कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1012, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकितनेको जीवित पकड़कर ले चला । रास्तेमें एक महात्मा बैठे, हुआ था. बादशाह उसके निकट जा दण्डवत् करके प्रतिष्ठासे बैठ गया । फिर पूछा की महाराज ! कुछ सेवाकी आज्ञा हो. महात्मा उठा बादशाहकी मोछोंसे २-३ बालोंको पकड़कर उखाड़ लिया. बादशाहको बहुत दुःख हुआ. आज्ञा दी कि, इस फकीरको मार डालो । तब महात्माने कहा, ऐ बादशाह सबकी जान एक समान है. तूने इतने जीवोंको मारा कैद किया है, क्या उनको दुःख नहीं होता होगा ? उनका दुःख परमात्मा न सुनेगा ? इसी प्रकार महात्माने बादशाहको समझाया तो समझ गया, कठोरताके ऐसे कामको छोड़ दिया । उस दिनसे किसी जीवको दुःख न देनेका प्रण करके महात्माका शिष्य होगया ।
कबीर साहिब—भी अहिंसकोंके आशीर्वादमें सर्वशक्ति मानते हैं कि
सूखी अस्थिनको चुमे, जीव न सतावे कोय ।
ता पक्षीकी छाँहतर, क्यों न छत्रपति होय ॥
मांसमें शूरता नहीं—जो लोग ऐसा ध्यान करते हैं कि, मांस खाने और मदिराके सेवन करनेसे मनुष्यमें बल बढ़ता है, शूरता आती है, वे बहुत झूलमें हैं । उनको उचित है कि मुर्गा, बटेरे, बुलबुल आदिककी भयानक लड़ाई देखें मुर्गा और बटेरे लड़ते २ मर जाते हैं पर रणको नहीं छोड़ते । इस प्रकरणमें अबतक जो कुछ निरूपण किया गया है उसीका सार निम्नके गजलमें दिये देते हैं—
गजल—करेगा मिहर जो उसपर मिहर है । क्रहरके एवजमें बेझक क्रहर है ॥
बहर जांदारमें रुहे इलाही । वही रहमान म्यानैं जेरो जबर है ॥
किसीके खूनका बदला न छूटे । सभीके साथ दावर दाद गर है ॥
करम और फ़जल सबपर हैं उसीका । सिताना गैर जाँका पुरखतर है ॥
मिहरबां बाप सारे खल्कका वह । मुसीबत और बला जालिम उपर है ॥
हिसाबोंमें पड़े अमलोंके सारे । न छूटे राम ब्रह्मा विष्णु हर है ॥
न बे गुरज़ान कोई राह पावे । भटकता फिरता यह जीव दर बहर है ॥
है वे मुरशिदके जाहिल आदमी यह । न मर्दुम है वही बेदुमका खर है ॥
हशरके रोज़ खुश मज़लूम सारे । बहर जानिवसे जालिमको ज़रर है ॥
जो खाया गोश्त औरोंका भरजोर । न खा क्यों गोश्त अपना पेटभर है ॥
महासिब रूबरू मालूम होगा । तेरा आमाल नामा हाथ धर है ॥
जिसकी तरफसे दुनियामें है जब । खुदात आलाका वह भी एक नफ़र है ॥
वह भी बन्दा तू बन्दा हो न गन्दा । अता तुझको हुई तेगे ज़फ़र है ॥