भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 1110, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1110

छः देहों और नौकोशोंमें अपना घर बनाया। येही छः देह और नौ कोशोंतक, जीवकी सीमा ठहरी, किसीमें इसके पार जानेकी सामर्थ्य नहीं, न इसके आगेका समाचार जाननेकी शक्तिही है। इनके ज्ञानका अन्त यहाँही तक है। छः देहसे परे कोई नहीं जा सकता, बरन् इनका भेदभी जाननेवाला कोई कोईही होगा।

१—स्थूल देह पच्चीस तत्त्वकी होती है। वे तत्त्व ये हैं—पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, दश इन्द्रिय, पाँच प्राण, चारों अन्तःकरण और जीव जाग्रित अवस्था है।

२—सूक्ष्म शरीर सत्तरह तत्त्वकी है। वे ये हैं—पञ्च प्राण, दश इन्द्रिय, मत बुद्धि और स्वप्न अवस्था है।

३—कारण देह तीन तत्त्वकी है—चित्त अहङ्कार और जीवात्मा, मुषुष्टि-अवस्था।

४—महाकारण देह दो तत्त्वकी है—अहङ्कार जीवात्मा, तुरियावस्था।

५—कैवल्य देह एक तत्त्वकी है—चित्त जीवात्मा तुरियातीत अवस्था जिस प्रकाशमें यह जीव समष्टि रूप था उसीको इसने अपना स्वरूप माना इसका ऐसा मानना भ्रम मात्र है।

हंस देह।

इस शब्दमें कबीर साहिबने बताया है कि, ए महात्माओ ! साहिबके हंसोंका ऐसा रूप हुआ करता है—

सन्तो सुनो हंस तन ब्याना।

अवरण बरण रूप नहीं रेखा ज्ञान रहित विज्ञाना ॥
नहीं उपजे नहीं विनशे कबहूँ नहीं आवे नहीं जाहीं।
इच्छ अनिच्छ न दृष्टि अदृष्टी नहीं बाहर नहीं माहीं ॥
मैं तू रहिन न करता भोगता नहीं मान अपमानी।
नहीं ब्रह्म नहीं जीव न माया ज्योंका त्यों वह जानी ॥
मन बुधि गुन इन्द्रिहु नहीं जाना अकह अलख निर्बाना ॥
अकह अनेह अनादि अभेदा निगम नेति फिरि जाना ॥
तत्वरहित रविचन्द्र न तारा नहीं देवी नहीं देवा।
स्वयं सिद्धि प्रकाशक कह्यो है नहीं स्वामी नहीं सेवा ॥
हंस देह विज्ञान भाव यह सकल वासना त्यागे।
नहीं आगे नहीं पीछे कोई निज प्रकाशमें पागे ॥
निज प्रकाशमें आप अपन पौ भूली भये विज्ञानी।

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश) · पृष्ठ 1110, कुल 1367 में से · BharatKosha