भारतकोश
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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

स्थूल सृष्टि

गजल — जिनको है जहानमें बखुदाबन्द तवक्कुल ।
उनको न खतर कर दफा दुःख द्वन्द तवक्कुल ॥
प्रह्लादको पर्वतसे दिया डाल जमीं पर है ।
और आगकी सोजिशको किया बन्द तवक्कुल ॥
इब्राहीमके खातिर आतश हुई गुलजार ।
सब दुःख रफा कर किया आनन्द तवक्कुल ॥
इससे न कोई दूसरा है सरवते शीरीं ।
शीरीं है सो अजमिसरी अज कन्द तवक्कुल ॥
जुजहक्कु न किसीसे रख उमरीद ऐ लोन ।
कर दीन व ईमान पुन पायबन्द तवक्कुल ॥

तफक्कुर (मनन)

एक क्षणका तफक्कुर (मनन) वर्षभरकी तपस्याके समान है । यथार्थमें चिंतन और मननका पद सबधर्मोंके अनुसार बहुत ऊँचा है ? पवित्र पुस्तकोंको पढ़ना, उसके अर्थ और आशयपर विचार करना, चिंतन करनेके समय ऐसा हो जाना कि, दूसरा संकल्प भी मनमें न आने पावे । जो बेफिकरीके साथ काम करता है वह अन्तमें लज्जा और हानि उठाता है ।

प्रथम मनुष्यकी दशापर विचार करना चाहिये कि, यह किस अवस्थासे पतित होकर किस अवस्थाको पहुँचा है ! अपनी सत्य स्वरूपी देहसे किस प्रकार विलग हो, किस प्रकार दुःखमें फँसा । इसने अपनेको अच्छा जाना, रूपका अभिमान किया, पतित हुआ अनन्त दुःखोंको भोगने लगा । यद्यपि वेदके अनुसार ऋषि मुनियोंने भजन करके ईश्वरके पदको भी प्राप्त किया तो भी सब उस पर कायम न रह सके । यदि स्वसंबेदकी शिक्षानुसार भजन करते तो पारख गुरुको प्राप्त हो अक्षय पदमें स्थित हो जाते । इसी प्रकार वो बड़े २ विद्वान् पण्डित विद्याके अभिमानमें किसीको कुछ न समझते थे, वे सब भी अभिमानके कारण पतित हुए. जो बड़े २ बादशाह, राजा, महाराजा आदि ईश्वर होने तकका दावा करते थे, वे कुत्तोंकी मौत मरे ।

इन बातोंके विचारसे सिद्ध होता है कि, हमारी तबाहीका कारण केवल अहंकारही है । अहंकारही बुरे होनेपर हमको दूसरोंसे अच्छा समझना सिखाता है । जिसने हमको सत्यस्वरूपी देहसे पतित किया, वह सर्वदा छः देहों और चौरासी लाख योनियोंमें भी लगा रहता है । जब तक यह न छूटेगा, कदापि स्थिति न होगी । जीव झूठे अहंकारमें फँसा हुआ छः देहोंमें अनेक दुःखोंको भोगता भटकता फिरता

प्रपञ्चसे छूटनेके साधन

है । ब्रह्म, जीव, माया, ईश्वर आदि सब अहंकारके ही भ्रममें हैं । सत्यगुरुकी दया विना अहंकारसे छूटकर निर्व्रम पदमें स्थिति होना अत्यन्त कठिन है । जितने मुक्तिके देनेवाले और मुक्ति चाहनेवाले हैं सब धूरकी रस्सी बाँटकर आकाशकी कूँआसे जल पीना चाहते हैं । जब तक इनको सद्बिचार न आवेगा तब तक इनका ठिकाना नहीं लगेगा । जो पशु धर्म (विषय विलास) में भूल जावे वे तो पशु हैं, उसको कभी सत्य पथ न मिलेगा, न वह मनुष्यत्वकी ओर जा सकता है । मनुष्य आपही अपना मित्र, आपही अपना शत्रु है । अपना कोई शत्रु नहीं, सब भला, अपने मनकी ओरसे ही बुरा प्रस्ताव होता है, किसको बुरा कहा जावे किसको भला ।

साखी — बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न देखा कोय ।

जो दिल खोजा अपना, मुझसा बुरा न होय ॥

शुद्ध विचार और चिन्ताके बिना जीव कुत्तोंके समान दर दर भटकता फिरता है । सब कुछ आपही है, पर ज्ञान और बुद्धि कहें कि, आपको पहचान सके । आपही आशिक (प्रेमी) है आपही माशूक (प्रीतम) सुखी है, आपही दुःखी । आपही बन्ध और आपही मोक्ष है ।

अहंकारसे ही इसकी दुर्गति हो रही है । इस शत्रुके दो हथियार हैं, एक स्त्री और दूसरा अहंकार है । इसने ही नाना प्रकारके धर्म रीति व्यवहार प्रगट कर जगत्को फँसा रहा है ।

जब तक मनुष्य “सर्वं खलिबंद ब्रह्म” नहीं देखता, तबतक उसके भजनका तार लगा रहता है, जबतक पूर्ण परमात्माका साक्षात्कार न हो तबतक प्राणा-पन्न सदाचारमें रहकर भजन भक्तिमें लगा रहना चाहिये । जब “सर्वं वही है अर्थात् सब परमात्माही है” का ज्ञान हो जाता है, तब आपही आप अहंकार छूट जाता है । ऐसोंमें धैर्य आदि गुण स्वभावसे ही वर्तते हैं । कौसा भी कष्ट क्यों न पड़े, कभी अधीर नहीं होते तीन लोकका राज्य भी मिल जावे तो भी आनन्द नहीं मानते । कठिन तपस्या अथवा किसी नियमको हठसे धारण करनेसे मुक्ति नहीं होती वरन् विचार विवेक, द्वारा आत्मचिन्तन करनेसे मोक्ष होता है । सत्य और असत्यका निर्णय न करेगा, सार शब्दको न पावेगा । अज्ञानी लोग यह नहीं विचारते कि, “जिन देवी देवताओंकी हम पूजा करते हैं वे स्वयं बन्धनमें फँसे हैं, हमें क्या मोक्ष देंगे” वे स्वयं दूसरोंके आश्रयमें भटकते हैं मुझे क्या आश्रय देंगे ?

