भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ऊपरको जाता है तो भली प्रकार दृष्टि करके अपनी छायाको देखता है अज्ञान वश उसको अपना स्वरूप समझता है। यद्यपि वह उसकी छाया नहीं होती तथापि अपने ज्ञानके जोरसे अपना स्वरूप जान तदाकार हो जाता है अपनेको परमानन्द समझने लगता है। उसके ज्ञानमें जो अभीतक अन्धकार शेष है उससे यह बेसुध है। वही अन्धकार अविद्या उसके आवागमनका बीज है। जबतक अविद्या नष्ट न होगी तबतक वह अपने भ्रमको ही अपना स्वरूप समझता रहेगा। उसी भ्रमको ब्रह्म बोलते हैं, उसी भ्रममें समस्त संसार बन्धा है, उसीसे जगत्की उत्पत्ति हुई है। यह संसार भ्रमरूप है, इसकी जीवके भ्रमसे ही उत्पत्ति है। जीवही भ्रमसे एकसे अनेक और अनेकसे एक होता है। आदिमें केवल एक जीव था दूसरा कोई नहीं था, उसीसे अनन्त सृष्टि हो गई। एक वीर्यमें अनन्त वीर्य हैं। एक ब्रह्मसे अनन्त ब्रह्म हो गये। पहले एक ब्रह्म प्रगट हुआ उसीसे समस्त भ्रमरूप संसारका प्रादुर्भाव हुआ। वही भ्रम समस्त संसारकी माता है, उसीसे उत्पत्ति और लय हैं। वही जगत्का ईश्वर और कर्त्ता कहलाता है, समस्त संसारमें उसीकी भक्ति होती है। भ्रमकी भक्ति करनेसे कुछ फल नहीं मिलता, नर्क स्वर्ग और मोक्ष सब कुछ भ्रम मात्र है, जिन्होंने तत्त्वमसिके तीनों पदोंको जान लिया उनको यह सब है। भ्रमकी भक्ति करनेसे कुछ फल नहीं मिलता, नर्क स्वर्ग और मोक्ष सब कुछ भ्रम मात्र है, जिन्होंने तत्त्वमसिके तीनों पदोंको जान लिया उनको यह सब तुच्छ जान पड़ता है। इस कारण वे उनके लिये प्रयत्न नहीं करते।

भ्रम ब्रह्म — जब स्त्री गर्भवती होती है तो उससे बालक उत्पन्न होता है गर्भका रहना जोड़े बिना नहीं हो सकता। बीज ही शेष न रहा तो बालक किस-प्रकार उत्पन्न होगा। यदि जीवनमुक्तको वह ज्ञान प्राप्त होता जिससे कि आवागमनका मूलही न रहे तो उनका आवागमन क्यों न छूटेगा?। जबतक बीज हैं तबतक वृक्ष होगा, डाल, पात, फल, फूल आदिककी आशा रहेगी। भ्रमहीकी दशामें जीव 'तत्त्वमसि' के पदको सत्य मान रहा है। इसको उसके ऊपर विश्वास हो रहा है इसलिये उसको सत्य करके मानता है। यह साधारण नियम है कि, मनुष्यकी बुद्धि जिस बातको स्वीकार करलेती है उसीको वह सत्य मान बैठता है। झूठ हो अथवा सच्चे जिसपर मनुष्य विश्वास कर लेता है वह झूठ भी सचही देख पड़ता है। यदि किसी बातको न माने तो उसकी दृष्टिमें झूठही है, जैसे किसी दरिद्रीका नाम राजा रखदिया तो वह कदापि राजा नहीं हो सकता, वह तो यथार्थ में दरिद्रीही है। इस जीवने भी भ्रमकी दशामें जो कुछ निश्चय किया है वह भ्रमरूप ही है, इसी कारण सब जीवनमुक्त वासनामें बंधे आधीन रहते हैं। जो