भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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की अटक नहीं थी, न किसी प्रकारका सन्देह था। फिर मूसा क्या पूछे कि, "खुदाका नाम बे फायदा लेना किसको कहते हैं? बे फायदा लेना क्या है?" संसारमें जितने नाम हैं उनमें कौनसा नाम निष्फल और कौनसा सफल है? अथवा सबही नाम निष्फल हैं? किसीमें कुछ लाभ भी है? किस स्थान पर निष्फल है कहां पर सफल है? जबतक इसका स्पष्टीकरण न हो, तबतक तो जीव एकदम अंधेरेमें पड़ा रहेगा। यह मैंने कहीं लिखा न देखा कि, यहाँ खुदाका नाम लेना, यहाँ न लेना। ईश्वरकेही नाम लेनेसे आदमी पापोंसे शुद्ध होता है। जब ईश्वरका नामही लेना निष्फल हुआ तो क्या नाम लेकर भजन करेगा? मुक्तिका कौनसा मार्ग रहा? न खुदाहीने कुछ स्पष्टीकरण किया न मूसानेही स्पष्ट बतलाया। फिर तो सबको भटक भटककर मरना पड़ा। अब बे किस राह चलें? क्या करें? किस प्रकार खुदाका नाम लें? जो निष्फल न हो। कौन पथदर्शक गुरु खोजें? जो सत्य-मार्ग बतलावे, जिससे व्यर्थ ईश्वरका नाम न ले? यह तो पूर्ण गुरुके बिना कदापि नहीं जाना जा सकता क्योंकि, पापोंको नष्ट करनेके लिये केवल नामहीका सहारा है, जब वही व्यर्थ होगया तो छुटकारेका सहाराही न रहा। इसी भूलमें सब मूसबी और ईसाई पड़े हैं क्योंकि, हिन्दू और मूसलमान जब कोई काम आरम्भ करते हैं तो अपने अपने ईश्वरका नाम ले लेते हैं। चाहे कोई अपने गुरुका अथवा ईश्वरका, जिसको वह श्रेष्ठ समझता है उसका नाम लेकरही कार्य आरम्भ करता है। किसी न किसी प्रकार उसका ध्यान परमात्माकी ओर होता है, जिससे अन्तःकरणकी शुद्धता होती है। मैंने किसी ईसाई महाशयको किसी कामके आरम्भमें अथवा किसी पुस्तकके आदिमें नाम लेते और लिखते न देखा, न पढ़ने पढ़ानेके समयही ईश्वरका नाम लेते हैं। इसी तृतीय आज्ञाके अनुसार यह सब काम होते हैं। जिस नामको जपकर भवसागर तर जाते हैं उसी नामका यह रङ्ग ढङ्ग हुआ, तो अब क्या सहारा रहा? असहाय हो गये। मैंने किसी ईसाईकी किताबके आदिमें परमात्माका नाम न देखा। यह विचार उन लोगोंका ऐसा दृढ़ हुआ है कि, जितने अंग्रेजी पढ़नेवाले हैं, प्रायः ईश्वरका नाम नहीं लेते। इस कर्तव्यसे लोगोंके अन्तः-करणपर अन्धकार छा गया। भजन भक्तिकी ओर लोग तनिक भी ध्यान नहीं देते, करणपर अन्धकार छा गया। भजन भक्तिकी ओर लोग तनिक भी ध्यान नहीं देते, सब लोभ और तृष्णाकी ओर झुके हुये हैं। मनुष्यकी मुक्तिका सबसे बड़ा कारण जाता रहा। उदारता, शौर्य, न्याय और शील ये मुक्तिके चार साधन हैं। अब वह उदारता कहां है जो पहिले लोग अपनी आवश्यक और प्यारी वस्तुको भी परमात्माके लिये दे देते थे। अब वह शौर्य (वीरता) कहां गई कि, जिससे भजन

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