भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 1058, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1058

आरम्भ कर दिया। योरपसे भजन, तपस्या, ज्ञान, विचार तो एकदम जाता रहा। पण्डितोंके तर्कने योरपसे भजनको उठा दिया। सब लोग पुस्तकोंके पढ़नेमें लग गये। यह नहीं सोचा कि, यह सब जितनी पुस्तकोंका पढ़ना लिखना है सब साइफर है। यह (०) जिसकी व्याख्या मैंने पहले लिखी है वही अण्डा है जो पहले प्रगट हुआ। यह अण्डा टूटा दो भाग होकर सृष्टिके उत्पत्तिका कारण हुआ यह अण्डा विषय वासनासे भरा हुआ था। इसके क्रोध व अग्निसे उत्पत्ति हुई थी इस कारण यह आगका स्वरूप है। अग्निदेवता कहकर चारोंवेद इसकी स्तुति करते हैं। यही अग्नि देतवा समस्त संसारमें पूजा जाता है। जब यह अण्डा उत्पन्न हुआ तो इसके भीतरसे बड़े बेंगसे शारीरिक सुख की कामना प्रगट हुई वह अण्डमें बन्द न रह सकी, तब अण्ड फूटा, जिससे तीन गुण पांच तत्व चौदह इन्द्रियां आदि सब प्रपञ्च हुये। फिर शरीर बना, सांसारिक विषय स्वाद लेने लगा। आपही एक है, आपही अनेक है। भूलसे अपने आपको पहचान नहीं सकता, सृष्टिकर्ताने मनुष्यको अपने रूपमें बनाया सब रूपोंमें स्वयं प्रवेश किया, सत्य और झूठ दोनों एक होगये।

माया ही रामबनी—वर्तमानके तत्वज्ञानी वेदपाठी शास्त्रियों तथा पश्चिमी धर्म पुस्तकोंके जानकारोंसे मेरा यही विनय है कि, तनिक अपनी बुद्धि और समझसे विचार करो कि, जो ईश्वर अगोचर था वह अण्डमें किस प्रकार बन्द होगया। जो गोचर हुआ वह नाशवान् है, वह नाशी नहीं हो सकता। वेद और किताबोंका वर्णन यहां तक रहा। शब्द अथवा बाणी उस अण्डसे हुई, अण्ड माया है—माया पति नहीं। जब कि, वह माया है तो खेल सब उसीके हैं सो उससे किसी की मुक्ति किस प्रकार हो सकती है? जिसकी भक्ति खेल सब कार्य पानीके बुल-बुलेके समान क्षणिक हों, उसको सर्व शक्ति मान परमात्माका अनुमान करने और माननेसे क्या प्राप्त होगा इसी मायाने शुद्ध चैतन्य ब्रह्मको ढक दिया आपही हर्त्ता कर्त्ता बन बैठे इसीको संसार पूजने लगा इस प्रकार रामकी माया रामसे बड़ी बन कर पूजाने लगी।

कबीर परिचयका—

साखी—कबीर— माया रामकी, भई रामते शेष।

व्यापक सब कहे रामको, राम राम में दे ॥

कबीर— माया श्री रघुनाथकी, चढ़ी राम पर कूद।

हुकुम रामको मेटिके, भई रामते खूद ॥

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश) · पृष्ठ 1058, कुल 1367 में से · BharatKosha