शब्द — भूली मालिन आयो सतगुरु, जागता है देव ।

ब्रह्म पाती विष्णु डाली, फूल शंकर देव ॥

पक्के तत्त्वकी प्राप्ति, हंसकबोर और दूसरेमें भेद प्रामाणिकता कथन

तीन देव प्रत्यक्ष तोड़े, करे किसकी सेव ॥
पाथर गढ़के मूरति कीनी, धरिक्छे छाती लात ।
जो वह मूरति साँची होती, गढ़नहारको खात ॥
भाँति बहुत और लापसी, करि करि पूजा सार ।
भोगन हारा भोगिया, मूरतिके मुख छार ॥
पाती तोड़े मालिनी, और पाती पाती जीव ।
जा पाहनको पाती तोड़े, सो पाहन निर्जीव ॥
मालिन भूली जगत् भुलाना, हम भुलावे नाहिं ।
कहें कवीर हम राम राखे, कृपा करि हरि राय ॥

जबतक जीव पांचों अहंकारोंको न छोड़ेगा तबतक कल्याण न होगा, अहंकारही सब कर्मोंका मूल एवं बन्धनका कारण हैं। जिसने अहंकार छोड़ा वह उभय लोकमें सुखी हुआ। निरहंकारी पुरुष कभी मूर्खोंकी संगति स्वीकार नहीं करता, क्योंकि, मूर्खलोग मिथ्या अहंकारमें पड़े पक्षापक्षमें फँसे होते हैं। पक्षापाती और अहंकारी तथा धर्मद्वेषियों की संगतिसे सत्यगुरु नहीं प्राप्त होते बरन् निर्पक्ष, सत्याचारी, सद्गुणसम्पन्न विद्वानोंकी संगतिसे सत्यगुरु प्राप्त होते हैं।

हे अधिकारी जनो ! नम्रता धारणकर सबके साथ प्रेमहीका बरताव करो, दीन दुखियोंको तुच्छ न समझो। क्योंकि, सत्यगुरु इन्हीं लोगोंपर प्रसन्न होता है उन्हींके स्वरूपमें वन्दीछोर मिलता है। अहं त्वमें पड़कर अपने यथार्थको हाथसे मत खोओ। शरीरके अभिमानमें न पड़ो।

सारा संसार अनित्य है, अनित्यका सब खेल है, देहाभिमानमें पड़ना अज्ञानता और मूर्खताके सिवा दूसरा क्या है ? इसीको अविद्या सागर कहते हैं। देहाभिमानी कभी सुख नहीं पाता, सर्वदा दुख सागरमें गोता खाया करता है। यद्यपि यह मनुष्यशरीर सर्वोत्कृष्ट है, पर इसके अभिमानमें पड़कर इसीके पोषण पालनमें रहनेके लिये नहीं किन्तु आत्मविचार कर सत्यपदको प्राप्त करनेके लियेही श्रेष्ठता है। यदि मनुष्य शरीर पाकर आत्मविचार न हुआ तो इससे बढ़कर नीच और तुच्छ कोई भी नहीं। क्योंकि, दूसरे शरीरोंमें पड़ा हुआ जीव स्वप्न सुषुप्ति अवस्था के कारण स्वाभाविक ही अविद्याके वशमें पड़ा होता है। केवल मनुष्य शरीर पाकर जीव जाग्रत अवस्था पर अधिकृत होता है। इसमें भी जाग्रत नहीं हुआ यानी आत्मज्ञान प्राप्त नहीं किया तो पशुसे भी तुच्छ हुआ। देहाभिमानमें पड़ा हुआ जीव सदा काल फाँसमें पड़ा रहता है, जबतक देहाभिमान न छोड़ेगा तबतक सुखका दर्शन भी न होगा। यदि लोक परलोककी सर्व सामग्री और सुख प्राप्त हो

समस्त संसार और उसके कार्य निर्गुण सगुण अम्र छाया वासना, उसका साथ

जावे तो भी देहाभिमानमें पड़ा, काल पुरुषकी आज्ञासे कभी बाहर नहीं हो सकता । यदि एक कँदीको उत्तम उत्तम पदार्थ देवें तो क्या वह अपनी स्वतंत्रताको भुलाकर कभी उनकी ओर दृष्टि डालेगा ? इसी प्रकार देहाभिमानमें कभी सुख नहीं प्राप्त हो सकता । बन्धनके समान दूसरा कौन दुख है ? देहाभिमान छोड़ देनाही मनुष्यत्व का चिह्न है । जो देहाभिमानमें फँसकर नाना प्रकारकी संसारिक विषयवासनाओं को ग्रहण करता है, उसे कभी सत्यगुरु नहीं मिल सकता ।

ये पिण्ड और ब्रह्माण्ड दोनों फूटे हैं । जो कुछ पिण्ड ब्रह्माण्डके सम्बन्धी हैं सब मिथ्या हैं । जीव संसारिक सब पदोंको प्राप्त करके भी बन्धनसे नहीं निकलता, फिर इसे पदार्थोंका प्राप्त होना कौनसे काम आया ।

