कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1062, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंहो गोलोक धाममें आये तो वहाँ क्या देखते हैं कि, राधा कृष्ण दोनोंही विराजमान हैं, कभी राधा नहीं केवल कृष्ण सिंहासनारूढ़ हैं, कभी २ राधा कृष्णरूप धारण करती हैं, कभी दोनों एक रूप हो जाते हैं, कभी दो रूप हो जाते हैं। यह देख महान् आश्चर्यमें आ ब्रह्मा आदि देवता, स्त्रीरूप वा पुरुष रूपी कुछ भी स्थिर न कर सके, अन्तमें ध्यान द्वारा अपने हृदय स्थित कृष्णकी चिन्ता करके भक्ति, भावसे उनकी स्तुति करने लगे।
इसके लिखनेसे मेरा यह आशय है कि, ब्रह्मा माया दोनों एक हैं, मायाके अतिरिक्त कुछ नहीं है, सब महामायाहीके रूप हैं।
एक प्रमाण देता हूँ कि, पृथिवीपर जितने रामकृष्णके उपासक हैं, सब पहले राधाका नाम लेते हैं पीछे कृष्णको कहते हैं; जैसे—राधाकृष्ण, सीताराम, लक्ष्मी नारायण, गौरीशंकर। प्रथम स्त्रीका नाम है फिर पुरुषका है। इस मायाने जगत्की रचनाके लिये दोनों रूप बनाये हैं वे दोनोंही मायारूप हैं। इसी भागवतके, तीसरे स्कन्धके, तीसरे अध्यायमें उत्पत्तिके विषयमें कहा है कि, हे ब्रह्मन् ! जो कुछ दृष्टिगोचर होता है वह सब मेरा कौतुक है, मैं विष्णु हूँ विष्णु मेरा शरीर है।
इसी प्रकार सब जीवधारी मायाके प्रेममें फँसे हुये उत्पत्ति सागरमें डुबकी लगा रहे हैं। तन, मन, धन ये तीनों मायाकी ही जागीर हैं। जबतक इनसे निवृत्त न होगा तबतक अद्वैत ब्रह्मकी सुधि न पावेगा। मायाके प्रेमी मायामेंही बँधे रहेंगे। ऐसा बुद्धिमान् पण्डित विद्वान् कौन है जो इन बातोंपर विचार करे, शुद्ध अद्वैत ब्रह्मकी उपासना करे। पहली श्रेणी तो यही है कि, तन, मन, धनसे आसक्ति रहित होवे, जबतक इन तीनोंमें आसक्त रहेगा, तबतक अद्वैत परमात्माकी भक्तिके सम्मुख न होगा।
विद्वानों पण्डितोंमें जब तक अहङ्कार और अभिमान रहेगा तब तक उनको सत्यमार्ग मिलना असम्भव है। इसीका सार निम्न लिखित गजलमें रखा हुआ है।
गजल— सफा सूर मेकराज दरबजे है। गुनहू डूबनेमें कुछ ऐब है ॥
यह बातिन हैं तकवा तिहारत तेही। केदाना नेहा आलिमुल गँव है ॥
बजाहिर बशीरीनी बुरहान है यही राह दोजखकी लारेब है।
न फुकराकी खिदमत न सुहवत कहीं। किहरयकको शौतानका आसेब है ॥
है इन्सान जो खाकी सिफत। ऐ आजिज तुझे आजिजी जेब है।
स्त्री और पुरुष माया और ब्रह्मा दोनों मायाहीके रूप हैं यथार्थमें स्त्रीका