरंजन तो तन धर २ मूवा । आदि कर्ता कहु कैसे हूवा ॥ आदि कर्ता सो सत्तकवीरा । जो नहिं गले न जरे शरीरा ॥ अकह अगह छाया तन नाहीं । स्वासा से तस रंग लखाही ॥

कवीरकृष्णगीता ।

( ३७ )

स्वासा पूंजी सवके भाई । सो स्वासा कवीर निरमाई ॥ स्वासा देह लिये संगे चले । निकसत स्वासा देह महि मिले ॥ देहीं त्रिगुण राय निरंजन । स्वासा अंस कवीर दुख भंजन ॥ स्वासा आद पवन है भाई । नासिका वाट सो आवहिं जाई ॥ नासिका निकट सो दरसे आतम । आतम दरस दरसे परमातम ॥ छचीस नीर और पवन पचासी । ताते न्यारा सोहंग अविनासी ॥ सोहंग जीव सुखसागर केरा । तन धर भुगते दुःख घनेरा ॥ केदली ब्रह्मके नाम सोहंगा । जाको मूल सो शब्द विहंगा ॥ जीवके नाम केदल ब्रह्म कहिये । विहंग प्रचै कवीर मिल छहिये ॥ रोरा नल कुमत अठ गांठी । गुरुके ज्ञानन भिमके साठी ॥ दोहा—अजुर्न भीम सकल मिला, कीन्ह कवीर प्रणाम ॥ सतकवीर जीवरक्षक, जै २ कवीर सतनाम ॥

निरंजन दरवारकर दूता । पाती ले आव अवधूता ॥ विष्णुहिं धाय पाती तिन दान्हा । विष्णु वांच विहसे प्रवीना ॥ फुरमाई राजाके आई । विष्णु वांचके सबहिं सुनाई ॥ पत्री निकसा चाहिय जलपाना । पुण्यमान औ जिव बलवाना ॥ भीमसु तबहीं भीमकहैं हेरा । दूत धाय गल गहा भीमकेरा ॥ घैचेउ लट पाछे करि आना । सुरक बांध ले कीन्ह पयाना ॥ भीमको अकल सबहीं भूला । मूसहिंले मंजार जस झूला ॥ कहैं कृष्ण सुन भीम हठीला । कहाँ गयो बलरंग भयो ठीला ॥ कहैं कृष्ण सुन भीम गहीरा । गाढ रक्षक सत्कवीरा ॥

कबीर शरण विना मुक्ति नहीं

३८

कर्बारुक्षणगीता ।

सत्कवीर कहहु मनमाहीं । बहुरि प्रगट कहु काल नसाहीं ॥ सुनके भीम कवीर कहि बोला । सत्कवीरको आसन डोला ॥ छिनभै समर्थ पहुँचे आई । कवीरसुनत यम चला पराई ॥ छांड भीमकहँ भागेउ काला । सत्कवीर भेटा जंजाला ॥ कृष्ण उठाय भीम कहँ लीन्हा । तब कवीरके स्तुति कीन्हा ॥ सकल देव उठ ठाढे भयऊ । सत्कवीर कहँ सोस नवायऊ ॥

दोहा-पगु छूवन सब चाहे, काहु न आवे हाथ ॥ जापर दया कवीरके, जिन पगु देहीं माथ ॥

योगयज्ञसे सैर न कामा । जबलग भजै न सदुरुनामा ॥ सदुरु सत्यकवीर दयाला । शरण कवीर भिटे ययजाला ॥

दोहा-सत्यकवीरके स्तुति, करे निरंजनराय ॥

विष्णु व्यास सुख गुरु कहत है, भाग दृश्श सतनाम ॥ अधर विवान ग्रानभै सोहा । अद्भुत चंद सूर नख मोहा ॥ स्तुति आप २ सब करहीं । जै २ सत्यकवीर उच्चरहीं ॥ कोटिन चंद सूर उगआये । अद्भुत लीला कला दिखाये ॥ विष्णु व्यास जै स्तुति सारा । सत्यकवीर जै सब उच्चार ॥ जै २ नमो २ सब कहहीं । अधर स्तुति सब एकटक रहहीं ॥ जै २ सत्यकवीर सुखदाई । विष्णु व्यास पंडौ गुण गाई ॥ जै २ सत्यकवीर दयाला । कवीरकृपाते जीतेऊँ काला ॥ जै जै समर्थ सत्य कवीर । सब घट व्यापक अजर शरीरा ॥