गजल—पहले मैं शाहंशाहा था, आलमका क़िबले गाह था ।

फिर भी गदा दर्गाह था, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

पहले मैं रमता राम था, नज्में दुनि दीन काम था ।

यह भी ख्याले खाम था, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

मैं साहेब तदबीर था, जगका गुरु और पीर था ।

ताहमपुर अज्र तक्रसीर था मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

मुझसेही नाद और बिन्द था, मैंही गुरु गोबिन्द था ।

सूफी कलन्दर रिन्द था, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

आकाश आतश पौन हूँ, कहूँ मैं कौन हूँ ? ।

इसही लिये मैं मौन हूँ, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

बाज़ार सौदा गर्म है, लेनेसे मुझको शर्म है ।

यह दिलका मेरे भर्म है, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

ऋषिरायने सब कुछ कहा, कुछ भेद दर पर्दे रहा ।

मैं खोलकर बतला दिया, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

मुझहीसे पाप और पुण्य है, सब ध्यान और सब धुन है ।

वेद और कुतुब सब सुन्न है, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

मैं भ्रमका पुतला बना, खुदको बन्दा गिना ।

मुझहीसे पैदाइश फना, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

नादान बखुद मगरूर है, घेरे शवे दैजूर है ।

ज़ाहिर कहाँ वह नूर है, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

होवे भलाई यारसे, देखे अगर वह प्यारसे ।

रखले अज़ावुननारसे, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

कर्म उपासना अम्र वटमार, चार प्रकारके आनन्द, अज्ञानानन्द

मैं जीव ब्रह्म माया बना, सब दीदनी काया बना ।

सब धर्म और दाया बना, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

मुशिद कदमकी खाक हो, आवागमनसे पाक हो ।

उसकी मिहर बेबाक हो, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

वे वृक्षके इनसाँ मरे, आवागमनका दुख भरे ।

आजिज विचारा क्या करे, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

जो बोलता है तो परमात्माकी बात, जो मौन होता है तो सोचता है परमात्माका ज्ञान, जो देखता है परमात्माका दर्शन, सच्चा साधु वही है । जिसने विचार नहीं किया वह साधु पद नहीं पा सकता । विवेकही सबका सार है, साधुके लक्षणोंमेंसे विवेकही मुख्य लक्षण है । विचार विवेक वह पदार्थ है कि, सब पापों और बुरे संकल्पोंको जड़से नाश कर देता है ।

अध्याय २२

मतोंका विशेष विचार

मनुष्य मात्रके धर्म ।

बुद्धिमान् विवेकी, विचारवानोंको विचार करना चाहिये कि, मनुष्यका क्या धर्म है ? किस कारण परमात्माने अपने स्वरूपमें प्रगट किया है ? जब सोचेगा तब ज्ञान हो जावेगा कि, पंतूक पदको प्राप्त करनेके लियेही यह उत्पन्न किया गया है । इसका धन वही है, जिससे आत्मस्वरूप जाना जाता है । इस कारण मनुष्यको उचित है कि, सांसारिक प्रपंचसे मन हटाकर अपने यथार्थ कर्तव्यमें लग जाय । ईश्वरने इसे अपना स्थानापन्न बनाया है । क्योंकि, सृष्टिमें कोई भी जीव-धारी ऐसा नहीं है, जिसको कि, ईश्वरने अपने स्वरूपमें बनाया हो । मनुष्यका कर्तव्य भी सबसे भिन्नही नियत किया है; इसकी बनाबटही ऐसी बनाई है कि, जिससे इसको विवश हो ईश्वरकी आज्ञा माननी पड़े । यथार्थमें परमात्माने भक्ति का भण्डार मनुष्यको दिया है, यदि इसकी पूर्ण रीतिसे रक्षा न करेगा तो दण्डका अधिकारी होगा ।

१ जंगम, २ स्थावर, ३ वनस्पति ये तीन प्रकारोंकी सृष्टि है; १ चलने, फिरने और संकल्पादि करनेवाला जंगम, २ केवल बढ़ने और पुष्ट आदि होनेकी शक्तिवाला वनस्पति और २ जड़, स्थावर है । सदाचार देवताओंका गुण है । मनुष्य बुद्धि रखता है । इस कारण उचित है कि; पशुधर्मको छोड़ दे । देवधर्मों को धारण करे । दैवी वह धर्म है, जो कि, सर्वथाही शुद्ध हो अर्थात् दैवी सम्पत्तिसे

ज्ञानानन्दका स्वरूप विज्ञानानन्द, परमानन्द, तत्त्वमसि इत्यादिका विशद वर्णन त्वम् पदसे दो प्रकारके अज्ञानका कथन

र्ण हो । आसुरी सम्पत्तिका त्याग करे । जहाँतक होसके निषिद्ध घृणित व्यवहार
प्रीका संकल्प न भी करे । किसी जीवधारीको किसी प्रकार भी कष्ट न पहुँचावे ।

परमात्माने मनुष्यका पद देवतोंसे भी श्रेष्ठ बनाया है। क्योंकि, देवतालोग
स्वर्गमें रहतेही हैं उनको स्वर्ग प्राप्तिके लिये कुछ भी यत्न नहीं करना आता ।
इसके बिना वे मोक्षको भी प्राप्त नहीं कर सकते, मनुष्य असंख्य रुकावटोंको पारकर
स्वर्ग तथा मोक्षको प्राप्त कर लेता है । यही कारण है कि, खुदाने आदमका पुतला
बनाकर सब फिरिस्तोंको आज्ञा दी थी कि, आदमको नमस्कार करो । शैतानने आदम
से अपनेको अच्छा समझा इसी कारण लोकसे निकाला गया । मनुष्य पदके सन्मुख
स्वर्गादि सब तुच्छ हैं पर जिस प्रकार शैतानने आदमसे आपको अच्छा समझा,
वह पतित हुआ । उसी प्रकार जो अहं लावेगा अपनेको अच्छा और दूसरोंको तुच्छ
समझेगा वह अवश्य नीचेकी ओर गिरेगा । अथवा जो पक्षपात करके अपनेकी
अथवा किसी दूसरोंको देहाभिमानमें फँसावेगा, वह शैतान और शैतानका भाई
है । न जाने किस स्वरूपमें सत्यगुरु मिल जाय । इस कारण सबसे नम्र और अधीन
होकर दास भावमेंही वर्तें, यही मनुष्यका श्रेष्ठ धर्म है ।

