कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1154, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंछले ज्ञानी ध्यानी हटा ध्यानको । छले सिद्ध मारे विषेवानको ॥
जो धनका तुझे ध्यान दिलमें बड़ा । गिरफ्तार लज्जातमें जा पड़ा ॥
यही धन सभी पाको साज है । धरे सो धरे देख जमराज है ॥
इन्ही तानको फाँस तू जानले । हमलमें दर आना नरक मानले ॥
दिया गुरुको तीनों तू अपनी बला । तेरो पापका भार सर सेटला ॥
जहर देके तूने अमी लेलिया । बताओ भलाजी न बदला किया ॥
कहो कौन है जगमें ऐसा कोई । सुधा देके लेवे जहरको जोई ॥
सिवा एक गुरु देवके कौन है । अगम ज्ञान दाता दया भौन है ॥
दिया जिसने सत् नामका जाप है । गई भ्रम पहचाने तब आप है ॥
सभी रिद्धि और सिद्धि इसके गुलाम । जो मुश्दिद मिहरबानीसे लेवेनाम ॥
कहो गुरुसे कहाले मिलेंगे वहीँ । बदल नामकी पास मेरे नहीं ॥
न गुरु देवसा जगतमें मीत है । पचेगा जिन्हे गुरु चरण प्रीति है ॥
मेरी आजिजी खाक सारी तमाम । हमः उग्रकर शुक्र उसका मदाम ॥
मेरी इन कसारीको कीजे कबूल । मिहरबान मुश्दिद मुकद्दस रमूल ॥
मैं आजिज फिरोतन न तनमें है जोर । तू क्रादिर खुदाको बन्द है बन्दी छोर ।
संसारियोंको उपदेश ।
उसकी बुद्धि और विवेकको धन्य है जिसने अपनेको अज्ञानतामें फँसा हुआ देखकर, शीघ्रही सत्सङ्ग खोज अपने आचारको ठीक कर सदाचारी बन गया । उस पर शोक है जो देख जानके भ्रममें फँसा उसीके पक्षपातमें पड़कर सत्य असत्यका विचार न करके झूठको सच्चा कर दिखलाता है उसको सिद्ध करनेके लिये नानाप्रकारके प्रमाणों और युक्तियोंको काममें लाता है । आप सत्य-पथ भूला है, दूसरोंको भी कुमार्गमें डालता है । उसका जीवन तुच्छ है जिसने सत्य भेदको न पाया, जिसने विवेक ज्ञानको प्राप्त न किया । जिसको ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ, वह वेदपाठी हुआ तो क्या ? कुरान और हदीस पढ़ा तो क्या ? पूजा निमाज और व्रत रोजा रखा तो क्या ? सत्यको न पा पक्षपातमें पड़ा मूर्ख कहता है । मेराही धर्म सबसे बड़ा है, इसके बराबर दूसरा कोई नहीं, यह हमारे गुरुने बतलाया, हमारे पुरुषाओंने इसका आचरण किया, मैं इसको न छोड़ूँगा । इसी पक्षपातमें पड़ा हुआ मूर्ख कहता है, मैं जो कहता हूँ, जिस धर्मको मानता हूँ, जो कुछ मेरे गुरुने बतलाया है वही मोक्षमार्ग है, इसके बिनासब बन्धनमें हूँ, अपने आचार्य गुरुके वचनमें किसी प्रकारका सन्देह करना अथवा विचार करना पाप है । ऐसे मूर्ख पक्षपातीको कभी ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता, ऐसा