भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 168 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 83

कबीरकृष्णगीता ।

६९

पीछे लाग चली पतिव्रता । बहुर उचर दीन्हा तेहि भरता ॥ हम अब जात आह बरिआता । गुरु करव तो होन तुव साथा ॥ कहे कन्या गुरुदेव बोलाई । हमहू शरण सत्यनाभके जाई ॥ कहे कुंभर गुरुबंधु संग मोरे । तुरत पान लेहु तिनका तोरे ॥ भये जो मंगल अधिक उछाहा । तन गउवा मन जीवके व्याहा ॥ पतिव्रता कहे पियपद लागी । चल मंदिर मोहि करहु सुभागी ॥ तबलग मोर छुवा जिन खाहू । जो लगि मोहि गुरु शरण दिवाहू ॥ सुनत वचन पतिव्रता केरी । पाऊं परे कुँअर पगु वारी ॥ पतिव्रता गृह चल भौ स्वाभी । हर्ष चले पाछे पिय बानी ॥ मंदिर जाय पलंग सुभ डासा । फूल विछौना अधिक सुवासा ॥ पलंग बैठ पिय वचन उचारा । परआत्म कह दीन्ह अहारा ॥

दोहा—राजा कीन्ह सन्मान सब पुन, कीन्ह आरती साज । आरती होत सो मंगल, अनवन बाजन बाज ॥

सिंहासन बैठे कडिहारा । नरिअर मोर हंस निस्तारा ॥ तिनका जमते वेग तोडावा । दे प्रवाना जीव सुकावा ॥ पुन दे तिलक चरणोदक दीन्हा । कागते हंस रूप कर लीन्हा ॥ चरण टेके कीन दंडवत साता । सट्टुर दियो सीस तब हांथा ॥ दीन्ह प्रसाद नारियर गरी । बहुर प्रसाद नवहु देहु फेरी ॥ पुन सट्टुर तेहि सिखापन दीन्हा । सदा रहहु पिय चरण अधीना ॥ पतिव्रता सुन शब्द सिखापन । गुत प्रगट एक ब्रह्म पुरातन ॥ सत्यनामप्रति पिय गुण जानी । पतिव्रता पिय पद लपटानी ॥