अहंकारहीके कारण जीव अपने सत्य और सुखमय स्वरूपसे पतित हुआ
है । चौरासी लाख योनिमें भटकने और नाना प्रकारके दुःख सहनेका मूल कारण
देहाभिमान ही है । मनुष्यका पद सब पदोंसे उच्च है। क्योंकि, जीव मुक्त होकर
मिल जावे । सब देवते उसके आगे दण्डवत नमस्कार करते हैं । मनुष्यपद सब पदों
में श्रेष्ठ पद है ।

इस कारण जो मनुष्य बनना चाहता है उसको मनुष्यका लक्षण धारण
करना चाहिये । यदि राजाका कोई भी ओहदेदार, अपना कर्तव्य ठीक २ न करे
तो दरबार से निकाल देने और पदसे गिरा देने लायक होता है वह पतित भी हो
जाता है । इसी प्रकार मनुष्य अपने लक्षणको न धारण करेगा, तो किस प्रकार
मनुष्य के पदका अधिकारी हो सकेगा ।

जो चाहता है कि, मनुष्य पदको यथार्थ प्राप्त करूँ तो उसे मनुष्यके लक्षणों
को धारण करना चाहिये । मनुष्य लक्षणको धारण करकेही, परमात्माका
कृपापात्र बननेसे सर्वोत्कृष्ट मनुष्यपद पा सकता है । उदारता १, वीरता २, न्याय
३, शील ४ और गुरुकी आज्ञाकारिता येही लक्षण अपने यथार्थस्वरूपको प्राप्त
करनेके हैं । जिसने इन चार लक्षणोंको प्राप्त कर लिया उसे नाना शास्त्र पढ़नेकी

तत्पदसे दो प्रकारके ज्ञानका कथन

आवश्यकता नहीं है। शास्त्र पढ़ा हो अथवा नहीं पर उपरोक्त चारों गुणोंके आशय किो भली प्रकार समझता एवं उसीके अनुसार चलता हो तो वही सब विद्वानोंमें वद्वान् और संतोंमें संत शिरोमणि है।

जिसने अपने इन्द्रियोंको दमन कर लिया है, आसुरी सम्पत्ति क्रोध आदि को अन्तःकरणसे निकाल दिया है, दैवी सम्पत्ति शील, संतोष, धैर्य आदिको सम्यक् प्रकार धारण कर लिया है, वेही विद्वान् हैं, वेही सन्त हैं, चाहें शास्त्र पढ़े हों अथवा नहीं पढ़े हों। जिनको दैवी सम्पत्ति सम्यक् प्रकार प्राप्त है, उनको शास्त्रावलोकन के लिये समयविशेष नहीं लगाना पड़ता। हाँ ! जब आवश्यकता हो तो शास्त्र देख लेना अवश्य चाहिये पर उसीमें पचा रहकर अपने भजनको छोड़ बैठना उचित नहीं।

सारी विद्या, कला, कौशल आदिके प्रगट कर्ता शिवजी हैं। शास्त्रोंमें लिखा है कि, जब शिवजीने अपना डमरू बजाया तो उसके शब्दसे नौ स्वर ९ (अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ प्रकट हुये। प्रथम येही नौ प्रगट हुये पीछे इन्हींसे सोलह स्वर बने, जिनमें से १२ बारहका विशेष प्रयोग हुआ उसीसे वर्णमालाके सब अक्षर प्रगट हुये, जिससे अनन्त शब्द प्रवृत्त हुये। इनके बिना सब अक्षर तुच्छ हैं सबके प्रकाशक येही हैं।

वाणी वेदसे लेकर, दूसरी जो कुछ संसारमें है, चाहे गुप्त हो अथवा प्रगट, सब शिवजीसे प्रगट हुये हैं। इस कारण शब्द, पुस्तक पोथी कोही सर्वस्व समझने उन्हींके ऊपर भरोसा करनेवाले शिवजीके शिष्य हैं। शिव तमोगुणी देवता है, इसी कारण शब्दोंकेही भरोसे अपना कल्याण चाहनेवाले भी वैसेही हैं क्योंकि यह नियम है कि, जैसा गुरु होता है वैंसा चेला भी होता है।

साखी — जल प्रमाणे माछली, कुल प्रमाने बुद्धि।

जाको जैसा गुरु मिला, ताको तैंसी शुद्धि ॥ १ ॥

ऐसे शब्दोंके आधारवालों वा पुस्तकोंके आश्रय करनेवालोंमेंसे विरलाही कोई इन्द्रिय दमन करनेवाला होता है। नहीं तो विषय वासनामें ही निमग्न रहते हैं, चाहे वह किसी रूपांतरमें क्यों न हों। ऐसे लोग सच्चे सन्तों, तथा इन्द्रियजित निष्कामी पुरुषोंकी निन्दा करते हुए ठट्ठा उड़ाते हैं। यही कारण है कि, सच्चे वैराग्यवान् संत और विषयी मायामें बद्ध हैं, देहाभिमानियों विद्याभिमानियोंका कभी मेल नहीं मिला। समस्त संसार त्रिगुणात्मक है। १ सत्तोगुण २ रजोगुण ३ तमोगुण; येही तीन गुण हैं इन्हींके आधारपर सृष्टि खड़ी है।

सत्तोगुणी स्वर्गी रजोगुणी मध्यम लोकवासी अर्थात् मृत्युलोकवासी

असिपदसे दो प्रकारके विज्ञानका कथन

हैं और तमोगुणी नरकमें रहते हैं । संत सतोगुणी, सांसारिक मनुष्य रजोगुणी और विद्याभिमानी, देहाभिमानी पक्षपाती सभी तमोगुणी हैं ।