कवीरुष्णगीता ।

३९

सत्यकवीर संसार तेहि दीन्हा । जै जै सत्यकवीर प्रवीना ॥ जै जै अकह सो नाम कवीरा । पुष्पवास घृत घ्राण शरीरा ॥ जै जै रुपाळ कवीर गोसाईं । गऊ कपिलहिं ले यमते छुडाईं ॥ जै जै अयर नाम कवीरा । लखा घर जरत खंभ मई चौरा ॥ थाके भीम खंभ नहि आना । वाचा वंध व्याकुल भगवाना ॥ तवहीं रुष्ण कवीर पुकारा । जै पतालते खंभ उखारा ॥ जै जै कहि बहु बार कवीरा । जै राम लक्ष्मण एक शरीरा ॥ जै भरथ शत्रुघन सीता सती । जै दशरथ दायो सो क्रांती ॥ जै कवीर अमोलख भाई । जै पुष्पवास प्रति रहे समाई ॥ जै काया दल वीर कवीरा । जै अधर धजा फहरात शरीरा ॥ जै एक स्वास बहु मूंदे आंखी । भीतर सबके कवीर सुतसाखी ॥ आप आप मन ध्यान औराधे । दसों द्वार मन पवन कस बांधे ॥ प्रेम भक्त बस साहेब सोईं । माया चहे सो प्रभु नहिं होईं ॥ सत्कवीर आप निरमाया । आप न्यारा माया जग छाया ॥ माया बस पर जीव कहावे । निहमाया सतकवीर रहावे ॥ जहां अस्मिमान कपट चतुराईं । तेहि नहिं सत्यकवीर दरसाईं ॥ तन मन धन जोवन बन फूला । मन भौरा ताके रस भूला ॥ जब वन्सपती बन गई सुखाईं । भौरहि भूख लाग अधिकाईं ॥ जेहि बन देखत भौर सुलाना । तेहि बन वरस अंगार सयाना ॥ तब भौरा सरवर दिशि धांसा । पुरइन कंबल जाय अलवासा ॥ कहे कंबल भौरा वनवासी । विपत परेउ आयउ मम पासी ॥

सब देवताओंका कबीरकी स्तुति करना और कबीरका उपदेश देना

४०

कबीरकृष्णगीता ।

जब बन डगठा आग धंधाना । तब बनते मधुकर विलगाना ॥ जैसे बिन निरास अल भयऊ । तैसे माया लोभित पछतयऊ ॥ चरण कमल गुरु प्रथम न सेवा । काल वस्य तब भयऊ बहेवा ॥ विपत परत को सभर्थ चीन्हा । होय सुशील उपकारसो चीन्हा । अनचीन्हे विपत जो होय सहाई । तो तेहि जानिय सभर्थ साई ॥ दोहा-सत्यकबीर मोहि अनचीन्ह, सियरे परिचय नाहि ॥

कपिलमुनि भज गाठे कबीर, छोड़ाय लीन्ह जमपाहीं बाघ निरंजन काल कसाई । तेहि सुख ते लिय कपिल छोड़ाई कपिला गऊ कपिल मुनि कहहीं । सतकबीर सो सभर्थ अहहीं ॥ उत्तर विवान आव सत सीसा । विष्णु व्यास सुख कपिलसिरदीसा स्तुति कीन्ह सिंहासन सारा । कंचन भर ले चरण पखारा ॥ महाप्राण कहैं दीजे अज्ञा । निराधार कबीर कहु सज्ञा ॥ पूछाहि ज्ञान विष्णु अरु व्यासा । छोटे बड़े सुनहि विश्वासा ॥

विष्णुवचन ।

कहैं कृष्णगीता मत सारा । पाठ कीय सुख लहे सो चारा ॥ पाठ करै समुझे पंथ चाले । सचदयासो जिव प्रति पाले ॥ आप जीवके रक्षा करई । ताके संकट साहेव हरई ॥ अपनी रक्षा औरकी हानी । ऐसे चाल नहा अघरानी ॥ कहैं कृष्ण सुन व्यास प्रवीना । सुनो कथा निरगुणको चीन्हा ॥

