भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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करनेवालेको तुच्छ न समझे । यदि मनमें किसी प्रकारकी घृणा अथवा ग्लानि आवेगी तो उसका यज्ञ भ्रष्ट होकर धर्म नष्ट हो जायेगा । मनमें कभी न समझे कि, मैं इस अभ्यागत अथवा साधुओंको भोजन कराता हूँ वरन् उसका कृतज्ञ हो कि, उसने कृपाकरके भोजन स्वीकार कर लिया । प्रत्येक धर्मोंके साधु और भूखोंको भोजन देना, सम्मान करना उचित है, उनको भोजन बस्त्रसे सन्तुष्ट करना महान् पुण्य है ।

जैन साहित्यका दृष्टान्त—जैनधर्मकी पुस्तकोंमें लिखा है कि, एक विधवा स्त्री थी, उसके केवल एकही पुत्र था । वह बहुत दरिद्र और दुखिया थी, परिश्रम करके अपना और बच्चेका पोषण करती थी उसका पुत्र सर्वदा उससे कहा करता कि ए माता ! “मुझे एक दिन खीर खिला ” वह दुखिया विधवा खीर कहाँसे खिलाती ? बहुत दिनोंतक पुत्रको सन्तोष देती रही पर अन्तमें


मित्तों अथवा अन्य संबंधियोंका भी सत्कार करे ।

पाराशर स्मृतिमें पूर्वोक्त यज्ञोंको न करनेवाले पुरुषोंको पापकी प्राप्ति कही है ।

श्लोक – वैश्वदेवविहीना ये आतिथ्येन विर्वजिताः ।

सर्वे ते नरकं यांति काकयोनिं व्रजंति ते ॥

काष्ठभारसहस्रेषु घृतकुंभशतैन च ।

अतिथिर्यस्य भग्नाशस्तस्य होमो निरर्थकः ॥

जो गृहस्थ वैश्वदेव न करते तथा अतिथिको भोजन नहीं देता वह मर करके अथवा जीवित रहनेपर ही अज्ञानता निर्दयता रूप मृत्युको प्राप्त हो करके नरकको प्राप्त होता है वा जीवित रहनेपर भी नाना दुःख कष्ट और लोकनिंदा आदि दुःखोंको प्राप्त होता है जो नरकसे भी अधिक दुखदाई हैं ।

जिन गृहस्थोंके गृहसे अतिथि पुरुष अन्नादिकोंकी प्राप्ति विना निराश होकर चलाजाता है । यदि सहस्रभार काष्ठों तथा घृतके सहस्र कुंडोंसेभी होम करे, पर किंचित मात्र फल नहीं पासकते कोई कितनाहूँ पुण्य क्यों करे, वेदपाठ, विद्याध्ययन, होम, यज्ञ करे पर यदि भूखा अतिथि द्वारसे फिर जावे तो सब निष्फल हो जाता है ॥

अतिथिका लक्षण पाराशर स्मृतिमें इस प्रकार किया हैं कि—

दूरादुपगतं श्रान्तं वैश्वदेव उपस्थितम् ।

अतिथिं तं विजावीयात्रातिथिः पूर्वमागतः ॥