यद्यपि विद्याभिमानी तथा देहाभिमानियोंमेंसे भी कितनेक शुभ कर्ममें प्रवृत्त होते हैं पर केवल राजभय अथवा लोकभयसे । जो सतोगुणी विद्वान् हैं, वे लोक परलोकके भय अथवा शारीरिक अपमानके कारण नहीं बरन् अपने अंतरीय प्रकाश और ज्ञानसे करते हैं । वे संसारको तुच्छ जानते हैं तो भी विद्वान् और सच्चे विचारवानोंके सामने उनका कार्य माननीय और प्रशंसनीय होता है ।

भारतीय मत ।

सबसे प्रथम धर्म (मजहबों) के स्थापित करनेवाले भारतवर्षकेही ऋषि मुनि और महात्मा हुये हैं । भजन, भक्ति, ज्ञान, तथा पारलौकिक मार्गके पथ-दर्शकोंमें सबसे बढ़कर श्रेष्ठ उच्चपद भारतवासियोंका ही है । इस कारण प्रथम हिन्दू धर्मके ऊपरही कुछ लिखता हूँ ।

सहस्रों, ऋषि, मुनि, सिद्ध, साधुओंने भारतवर्षमें नाना प्रकारके मत मतांतर प्रचलित किये । षट् दर्शन छ्चानवे पाखण्ड हुए । इसी देशसे नाना सिद्धांतों को लिये हुये सहस्रों धर्म (मजहब) दूसरे देशोंमें फैले, इन्हीं (भारतवासियों) केही धम्मों और रीतिओंकी अन्य देशके पैगम्बरों और आचार्योंने नक़ल करके अपना २ धर्म स्थापित किया ।

सृष्टिकी आदिमें मनुष्य शुद्ध, छल कपटसे रहित देवतोंके समान होते हैं पाप पुण्य उनकी दृष्टिमें कुछ होताही नहीं स्वभावमेंही स्थित होते हैं । क्रमशः राग द्वेष बढ़कर लोगोंका अंतःकरण अशुद्ध होने लगता है इसीलिये मजहबकों आवश्यकता होती है; भजन, भक्ति, तप आदिकी रीति स्थापित होती है । इसी ढंग पर संसार चलता रहता है । ब्रह्माण्डमें एकही वेद अनेक रूप होकर संसारमें फैलता है । संसारके मनुष्य वेदकी ही आज्ञापर चलते हैं । अपने २ विचार और धर्मके अनुसार वेदके प्रमाण लेकर उसको पुष्ट करते हैं ।

कबीर साहिबका सत्यशब्द टकसारका शब्द ।

संतो दुविधा कहांते आई ॥

नाना भांति विचार करत है कौने मति बौराई ॥

तुरिया रूप ॥

ऋगु कहे निराकार निरलिप्ती अगम अगोचर साई ॥

आवे न जाय मरे नहिं जीवे रूप बरण कछु नाहीं ॥

पारख पद, जन्ममरणकी सात शाखाएँ कर्मकी सात शाखाएँ

सुषुप्ति रूप ॥

अथर्वण कहे प्रपंचे दीसे सत्य पदारथ नाहीं ॥
जो उठिजाये बहुरि नहि आवे मरि मरि कहां समाहीं ॥

स्वप्न रूप ॥

यजुर कहे सगुण परमेश्वर दश अवतार धराया ॥
गोपिनके संग रहस रम्यो है बहु प्रकारसे गाया ॥

जाग्रत् रूप ॥

साम कहे यह ब्रह्म अखंडित दुतिया और न कोई ॥
आपे आप रमे परमेश्वर सत्य पदारथ सोई ॥

सत्यवेदके मसला ॥

यह प्रमाण सबन मिलि कीन्हा ज्यों अँधरेको हाथी ॥
आदि बापका भर्म न जाने पूत होत नहि साखी ॥
अँधरेकी हाथी सांच है, सांचे है सगरे ॥
हाथनकी टोई कहें आँखिनके अँधरे ॥
अँधरनको हाथी भयो, कियो सबनही ध्यान ।
अपनी अपनी सब कहें, को काको कहे अज्ञान ॥
अँधरनको हाथी भ्यों, सांचो करके मान ।
हाथनकी टोई कहें, शब्दन ते पहिचान ॥
आँखन केरी आँधरे, बूझे विरला कोय ।
कहै कबीर सतगुरुकी सैना, आप मरे तब ओय ॥

झूलनासे निर्णय ॥

मिमांसा कहे सब कर्मही है, वैशेषिक समयको ध्यावता है ॥
न्यायवादी कर्तार ठाने, पातञ्जलि योग बतावता है ॥
सांख्यवादी नित्यानित्य कहे, वेदांती ब्रह्म अनुमानता है ॥
ये द्वन्द्व चहुँ दिशि मची, सो द्वन्द्वहीको सब गावता है ॥ १७ ॥
साखी - भर्मजाल जो जगतके, ताके अंग अनेक ॥

यक यक अंग दृढ इष्टकरि, गावहि निज निज टेक ॥ १८ ॥

वेद किताबकी जहांतक पहुँच है वहांही तक कहते हैं, उनका क्या अपराध । अपराध उसका है जो उनका विचार नहीं करता ।

यथा-वेद स्मृति कहै किन झूठा, झूठा जो न विचारे ॥

वेदका आशय और होता है, शब्दसे औरही अभिप्राय टपकता है पर पक्ष-

उपासनाकी सात शाखाएँ, योगकी सात शाखाएँ, ज्ञानकी सात शाखाएँ, उत्प- त्तिकी सात शाखाएँ

पाती लोग अपना अभीष्ट सिद्ध करनेके लिये नाना प्रकारकी युक्ति और प्रमाणों के आग्रहसे अपनी सत्यता प्रगट करते हैं ।

