भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1125

४ परमानन्द—वह है कि, सुरतीको सत शब्दमें लीनकर देवै सत लोकमें प्रविष्ट हो । यह पदवी सबसे उत्कृष्ट है । स्वसम्बेद इसीकी प्रशंसा करता है । इससे बढ़कर कोई पदवी नहीं है इस आनन्दको पानेपर इसके आगे सब आनन्द तुच्छ हैं । उक्त तीन पदवीमें जीवमुक्ति कहलाती हैं असत्य हैं । यह परमानन्द पद सत्य है ।

तत्त्वमसि इत्यादिका विशद वर्णन ।

यह जीव अपने यथार्थ स्वरूपको भूलकर झोंई को साई कहने लगा, अन्वेषण करते करते थक गया, भी चक्करमें पड़ा, योगी, जड़म सेवड़ा आदिके पास गया, जीव ईश्वरका तत्व पूछने लगा. उन्होंने इसे कर्म उपासना ज्ञान और साधनोंमें लगाया, नानाप्रकारके माहात्म्य बुनाये । चित्त चला बुद्धिने निश्चय करलिया, अहङ्कार उठा इस अहङ्कारकी गांठ पड़ी तो इसमें ऐसा विचार हुआ कि, हम सबसे पहलेही तरेंगे । इस प्रकार ज्ञानी और अज्ञानी सब धोखेमें पड़कर आवागमनमें प्रवृत्त हुये हैं ।

गुरुओंने जो झूठे विचार बतलाये सब मनुष्योंने उन्हींको सच करके मान लिया । उन्हीपर ऐसा निश्चय किया कि, कोई पारख पदको भी समझावें तो भी कोई नहीं मानता । जहाँ मन बुद्धिकी पहुँच नहीं वहाँ ब्रह्मका खोज क्यों कर होगा ? न कहीं, ब्रह्म न कहीं ईश्वर, न अल्लाह न खुदा न राम न रहीम, यह सब जीवके संकल्प मात्र हैं । एक यह जीव सत्य है, सब झूठ हैं, जहाँतक यह दौड़ता गया वहाँतक इसी प्रकार मानता गया । जहाँ पर यह थककर बैठ गया, वहाँ परब्रह्मका स्वरूप समझ लिया । जिसको इसने ब्रह्मका स्वरूप निश्चय कर लिया बोही इसका भ्रम है । इसका भ्रमही ब्रह्म ठहर गया । इस प्रकार यह भुलाकर चौरासीके बन्धनमें पड़ा तत्त्वमसिके तीन पदोंमें जकड़ा गया ।

(१) त्वम् पदसे दो प्रकारके अज्ञानका कथन ।

इस त्वं पदमें सबविषयी बंधे हुये हैं, इसको विशेष अपरोक्ष अज्ञान कहते हैं । जो खाना पीना स्त्री प्रसङ्ग करना, भोगविलास पसन्द करता है, अपने जात्याभिमानमें रहता है, वेद शास्त्र और गुरुको नहीं मानता, बुद्धिमानों और ज्ञानियोंकी निन्दा करता है, साधुओंका ठठुा करता है. उनसे कहता कि, यह अभागे हैं उत्तम सांसारिक सुखोंको छोड़कर धक्के खाते और दुःख उठाते फिरते हैं । मृगनैनीके सुखका आनन्द उनके भाग्यमें नहीं है । मुक्ति कोई पदार्थ नहीं केवल मनकी भ्रममात्र कल्पना है । जब मृत्यु होती है तभी मोक्ष हो जाती है, जबतक शरीर है तभीतक सब कुछ है, पीछे कुछ भी नहीं रहता. जिस प्रकार वृक्षसे पत्ता गिर