भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 1059, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1059

कबीर—माया बैठी ब्रह्म हो, होई अद्वैत आवरण ।

जग मिथ्या दरशायके, बैठी अन्तःकरण ॥

यही माया समस्त संसारकी स्वामिनी है। इसीकी संसारमें भक्ति हो रही है, केवल एक बिन्दीसे सारा संसार प्रगट हुआ है फिर नाश होकर उसी बिन्दीमें समा जावेगा फिर, वह बिन्दी उसीमें लय हो जावेगी जहाँसे कि उत्पन्न हुई थी। प्रथम कुछ नहीं था, पीछे कुछ नहीं रहेगा। जो कुछ प्रगट होता है सब मायासे प्रगट होता है यही माया संसारकी रचयित्री है जगत्में, इसीकी भक्ति सेवा हो रही, है जो अद्वैत एक ब्रह्म है उसको कोई नहीं जानता जितने कहने सुननेवाले हैं सब झूठे हैं। इस अद्वैत ब्रह्मका समाचार कहनेवाला पारखगुरुके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है।

पहिले पुरुष ।

पूर्वकालमें करणीवाले बहुत थे, केवल विद्याभिमानी कम थे। जो विद्या पढ़के उसके अनुसार करते थे, सत्यमार्गपर चलते थे, उनका अन्तःकरण प्रकाशित होता था। वे लोग सब प्रकारके पुण्य करते थे। आधीनता और दीनताके साथ गुरुकी सेवामें तत्पर रहते थे। उनके मस्तिष्कमें अहङ्कार और घमण्डकी गन्धभी नहीं होती थी। सच्चे साधु और सत्यगुरुसे नम्र भाव वर्तते थे अथवा नम्रता सहित उनकी आज्ञा मानते थे। उनसे प्रेम करते थे। साधु सेवा गुरु सेवासे कभी नहीं चूकते थे। उदारताका हाथ उठा हुआ रखते थे। इस प्रकार सत्य गुरुकी कृपासे परम प्रकाशको प्राप्त कर लेते थे। अपनी तपस्या और भजनका फल पा जाते थे वे सन्तोंके मित्र रहते थे, सर्वदा सन्तोंकी स्तुति प्रशंसामें रहा करते थे सन्तोंकी कृपा और आशीर्वादसे उनका सब मनोरथ सफल होता था।

अबके लोग—कहनेवाले बहुत हैं पर करनेवाले कम हैं। आज कलके विद्वान् भक्ति और विचारसे शून्य, विषयी निन्दक और सन्तोंके द्वेषी हैं यही कारण है कि, उनका अन्तःकरण अन्धकारमय हो रहा है। जिससे महान् अभिमान अहङ्कार और तर्कोंमें भरे हुये मूर्ख सच्चे साधु और सन्तोंकी भी अवज्ञा कर डालते हैं, उनको तुच्छ समझते हैं। ऐसे लोगों को भक्ति और मुक्तिका मार्ग मिलना असम्भव है। ऐसे लोग सत्यसे विमुख हो निरर्थक वाद विवाद करते फिरते हैं। धर्मकी जड़ही कट गई, सच्चे सन्त और सत्यगुरुकी सङ्गति न रही, तो वहाँ ईश्वर कहाँ? मुक्तिका मार्ग कहाँ? प्रेम भक्तिका निवास कहाँ? गुरु और सन्तही मुक्तिके कारण हैं, येही सत्यधामको पहुँचाते हैं।