भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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परमात्मा के तुल्य—साधुओंकी सद्भक्ति साधुओंके दर्शन एवं साधुओंका भोजन वस्त्र देना साधुओंकी अवश्यकता पूरी करना आदि नाना प्रकारोंसे साधुओंकी सेवा करनेका अनन्त फल है, वह वर्णन नहीं किया जा सकता। सच्चे साधुओंकी सेवा करना सर्वोपरि है वह परमात्माकी सेवाके समान है।

साधुओंके दर्शनका फल।

साधुओंके दर्शनका फल इतना है कि, मुझसे वर्णन नहीं किया जा सकता। कबीर साहबने स्थान स्थान पर इस विषय पर बहुत कुछ कहा है। सन्तोंके दर्शनसे पशुसे मनुष्य और मनुष्यसे फिर जीवन मुक्त हो जाता है; जैसा कि, मैं पहले लिख आया हूँ कि, कबीर साहबके दर्शनसे कुत्तीका बच्चा मनुष्य हो गया। मनुष्यसे जीवन मुक्त होगया तो सन्तके नाम और दर्शनका फल नहीं कहा जा सकता। जैन धर्मके ग्रन्थोंमें एक दृष्टान्त लिखा है कि—

एक सिंहने एक सन्तको बनमें जाते हुये देखा। दर्शन करतेही मनमें यह विचार हुआ कि, मैं बड़ा पापी हूँ : एक तो जीवोंको खाता हूँ, दूसरे जीवित पशु सब मुझसे ऐसे भयभीत रहते हैं कि, मृतक तुल्य हो रहे हैं, अब ऐसा पाप न करूँगा। ऐसा सोच समझ कर व्याघ्र शान्त हो एक स्थान पर बैठ गया, तेरह दिन तक बराबर भूखा रहनेसे उसके प्राण निकल गये, इस पुण्यके प्रतापसे वह मरकर समस्त भारतवर्ष तथा अनेक देशोंका राजा हुआ। उसका नाम चक्रवर्ती भरत हुआ। बहुत समय तक राज्य करनेके बाद त्यागी होकर मुक्तिका अधिकारी हुआ। सहस्रों ऐसे दृष्टान्त हैं, कहाँ तक लिखूँ ? पर इसके साथ ऐसा तर्क न करना चाहिये कि, सन्तके दर्शन सभी मनुष्य करते हैं ऐसेही क्यों नहीं हो जाते ? वरन् ऐसा समझना चाहिये कि, जिनका अन्तःकरण कठोर है उनके पूर्वजन्मके पाप बहुत हैं उनका अन्तःकरण पत्थरके समान हो गया है, जिस पर तीररूपी उपदेश अथवा दर्शनका प्रभाव कुछ असर नहीं करता ऐसे अशुद्ध अन्तःकरणवालोंको साधुओंके दर्शन करने और वचन सुननेसे कुछ भी लाभ नहीं होता, कबीर साहब सन्ध्या स्मरणमें कहते हैं कि—

साखी — साधु साधु मुखसे कहे, पाप भसम होइ जाय ।

आप कबीर गुरु कहत हैं, साधू सदा सहाय ॥

साधुके नाम और दर्शनका फल है, जिन साधुओंकी यह महिमा है उनसे बढ़कर दूसरा कौनसा तीर्थ व्रत और दान, पुण्य है ? साधुओंके प्रसादका भी बड़ा माहात्म्य है। साधुओंके चरणामृतकी महिमा बहुत लिखी है, जिससे कि, मनुष्यका अन्तःकरण शुद्ध होता है।