भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1163

जो मंत्र यंत्र तंत्र आदि पर विश्वास रखता है, वह ईश्वरका प्रेमी नहीं। उसने परमात्माकी शरण नहीं लिया जो परमात्माकी शरणमें प्राप्त होता है यदि सारा संसार भी उसका शत्रु बन जाये तो भी उसकी कुछ भी हानि नहीं होती । चाहे कौसा भी कष्ट क्यों न पड़े पर ईश्वरके बिना किसीसे किसी प्रकारकी आशा न रखे । यदि तनिक भी दूसरेका ध्यान आवेगा तो शरणागतके पदसे गिरा देगा । प्रह्लादको अनंत कष्ट पड़ा तो भी उसका मन न चलायमान हुआ, शरणागति न छोड़ी तो परमात्माने सब अवस्थाओंमें उसकी रक्षा की । प्रह्लादजीकी सात और ध्रुवकी केवल पांच वर्षकी आयु थी ये दोनों सब विश्वासियों (शरणागत परा-यणों) में श्रेष्ठ हैं । इसी प्रकार हजरत इबराहीम भी शरणागत प्राप्तोंमें श्रेष्ठ हैं। क्योंकि, जब नमरुद बादशाहने उनको अग्निमें डाला तो यद्यपि अग्नि ऐसी तेज थी कि, फिरिस्ते भयखाते थे, पर इबराहीमको कुछ भी भय नहीं था । वे केवल खुदाकी ओर ध्यान लगाये बैठे थे, यहांतक कि, उसी अवस्थामें जिबराईलने खुदाकी आज्ञा लेकर इब्राहीमसे कहा कि, ऐ इब्राहीम ! मैं तुझको बचाता हूँ तब इब्राहीमने पूछा, खुदातआलाका हुक्म है ? कि, तुम मुझको बचाओ । जबराईलने कहा कि, खुदाका तो हुक्म नहीं वरन् मैं अपनी ओरसे बचाता हूँ । इब्राहीम ने कहा कि, यदि खुदाका हुक्म नहीं है तो मैं बचना नहीं चाहता । जबराईल यह बात सुनकर पीछे चले गये । तब क्रमशः इसराफील इजराईल आदि फिरिश्ते आकर इब्राहीमको बचानेके लिये कहा पर इब्राहीमने वही उत्तर दिया । उसी समय खुदाकी कुदरतसे आग सुन्दर वाटिका बन गयी अग्निका कहीं पता न लगा । जो कोई ईश्वरको शरणागत हो उसीको उभयलोकका आनन्द प्राप्त होगा ।

साखी - कबीर - सौ वर्ष सेवा करे, एक दिन सेवे आन ।

सो अपराधी आतमा, निश्चय नरक निधान ॥ १ ॥

कबीर - सत्यनामको छोड़िके, करे आनकी आस ।

कह कबीर ता दासका, होय नकमें बास ॥ २ ॥

कबीर-आन भजे सो आँधरा, हरिहिं भजे सो साधु ॥

सत्य भजे सो वैष्णव, ताको मता अगाधु ॥ ३ ॥

कबीर-देवी देवता ढह पड़े, हमको ठौर बताव ।

जो कोई हरि सो विमुख है, तिनको तुम ले खाव ॥ ४ ॥

कबीर-मढ़ी मसानी शीतला, भैरों औ हनुमन्त ।

साहेब सो न्यारा रहे, जो उनको पूजन्त ॥ ५ ॥

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