दोहा-कहैं कृष्ण कबीरसे, होय अधीन कर जोर ॥ कहिये कथा आदि उत्पतकी, सत कबीर बंदीछोर ॥

कवीरकृष्णगीता ।

४१

कवीरवचन ।

कहैं कवीर निर्गुणकी कथा । निर्गुण सर्गुण प्रगट जथा ॥ प्रथम सत्पुरुष निर्गुण सोई । तिनके निर्गुण सर्गुण होई ॥ त्रिगुण न्यारा निर्गुण सो जानी । सो सत्यपुरुष अमृततन खानी ॥ रचा लोक अमृतकी काया । देह हिरंमर सुवास सुहाया ॥ अमृत अयको लोक संवारा । इच्छा सुर्त सकल विस्तारा ॥ प्रथमहिं सुरत अंस प्रगटाये । सुरत विहंग सकल निरमाये ॥ शब्द अजर सतनाम वखाना । तासु अंस सुरति उत्पाना ॥ प्रथमहिं ज्ञान अंस सुखदाई । दुतिय विवेक विचार निरमाई ॥ त्रितय सहजशील निरबाना । चौथे क्षमा संतोष वखाना ॥ पंचय निरंजन छठयें भवानी । सतयें योगजीत जम हानी ॥ अठयें धीरज नवें शुचि भाऊ । दसयें दया दीनता आऊ ॥ एकादसे सत सुकित नामा । द्वादश दुरमत नाम निहकामा ॥ त्रैदस आद कुम निरमाऊ । चतुर्दश जलहरंग झलकाऊ ॥ पंचैदस सो प्रेम प्रमारथ । षट्यैदस अचित पद सारथ ॥ श्रवदास कहनकी छोटा । सत्रह सुतसे काल अटोटा ॥ सोरह सुत एकपुत्री वामअंगी । देख निरंजन प्रेम उभंगी ॥ जाहे सुत जो दीयदिय स्वामी । पुरुष आज्ञा बैठे सब धामी ॥ निरंजन धरहिं अकुलाने । चौसठ जुग छिन सेवा ठाने ॥ देख अंगी काल ललचाने । होय अधीन बहु विनती ठाने ॥ दीन्हो लाय संग अष्टभुजी । मानसरोवर राज करोजी ॥ अस जिवरा ताही कहैं दीन्ह। । पारस स्वास विस्तार जोकीन्ह। ॥

व्यासका कबीरसे सत्यलोक दिखानेकी प्रार्थना करना

४२

कबीररुणगीता ।

दोहा- उठी अवाज पुरुषकी, मानसरोवर जाहु ।

बांये दहिने जिन हेरहु, सन्मुख होय सुख लाहु ॥ अमर चोलना जीवको दीन्हा । बिसरहिंनहिंजिवपुरुषपरवीना ॥ चले निरंजन आज्ञा पाई । मानसरोवर वैठे जाई ॥ मानसरोवर हंसनि रहहीं । अद्भुत चंद्र सूर्य छवि लहहीं ॥ गावहिं सब मंगल अति प्रीति । होय झनकार अनाहद रीति ॥ एक २ हंसनि छवि अनलेखा । अमरचौर काछे बहु भेषा ॥ पग अंगुली नख चंद्रकी खानी । तरवन रवि शाशि जुथलोभानी ॥ जंघ नाभी कटि चंद्रकी रासी । उरसर कंमल नाल बिनु भांसी ॥ चंद्र सूर्यकी खान हंसनी । सुखछविनिरखअकहसुखहंसनी शोभा कौन हंसनि छवि कहऊँ । उपमा सरिस न कुछजगलहऊँ ॥ नित आरती समान सरोवर । लोककी नार नर्क न्यारा घर ॥ तहां हंसनी सुखुच्छि सयानी । शोभा अमल चंद्रकी खानी ॥ मांग टीका पटवासी सुंदर । चंद्र चौथ विधु अद्भुत दिनकर ॥ निरख हंस सब एक टक लाये । पुरुष कला छविरूप सुहाये ॥ एक कामनि सेंदुर रवि कोटी । सेंदुर सद्रु नाम अटोटी ॥ सोहे बेसर हंसनि नाका । उगे चंद्र जुथथप बांका ॥ बांका सोइ जेहि कौन नवावे । सो कबीर सब जगगुण गावे ॥ कबीरनाम भये अस सोभा । सोभा सुनत सबन मन लोबा ॥