यह साधारण नियम है कि, जो जिसका पक्षपाती होता है वह अपनी आशक्तिके कारण उसके अवगुणोंको भी गुण करकेही जानता है । जैसे अपना मुंह आपसे नहीं देखा जाता वरन् दृश्यसेही देखा जाता है । अथवा जैसे कोई ऊँचे स्थानपर चढ़े बिना नीचेके सब पदार्थोंको भली प्रकार नहीं देख सकता । उसी प्रकार जबतक निरपेक्ष होकर किसी मतको नहीं देखेगा, तबतक उसके गुण अवगुणोंको नहीं जान सकेगा ।

योगियोंका मत ।

वेदहीसे योग समाधि तथा षट् दर्शन निकले माने जाते हैं । योगियोंको योग पमाधिका बड़ा अभिमान है । योगसे वे अपनेको अमर समझते हैं ।

भोगी योगीकी समता ।

भ्रममें पड़कर वे अपनेको कृतार्थ समझते हैं पर यह नहीं समझते कि, जैसा भोग बैसाही योग भी है । दोनों निर्मूल और तुच्छ हैं । योगी नादकेद्वारा ऊपरको चढ़ता है, भोगी बिन्दुके द्वारा नीचे आता है । अतः—

आधारचक्रो भेद—योगी अपान वायुके द्वारा गणेश क्रिया करता है । आधार चक्रको साधता है अर्थात्—गुदा द्वारसे जल खींचकर ऊपर चढ़ाता है फिर गिरा देता है, फिर चढ़ाता और गिराता है । ऐसेही बारंबार करनेसे आधार चक्र टूट जाता है और उससे योगी ऊपरको चलता है तब आधार चक्र सिद्ध कहलाता है ।
छः चक्रोंमें यह प्रथम चक्र है ।

स्वाधिष्ठान चक्र भेद—आधार चक्रके ऊपर स्वाधिष्ठान चक्र है । जब आधार चक्र सिद्ध होजाता है तब स्वाधिष्ठान चक्र भेदनेकी चिंता बढ़ती है इसके लिये युक्ति करता है । बारह अंगुलकी सलाका बनाकर लिङ्ग द्वारमें उसे बार बार चलाता है, जिससे उपस्थेन्द्रियका छिद्र शुद्ध और साफ हो जाता है । फिर उपस्थ इन्द्रियसे जल खींचकर चढ़ाता है । जल अच्छी तरह चढ़ाने और उतारनेका अभ्यास पड़ जाता है । तब क्रमशः दूध और मधुको चढ़ाता है । जब मधुके चढ़ाने उतारनेका अभ्यास पूरा हो जाता है तो स्वाधिष्ठान चक्र सिद्ध होता है । फिर योगी आगेको बढ़ता है ।

यह क्रिया, प्रायः वाममागी और अघोरी तथा गुसाई ब्रह्मचारी नामके भेषधारी अन्य विषयी लोग साधते हैं ।

मणिपूरक चक्र भेद—फिर योग अपान और समान वायुका सम्मिलन

स्थितिकी सात शाखाएँ

करके धातु क्रिया करनेका समय आता है। नौ गज लम्बा (कहीं कहीं पन्द्रह हाथ लिखा है) चार अंगुल चौड़ा बारीक और नम्र वस्त्र लेता है। उसको मुखके राहसे निगलकर बाहर निकालता है। पानी पीकर भीतर आंतोंको साफ करता है। फिर कपड़ेमें लगे हुये कफ आदिको साफ करके फिर निगलता है। ऐसेही वारम्बार करनेसे अभ्यास पड़ जाता है, तो गज २ भर चौड़ा और नौगज लम्बा भी निगलता और निकाल देता है। इस प्रकार जब यह क्रिया पूरी होती है तो योगी नाभीसे वायुको उठाकर मणिपूरक चक्रमें भरता है।

अनाहत चक्र — तब योगी अपान और प्राणको एक करता है। सवा हाथ की एक दातून बनाकर कण्ठके मार्गसे पेटमें चलाता है। पेटभर पानी पीकर बाहर निकालता है, जिससे अन्दर पेट, कलेजे और फेफड़ोंके, कफ आदि निकल जाते हैं इस क्रियाको कुंजर क्रिया कहते हैं। इस क्रियासे बड़ी आनन्दता और प्रकाश मिलता है। इसी क्रियासे योगी अनाहत शब्द सुनने लग जाता है। यद्यपि अनाहत शब्दमें बहुत प्रकारके शब्द सुनाई देते हैं पर सभोंमें दशप्रकारके शब्द प्रधान हैं।

१ घण्टका शब्द; २ शंखका शब्द; ३ छोटी २ घण्टियोंका शब्द; ४ भंवरेकी गुंजारका शब्द; ५ पहाड़से पानी नीचे गिरनेके समय जैसा शब्द होता है वैसा शब्द; ६ बांसुरीका शब्द; ७ शहनाईका शब्द; ८ छोटे २ पक्षियोंका शब्द; ९ वेणुका शब्द; १० चंग (सीटीका) शब्द; यही दश प्रकारके प्रधान अनाहत शब्द हैं। इनके अतिरिक्त नाना प्रकारके बाजे आदिके शब्द भी सुनाई देते हैं, जिससे मनको बड़ा आनन्द होता है। फिर इसको भी वेधके आगेको बढ़ता है।

विशुद्ध चक्र भेद — प्राण, अपान और समान तीनों वायुको कण्ठस्थानमें योगी एकत्रित (समान) करता है। इस साधनको लम्बिका योग कहते हैं। इसके साधनेके समय केवल दूधही पीकर रहना होता है, नाज नहीं खाना पड़ता। मक्खन और सँधे नमकसे जिह्वा को नित्य रगड़के पतला करना और जिह्वाकी जड़की रगोंको शनैः शनैः काटके (जिह्वाको) इतना बढ़ाना पड़ता है कि, दशवें द्वार तक पहुँच सके। जिह्वाको उलट कर ब्रह्मरंध्रके मार्गको रोककर ऊपरसे टपकते हुये अमृतको पीता है। इसके पीनेमें शरीरकी कांति तेजोमय हो जाती है। इस प्रकार अमृत पीनेका आनन्द प्राप्त हो जाता है तो योगीको लम्बिकायोग का साधन पूरा हो जाता है।

