कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1164, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंगजल — जिनको है जहानमें बखुदाबन्द तवक्कुल ।
उनको न खतर कर दफा दुःख द्वन्द तवक्कुल ॥
प्रह्लादको पर्वतसे दिया डाल जमीं पर है ।
और आगकी सोजिशको किया बन्द तवक्कुल ॥
इब्राहीमके खातिर आतश हुई गुलजार ।
सब दुःख रफा कर किया आनन्द तवक्कुल ॥
इससे न कोई दूसरा है सरवते शीरीं ।
शीरीं है सो अजमिसरी अज कन्द तवक्कुल ॥
जुजहक्कु न किसीसे रख उमरीद ऐ लोन ।
कर दीन व ईमान पुन पायबन्द तवक्कुल ॥
तफक्कुर (मनन)
एक क्षणका तफक्कुर (मनन) वर्षभरकी तपस्याके समान है । यथार्थमें चिंतन और मननका पद सबधर्मोंके अनुसार बहुत ऊँचा है ? पवित्र पुस्तकोंको पढ़ना, उसके अर्थ और आशयपर विचार करना, चिंतन करनेके समय ऐसा हो जाना कि, दूसरा संकल्प भी मनमें न आने पावे । जो बेफिकरीके साथ काम करता है वह अन्तमें लज्जा और हानि उठाता है ।
प्रथम मनुष्यकी दशापर विचार करना चाहिये कि, यह किस अवस्थासे पतित होकर किस अवस्थाको पहुँचा है ! अपनी सत्य स्वरूपी देहसे किस प्रकार विलग हो, किस प्रकार दुःखमें फँसा । इसने अपनेको अच्छा जाना, रूपका अभिमान किया, पतित हुआ अनन्त दुःखोंको भोगने लगा । यद्यपि वेदके अनुसार ऋषि मुनियोंने भजन करके ईश्वरके पदको भी प्राप्त किया तो भी सब उस पर कायम न रह सके । यदि स्वसंबेदकी शिक्षानुसार भजन करते तो पारख गुरुको प्राप्त हो अक्षय पदमें स्थित हो जाते । इसी प्रकार वो बड़े २ विद्वान् पण्डित विद्याके अभिमानमें किसीको कुछ न समझते थे, वे सब भी अभिमानके कारण पतित हुए. जो बड़े २ बादशाह, राजा, महाराजा आदि ईश्वर होने तकका दावा करते थे, वे कुत्तोंकी मौत मरे ।
इन बातोंके विचारसे सिद्ध होता है कि, हमारी तबाहीका कारण केवल अहंकारही है । अहंकारही बुरे होनेपर हमको दूसरोंसे अच्छा समझना सिखाता है । जिसने हमको सत्यस्वरूपी देहसे पतित किया, वह सर्वदा छः देहों और चौरासी लाख योनियोंमें भी लगा रहता है । जब तक यह न छूटेगा, कदापि स्थिति न होगी । जीव झूठे अहंकारमें फँसा हुआ छः देहोंमें अनेक दुःखोंको भोगता भटकता फिरता