व्यास उवाच ।

कहै व्यास देखे विन स्वाधी । कस पतिआव सो अंतयाभी ॥ कलउ भक्त गुरुवचन विश्वासी । तीनों जुग देखे विन रासी ॥

कबीरकृष्णगीता ।

४३

कबीरवचन ।

कहे कबीर देह धर देखौ । आप माहिं तुम सबहिं परेसौ ॥ कोट चंद्रके सोभा जिवके । नर्क देह धर सुख नहिं पिवके ॥ ऐसे समय हंस एक पूरा । सत्कबीर जये सो सूरा ॥ ठांका देह पूरा घट जाई । पुष्प विधान हंस बैठाई ॥ हंस सहस्र सठिहार बहुता । आसपास लागे सभ जुगता ॥ परिछन हंस विवान चढि आये । अधर धजा फहराय सहाये ॥ दोहा-वाजत वाजत सरस अति, होत अंजोर अपार । उतरे हंस वैकुंठ तब, नाम कबीर उचार ॥ भाये हंस वैकुंठ को जवहीं । अद्वुत चंद्र सूर्य उगे तवहीं ॥ चला हंस कबीर पगु पारा । मस्तक पग दीन्हा बलभारा ॥ सकल हंस परिक्रमा करहीं । कबीर चरण रज सिरपर धरहीं ॥

हंसवचन ।

कहे हंस कबीर यम बांचे । विना कबीर काल धर नाचे ॥ सदुरु मोकेह दीन्ह परवाना । सत्कबीर सभ गुरुकहैं जाना ॥ यम त्रिण तोड काल सुख भूका । पाय प्रवाना झगरा चूका ॥ सरगुण त्रिविध झगरा ठागा । तैतिस कोट देव सब भागा ॥ जेहि पूजहु सो कछु भल माने । बिन पूजे सब झगरा ठाने ॥ ताने निर्गुण भक्त अधारा । जप कबीर यमराजहिं छारा ॥

दोहा-धन्य कबीरको नाम है, धन्य कबीरको शरण । जो कबीर लौ लावे, ताको जरा न मरण ॥

कबीरका उपदेश

४४

कबीरकृष्णगीत ।

चरण टेक चले हंस सुजाना । सत्यकबीर कहत घर ताना ॥ पुन वैकुंठ भये अंधियारा । बोले कृष्ण धन्य करतारा ॥ सत्यकबीर जन गुप्तहोय फिरहीं । तिनके दास ऐसे सुख करहीं ॥ सबे देव विनती अनुसारा । ले चलहु जहां अस उजियारा ॥

कबीरवचन !

कहे कबीर सत्यलोक जो जाई । अस उजियार जो तोहिं मिलाई ॥

दोहा--कर्म भर्म सब त्यागे, त्यागे जगके आस ।

सबमहैं एक ब्रह्म लखि, कबीर भजन सुखरास ॥ सबे कहें शोहिं दीजे पाना । यमसे जीव बचजाय ठिकाना ॥ कहे कबीर सुनो सब कोई । सदुरु सेय मुकफल लेई ॥ कहौं सो करौं सबहिं तब तारौं । जन्ममरण दुख दारुण टारौं ॥ सबे देव सुमरो रामके नामा । छांडो भूत प्रेत अब कामा ॥ जो जाको गुरु रामसो ताही । गुरुविन राम न तारेउ काही ॥ करहु भक्त दाया सत ठानी । अंस पृथ्वी तन घर भर नामी ॥ करु नित संतनकी सेवकाई । हृदय कबीर नाम जौलाई ॥ निरगुण सरगुण एक समाना । बीज वृक्ष विस्तार बखाना ॥ सुखमंडन पितु मातु जथाई । हृदय प्रीत पिव सदुरु साई ॥ जो कोई भक्त करे गुरुसेवा । सेवा भक्त सार पद लेवा ॥ अमृत सेवे अमृतफल लेई । विषतरु सेवे विष मिल लेई ॥ अमृतफल गुरुराम कबीरा । आगे तारव पुण्य शरीरा ॥ विन कौडी सौदा मिल नाहीं । गुरु विनको गहिहै पुन बाहीं ॥ गुरु सोई जो अंतहु मीठा । जन्ममरण सब लागे सीठा ॥

