भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1156

अपना हठ न छोड़ा, उसी लोहेको लिये रहा । कुछ और आगे चलनेपर एक रत्नोंकी खान मिली, सबोंने सोना फँककर रत्न बाँध लिया, पर उस दुराग्रही लोहेवालेने वहाँ भी रत्नोंका अनादर करके लोहाहीके बोझकोही अच्छा समझा । सब अपने अपने घर पहुँचे, जो लोग रत्न लाये थे वे एक एक रत्नको बेचकर अपना व्यवहार चलाने लगे । आनन्द पूर्वक दिन व्यतीत करने लगे, धनी होगये देश देशमें सबका वाणिज्य फैल गया, दिन दिन उत्पत्ति होने लगी । पर वह अभागा लोहेवाला प्रथम तो कुछ दिनों लोहा बेचकर सूखी रुखी खाकर दिन बिताता रहा । फिर दरिद्र हो भूखों मरने लगा । तब दूसरे साथियोंके पास मँगने गया । उन लोगोंने उत्तर दिया कि, हे मूर्ख ! हम लोगोंने तुझे कितना समझाया तूने एकका भी कहना न माना, लोहेको फँककर जवाहिरात तक नहीं ली अब हम क्या करें ? यह तेरे कम्मोंका ही फल है, जो जैसा बोता है वैसाही फल मिलता है ।

साखी – करै बुराई सुख चहै, कैसे पावे कोय ।

रोपे पेड़ वबूलका, आम कहाँ ते होय ॥

जो कोई सज्जनोंकी रीति द्वारा शुभकम्मोंमें अपना मन लगाता है उसका सब कष्ट दूर होता है । वही सद्गुरुका कृपापात्र बनता है । सज्जनोंकी रीति अनुसार शुभकम्मोंमें लगा रहनाही सुखका मार्ग है जो असज्जनोंवत् अशुभ कम्मोंमें प्रवृत्त होगा वह कभी भी सुख न पा सकेगा । जो सद्गुरुकी शरण हो शुभ कम्मोंमें लगेगा वह दोनों लोकोंमें भाग्यवान होगा । इस कारण शुभ कम्मोंही सज्जनोंकी रीतिके अनुसार करना उचित है, यही मनुष्यका कर्तव्य है । शुभ-कम्मोंसे सद्गुरु मिलते हैं, शुभ कम्मोंसेही पापोंसेभी छूट जाता है, शुभकम्मोंसेही जठराग्निकी अग्निसे बचता है, शुभकम्मोंमें प्रवृत्तिही अज्ञानताको दूर कर ज्ञानका प्रकाश प्रगट करती है, शुभकम्मोंही करना उचित है ।

कम्मोंही द्वारा सब जगतकी उत्पत्ति हुई है, कम्महीके आधारसे ग्रह, नदी, पहाड़, समुद्र आदि खड़े हैं, कम्मोंहीसे सूर्य, चन्द्र, भ्रमण करते हैं, कम्मोंही द्वारा ईश्वर और जगत प्रगट हुए हैं, कम्मोंहीसे तीन लोक चौदह भुवन बने हैं, कम्मोंहीसे इन्द्रको छोड़ निद्रन्द पदमें स्थित होता है ।

सदाचरणही माता पिता है, बहन भाई है, यही पुत्र मित्र और सहायक है । सदाचरणसेही लोक परलोकका सुख प्राप्त होता है, सदाचारही उच्चसे उच्चपदको प्राप्त कराता है, सदाचारही संसारमें माननीय और प्रतिष्ठित बनाता है, यही है, जिससे मनुष्य ऋषि, मुनि, सन्त, साधु, पीर, पैगम्बर