भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1108

निराकाश, सिद्ध स्थान, निराश्रय लोक, निरञ्जन अभिमानी, पञ्चम परमार्थ पद गायत्री, ज्ञान निर्णय, ब्रह्मज्ञान, ब्रह्मानन्द अहंकार, इसी ज्ञान देहको ज्योति स्वरूपी कहते हैं। मुक्तिमय ब्रह्ममय सर्व साक्षी।

षष्ठ विज्ञान देह — विज्ञान देह, आकाश स्वरूप है, न उसका रेख है वा रूप है, न उत्पन्न है न मरे, न आवे, न जावे न भीतर न बाहर, अहंकार रहित मान अपमान रहित रूप अरूप हैं तू, वाच्य अवाच्य, इच्छा अनिच्छा, सबसे रहित नहं नत्वं, न मैं कर्ता न मैं भोक्ता, जैसाका तैसा। न जीव न ब्रह्म न भाया। क्योंकि, विज्ञान देहमें ऐसाही विचार होता है।

इस पर कबीर साहिब — इसके आगे भेद हमारा। जानेगा कोई जानन हारा।

कहैं कबीर जानेगा सोई। जापर दया गुरूकी होई॥

सब ज्ञानी और ध्यानियोंकी दौड़ यहां तक होती है, किसीको इसके आगे की सुधि नहीं। विज्ञान देहके आगे केवल एक पद शेष रहता है, उसीके प्राप्त करनेसे यथार्थमें लीन हो जाता है। यह पारख गुरुकी सहायता बिना नहीं प्राप्त होता, यही सर्वोच्च मुक्तिपद है, शेष सब बन्धन हैं। जब जीव अपने सत्य स्वरूपसे पतित हुआ तो इसकी स्थिति इन छः शरीरोंमें हुई इसीमें भटकने लगा। जो कोई विचार पूर्वक स्वसम्बेदको पढ़ता है उसको सब बातोंका सार मालूम हो जाता है। किसी दूसरी किताब या वेदमें नहीं मिल सकता। जब स्थूल शरीरमें आया तो भ्रममें ऐसा अचेत हुआ कि, कुछ भी सुधि न रही कि, मैं कौन हूँ। कहाँसे आया हूँ? किस कारण उत्पन्न हुआ? फिर इसको गुरुआ लोगोंने भटकाया कर्म उपासना और ज्ञानके नाना उपदेश दिये जब अत्यन्त परिश्रमसे अपने ईश्वरको ढूँढ़ने लगा कुछ प्राप्त न हुआ तो कहने लगा कि, मेरा ईश्वर निर्गुण निराकार वेचून और वेचारा है। कभी तो वेद निर्गुण निराकारकी बन्दना करते हैं। कभी सगुण ईश्वरकी स्तुति करते हैं, न उनको कभी निर्गुणकी सुधि है न कभी सगुणका ठिकाना है। यदि निर्गुण कहा जाय तो उससे सृष्टिका उत्पन्न होना असम्भव है। सगुण कहा जाय तो नाशमान है जो कुछ देखने मुननेमें आता है वो सब विनाशी है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सनकादि सब धोखेमें पड़े हैं। इसीमें सब वेद और वाणी बनाई गई जो पर अपने स्वरूपकी सुधि नहीं पाई। पांच तत्व और तीन गुणका जाननेवाला अलग है। इसने पांचतत्व और तीन गुणोंकी कोठरीमें अपना घर बनाया। वेद पढ़ने लगा नानाप्रकारसे निर्गुण सगुणकी उपासना करने लगा। भिन्न २ मतावलम्बियोंने नानास्वरूपोंमें विविध प्रकारसे उपासना आरम्भ की। कोई तीर्थ व्रत, कोई यज्ञ योग, कोई जप तप आदिके भ्रममें पड़े। मुसलमान