कलियुगका वृत्तान्त

कबीरकृष्णगीता ।

४५

दोहा-जन्ममरण सरगुण गुरु, निरगुण अजर कबीर ।

शरण कबीरके जो गहे, सो बहुरन धरे शरीर ॥

कथा प्रसंग कहा सुनि व्यासा । भक्ति सुक्ति महिमा प्रकाशा ॥

भक्त सुक्त पंथ सत दाय। सत्यनाम भज अम्बर काया ॥

कहे कबीर सुनो विष्णु प्यासा । सत्यकबीर जपो हर स्वासा ॥

आद अनादिको नाम कबीरा । कल प्रगटहिं अघ नासन हीरा ॥

अब तोहिं अंत खोल हम कहा । सत्यकबीरजपकलिनिरवाहा ॥

ताहि न देउं मैं पान प्रवाना । जोजीवघातआमिश भषजाना ॥

दोहा-महापुनीत पवित्र जिव, गुरु भक्ता सोइ संत ।

पर आपन जिव एक लखे, ताहि कबीर मिल कंथ ॥

विष्णु-व्यासवचन ।

कहे सो विष्णु व्यास सिर नाई । कलयुग सुनिये जो आमिश खाई ॥

कहे कृष्ण कलयुग व्योहारा । कोइन करि है सत्य विचारा ॥

बूठहिं जगलग लेपवे साही । अतीत ब्राह्मणको धका दिवाही ॥

गुरुसे शिष्य सरवर करि बोले । तेहि दोष मरकट होय डोले ॥

गुरुके धन चौराय जो खाई । ताके घर फांसी सब जाई ॥

गुरुसे सरवर पितहिं दे गारी । साधुद्रोह जिवघात खुवारी ॥

जीवदयामय दाय। जानो । जीव घात मम घात बखानो ॥

काया विष्णु कंवल दल सोहा । भज कबीर गुरु पद मोहा ॥

सत्यकबीरको चाल निगारी । सुर नर सुनि गण जानेनहारी ॥

कलिमें होइ हैं प्रापत राजा । नृप बिगरे परजा अघ छाजा ॥

कलियुगमें तरनेका मार्ग

४६

कबीरकृष्णगीता ।

कलिके ब्राह्मण काल सुभाऊ । अजिया सुतवष झस परखाऊ ॥ प्रथम मीन भवै विष्णु सरुपा । पैठ पताल जला अंधकूपा ॥ कुर्मके नखसों मृतुका आना । राई प्रवान मृतुका सो जाना ॥ सो मृतुका हरमुख विवलई । फेनसमान उठा जब कई ॥ लै फेन पवन जल लाया । शीर साठी तस पृथ्वी जमाया ॥ पृथ्वी सात औ सात अकाशा । कदलीखंभदल पृथ्वीपर चासा ॥ विष्णु जल थलमाहि समाना । विष्णु अन्न पान पकवाना ॥ जो मीन दैह पूरण कर सेवे । जलमह भात डारि कर सेवे ॥ ताके संतत भक्त गर होई । पूजे कछु मुख पावे सोई ॥ विठल ब्रह्मरूप है मोरा । बावन नरसिंह राक्षस बल तोरा ॥ परसरामचंद्र सो हमही । कृष्ण चौध निहकलंकका जवहीं ॥ नारद व्यास औ सबमें वासा । रजगुण तमगुण सहगुण वासा ॥ चौथा स्वासा कबीरको दासा । स्वासा पार सतपुर वासा ॥ पंचयै निरंजन जिव घटवारा । कबीर मोहर लख पार उतारा ॥ जो नहीं भये कबीरके दासा । ता कहै काल निरंजन आसा ॥ पुण्य लीन्ह रस त्रस जिव केरा । पुन्यमान जस तरे विव भेरा ॥ पापिहिं डार दिये यम खाई । जार खोर चौरासी भमाई ॥ पाप पुण्य महीं नाहिं उबारा । दया सत् परमारथ सुधारा ॥ नाम कबीर प्रताप उबारा । क्रीतम नाम जपेउं यम मारा ॥ आद नाम कबीर दुखहरना । क्रीतम त्रिगुण नाम तप मरना ॥ जन्म मरण दुख बडे जंगाला । जन्म मरण झरकावे काला ॥