अग्नि चक्र—इस विशुद्ध चक्रके आगे अग्नि चक्र है । इसे सिद्ध करनेके लिये योगीको नेति क्रिया करनेकी आवश्यकता होती है । सूतकी एक वितेभरकी बत्ती बनाकर नाकमें चला, ब्रह्माण्डको भली प्रकार साफ करके अपने कण्ठकी वायुको अग्नि चक्रमें स्थापित करना होता है । योगी अग्निचक्रमें वायुकोस्थापित करके बड़ा आनन्द प्राप्त करता है । वायुको ऊपर चढ़ा कर जिह्वासे मार्गको रोकके कुम्भक कर समाधिको प्राप्त करता है, शरीर शक्तिहीन मृतक समान हो जाता है । दशवें द्वारमें पहुँचकर योगी निर्विकल्प समाधिको प्राप्त हो जाता है । इस स्थानपर पहुँचकर योगी अष्टसिद्धि और नव निधिको प्राप्त करता है ।

अष्टसिद्धि ।

१ अणिमा; २-महिमा; ३-गरिमा; ५-लघिमा; ५ - प्राप्ति; ६-प्रकाशिका । (काम); ७-ईशता; ८-वशीकरण ।

१ अणिमा - उसको कहते हैं कि, योगी जिस सिद्धिसे अपने शरीरको जितना छोटा चाहे बना लेता है । २ महिमाके द्वारा योगी अपनी देहको जितना चाहे बड़ा कर सकता हैं । ३ गरिमाके द्वारा जितना चाहे भारी हो जाता है । ४ लघिमाके बलसे अपने शरीरको हलकेसे हलका बना सकता है । ५ प्राप्तिसे ही योगी जहाँ चाहता है चला जाता है । ६ प्रकाशितासे मनवाञ्छित प्राप्त हो जाता है । ७ ईशतासे अपनेको सबसे श्रेष्ठ प्रमाणित करा सकता है । ८ वशीकरणके द्वारा विश्वको अपने वशमें कर सकता है ।

नवनिधि ।

१-महापद्म; २-पद्म; ३-कच्छप; ४-मकर; ५-मुकुन्द; ६-खर्व; ७-शंख; ८-नील; ९-कुन्द ॥ इन ९ के भिन्न २ गुण हैं । प्रत्येक निधि पर देवताओंकी चौकी रहती है जब इन ९ निधियोंके अभिमानी देवते वशमें हो जाते हैं तो योगी इनको प्राप्त कर लेता है वह अपनी शक्तिसे जिसको चाहे राजा बना सकता है अथवा दरिद्र करदे उसमें सब ऐश्वर्य आजाते हैं । इसी स्थानको सहस्रदल कमल कहते हैं । यहाँ ही निरञ्जनका वास है । इस स्थानपर पहुँच कर योगी, निरञ्जनसे एकता कर परमानन्दका अनुभव करता है । इसी अवस्थामें आपको अजर, अमर, सर्व शक्तिमान् समझता है । इसकी सब सिद्धियाँ दासी हो जाती हैं ।

१ नेती धोता वस्ती आदि क्रियाएं शरीरकी शुद्धि के लिये हैं, चक्र भेद तो प्राण वायुसे होता है, पाठक स्वामीजीके चक्र भेदनको इससे सुधार कर पढ़लें ।

श्लोक— महापद्मश्च, पद्मश्च, शंखो, मकर, कच्छपो ।

मुकुन्द, कुन्द, नीलाश्च. खर्वश्च, निधयो नव ॥

अपनी विद्याके बलसे त्रिकालज्ञ हो जाता है। ईश्वरके समान ऐश्वर्यको प्राप्त हो जीवसे ईश्वर हो जाता है, संसारमें ईश्वरके समान पूज्य हो जाता है। पर जब तक ब्रह्माण्ड स्थित है; तबही तक योगी भी स्थित है। जब तक योगीका ज्ञान है तबही तक उसको सब कुछ प्राप्त है। उपरोक्त सब साधना गुरुके द्वारा प्राप्त होती हैं। गुरुकोही शरण प्राप्त कर सफल काम होता है।

उपरोक्त योग क्रिया बाजीगरका कौतुक है। योगियोंको अपनी योग क्रियाका बड़ा अभिमान होता है। सब भूलमें पड़कर बन्धनमें पड़े। जिस वायुके द्वारा योगी अपना सब कुछ प्राप्त करते हैं वह स्वयं नाशमान है, गोरखनाथने योगको भली प्रकार जाँच बूझकर देख लिया तब कबीर साहब की शरण गही। योग भोग दोनोंही भ्रम और अनित्य हैं। योग भोग दोनोंकी क्रिया समानही हैं जिस प्रकार योगी छः चक्र वेधता है उसी प्रकार भोगी भी छः चक्र तोड़कर ही आनन्दको प्राप्त करता है, केवल उतनाही भेद है कि, योगी नीचेसे ऊपरको चढ़ता है। भोगी ऊपरसे नीचेको आता है। पर दोनोंही परमानन्दको प्राप्त करते हैं।

भोगियोंका चक्र भेद।

भोगका वर्णन लिखता हूँ, जिसके विचारनेसे जान पड़ेगा कि, योगी और भोगीमें कुछ भेद नहीं है जिस प्रकार योगी षट् चक्रको वेध कर योग सिद्ध हो अमर मानता है उसी प्रकार भोगी भी षट् चक्र वेधकर योग सिद्ध और अमर होता है। भोगी स्त्री पुरुष मिलकर सिद्धि प्राप्त करता है यानी भोग करनेके समय—जब मत्थासे मत्था मिलता है तो पहिला चक्र टूटता है।

