भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1106

लिङ्गदेह या सूक्ष्म शरीर ।

सन्तो सूक्ष्म देह प्रमाना ।

सूक्ष्म देह अंगुष्ठ बराबर स्वप्न अवस्था जाना ॥
श्वेत वर्ण ॐ कार मात्रका सतोगुण विष्णू देवा ।
उर्द्ध और अर्द्ध यजुर्वेद है कण्ठ स्थान अहैवा ॥
मुक्ति सामीप लोक वैकुण्ठ है पालन किरिया राखी ।
मारग बिहैंग भूचरी मुद्रा अक्षर निर्णय भाखी ॥
आप तत्व कोहं हंकारा मदाग्नी कहिये ।
पञ्च प्राण द्वितीया पद गायत्री मध्यम वाणी लहिये ॥
शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध मन बुद्धि चित्त हंकारा ।
कहैं कबीर सुनो हो सन्तो, यह तन सूक्ष्म सारा ॥ २ ॥

लिङ्ग देह, अंगुष्ठके बराबर, ॐ कार मात्रिका, शुक्ल वर्ण, विष्णु देवता, श्रीहठ स्थान, मध्यमा, वाचा ऊर्ध्व, शून्य यजुर्वेद, वैकुण्ठ लोक, कण्ठस्थान, पालन क्रिया, आप तत्व, भूचरी मुद्रा, विहङ्ग साग, द्वितीय पद गायत्री, क्षर निर्णय, मन्दाग्नि, कोहं अहंकार, सामीप्य मुक्ति, पञ्च भूत, सूक्ष्म प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, चारों अन्तःकरण मन बुद्धि, चित्त, अहंकार, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध यह सूक्ष्म नौ तत्व हैं, पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पञ्च कर्मेन्द्रिय यह सब जड़ अर्थात् अनात्म हैं जिसकी सत्तासे ये चैतन्य होते हैं उसको जीव कहते हैं ।

कारण शरीर ।

सन्तो कारण देह सरेखा ॥

आधा पर्व प्रमाण तमोगुण कारावर्ण परेखा ॥
मध्य शून्य है मकार मात्रका हृदया सो अस्थाना ।
महंदाकाश चाचरी मुद्रा इच्छा शक्ति जाना ॥
उददा अग्नि सुषुप्ति अवस्था निर्णय कण्ठ स्थानी ।
कपि मारग तृतीया पद गायत्री अहै प्राज्ञ अभिमानी ॥
सामवेद पश्यन्ती वाचा मुक्ति स्वरूप बखानी ।
तेज तत्व अद्वैतानन्द अहंकार निखानी ॥
अहै विशुद्ध महात्म जामे तामे कछु न समाई ।
कारण देह इति समपूरण कहैं कबीर बुझाई ॥ ३ ॥