भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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तीसरा धन—यह सब विपत्ति और वासनाओंका घर है। अभिमान और अहङ्कारका पिता है चिन्ता व भोग विलासका आधार है।

इस प्रकार ये तीनों (तन, मन, धन) दुःख और अप्रतिष्ठाके कारण हैं। जबतक इन तीनोंका तू सद्गुरुके अर्पण न करे, तब तक मुक्तिका अधिकारी न होगा। इन्हींमें सारा संसार फँसकर मरता है। तू सद्गुरुका ऋणी है। ये जब तू तीनोंको सद्गुरु के अर्पण करदे तो तेरे ऊपर उसकी दया होगी तेरा बन्धन छूटेगा। सब चर अचरमें अपने सद्गुरुको देख। सबको स्वामी तथा अपनेको सेवक जान। सब को सद्गुरुकी मूर्ति जान कर सबकी सेवा कर। जिसप्रकार होसके उनको सुख पहुँचा, किसीको दुःख न दे। किसीपर अत्याचार मत कर, किसीको हानि मत पहुँचा क्योंकि, सब मूर्ति साहबको हैं। पण्डित लोग सहस्रों पुस्तकोंको पढ़ गये, पर अभी तक वर्णमाला भी नहीं पढ़े। वे लोग अपनेको बहुत बड़ा बुद्धिमान और सच्चा समझते हैं पर अभीतक वर्णमालाके ज्ञानमें कच्चे हैं।

साधुओंके हंसनेवाले।

वे लोग सच्चे सन्त साधु और भक्तोंकी हँसी करते हैं उनका ठट्ठा उड़ाते हैं कि, हम बड़े बुद्धिमान् हैं यह अल्पविद्यावाले अथवा वे पढ़े हैं वह उनका हँसना कैसा है? दर्वेशोंपर ठट्ठा उड़ाना कैसा है? जैसा बगला हँसको हँसे तथा तुच्छ समझे, बगलेका गुण बगलोंमें है हँसोंकी पहचान हँसोंको होती है।

विद्याभिमानी पण्डित लोग अपनी समस्त आयु धनके प्राप्त करने, प्रतिष्ठा पाने, विषय भोग को भोगनेमें बिताकर मरे जो सच्चे सन्त साधु राज्य छोड़ छोड़कर निवृत्ति धारण करके संसारसे अलग हुये, मनको दमनकर अपने वश कर लिया, सेवकसे स्वामी बन गये, उदारता, शौर्य, न्याय और शील इन चारों गुणोंको पूरा पाला। यदि विद्याके अभिमानी उनका ठट्ठा करें तो उनको इसकी क्या परवाह है? हँसका भक्ष्य तो मोती ही होगा, बगला मँढक, घोंघी और मछलियों को ही खाया करेगा। हँस और बगले बराबर नहीं हो सकते हैं, उन दोनोंकी चाल अवश्य भिन्न रहेगी। बगला कितनीही युक्ति क्यों न करे? पर हँसकी चाल ग्रहण न कर सकेगा।

झूठ सांचकी एकता—दो सौ वर्षके लगभग हुये होंगे कि, जबसे छपा हुवा सहस्रों प्रकारकी पुस्तकें छपने लगीं पुस्तकावलोकनकी उन्नति हुई। पण्डितों सन्तोंकी निन्दा करना आरंभ कर दिया। ठट्ठा उड़ाने लगे। लोगोंने साधु सेवा छोड़ दी। तब साधुओंनेभी अपने भजनको छोड़कर अपने पेटका धन्धा करना