जब आंखसे आंख मिलतेही द्वितीय चक्र विद्ध होता है। मुहसे मुह मिलते ही तृतीय चक्र टूटता है छातीसे छाती मिलाते ही चतुर्थ चक्र टूटता है। नाभीसे नाभी मिलते ही पञ्चम चक्र विद्ध होता है भग और लिंगका संयोग होनेसे छठा चक्र वेधा जाता है।

जब भोगी उपरोक्त रीतिसे छः चक्रोंको भेद चुकता है तब वायु और अग्निके बलसे नीचेको वीर्य उत्तरता है। वह छः चक्रोंको वेधता हुआ सातवें स्थान गर्भाशयमें जा स्थित होता है। भोगी आपको अमर जानता है क्योंकि, जबतक भोगीकी संतान पृथ्वीपर वर्त्तमान है तबतक वह अमरही है।

समन्वय—जैसे योगीको ज्ञान और सिद्धि उत्पन्न होती हैं, वैसेही भोगीको संन्तान मिलती है। जो माता पिता थे वेही पुत्री और पुत्रके रूपमें वर्त्तमान रहते हैं। दोनों (योगी और भोगी) सातवें चक्रमें आपको अमर अनुमान करते हैं। (योग भोग दोनोंही मिथ्या भ्रम हैं)।

नाशकी सात शाखाएँ, जीवका अम्र. जगतको असत् प्रतिपादन

न्याय, सांख्य, सीमांसा, वैशेषिक, योग और वेदान्त आदिके अभिमानो भ्रमके धोखेमें सारे गये किसीको भी स्थिति न मिली । इनमें पड़े हुये सब अंधोंके समान टटोलते फिरते हैं । कहीं कुछ स्थिति नहीं पाते वेदान्ती एक ब्रह्म अद्वैतका अभिमान करते हैं वो तो कहने सुननेमें नहीं आता सब वाणी बचन द्वैतमेंही होते हैं । संन्यासी दशनामी वेदान्ती होनेका अभिमान करते हैं । संन्यासी और योगी, दोनों शिवलिङ्ग पूजते हैं । शिवलिङ्ग और जीवलिङ्ग समानही है, इन दोनोंमें कोई विशेषता नहीं । शिवलिङ्ग और जीवलिङ्ग दोनों बन्धनके कारण हैं । इस कारण इसके पूजनेवाले भ्रम और धोखेमें पड़े हैं, कोई अपनी भूलपर ध्यान नहीं देता दो अन्धोंके समान परस्पर विरोध करते हैं । एक दूसरे अपने अपनेको एक दूसरेसे श्रेष्ठ समझते हैं । सबके सब अपने भ्रामिक विचारमें मग्न हो जीवन नष्ट कर रहे हैं ।

कबीर पन्थका जैनमत निरूपण ।

पाठकगण ! जैनधर्मवाले लोग अब वेदको नहीं मानते । जैनी पंच परमेष्ठीकी पूजा करते हैं । त्रयशठ शलाका और अनेक देवी देवताओंकी भी पूजा करते और मानते हैं ईश्वरको जगतका कर्ता नहीं मानते वरन् कर्मकोही सृष्टिका कर्ता मानते हैं । जीवोंपर दया करना परम धर्म मानते हैं ।

जैनियोंके कई फिरके दान पुण्य विशेष नहीं करते । हिन्दू लोग ऐसे फिरकोंको नास्तिक कहते हैं, इनके पांचों परमेष्ठियोंको बन्धनमें बतलाते हैं । जैनी नानाप्रकारकी पूजा पाठमें प्रवृत्ति करके यथार्थसे वंचित रहे सत्यमार्गको छोड़कर नानाप्रकारके पाखण्डकोही अपना धर्म समझ बैठे ।

कबीर परिचयका शब्द ।

सन्तो जैनीको भ्रम भारी ।

जैन नाम जाको जय नाहीं, क्षयकी राह पसारी ॥

जीव द्रव्य पुदगल कहि बरणै, धर्म अधर्म सो चारी ।

पँचये काल द्रव्य कह छठयें, पात्र अकाश बिचारी ॥

आपन आपन गुण कर्मणिको, यह षट् करता मानै ।

कियो न कहै अनादि निधान है, जिन्ह कियो ताहि न जानै ॥

जो पुदगलके त्याग निमित्त, साधन अमित कमावै ।

सो पुदगल पाहन मूर्ति कारे, गुरु कहि शीश नवावै ॥

वीतराग सर्व पुदगल ते, लिखि सो बानी बाँचै ॥

पुदगल शिखर इष्ट कहि आगे, नारी पुरुष मिली नाचै ॥

प्रथम दृष्टान्त

जेहि चौबीसको मुक्त बतावै, जगते कहैं निरासा ।
तेहि रथ चढ़ाई राग करि फेरै, ज्यों नट करत तमाशा ॥
क्षुधा पिपासा आदि अष्टदश, दोष कहैं यह त्यागे ।
जा कारण सों सने दोषमें, ताहिमें निशि दिन पागे ॥
दर्शन ज्ञान वीर्य सुख चारी, जीव गुण कहैं विचारी ।
जीव पुदगल संबंध नहीं तव, कहु काको गुण चारी ॥
सती देह दुःख पलमें त्यागे, भूत लगा तेहि वृक्षे ।
जो साधन दुःख करि तन त्यागे, सो भुतवा नहि सूक्ष्ने ॥
रिषभ आदि चौबिस तीर्थकर, तिन्हें कहै मोक्षगामी ।
यह छौ कृतम क्षय कीयो सबके, अरुक्षे सेवक स्वामी ॥
जग उत्पत्ति कियो न काहू, पढ़ि गुणि कहे अनादी ।
कर्म करे कर्ता नहि मानै, भया अनीश्वर वादी ॥
आठ कर्ममें चारि बंध कहै, चारि कहे मोक्ष दीठा ।
जो जग कर्म किये ते नाहि, तो कृत करै करावे झूठा ॥
ये षट द्रव्य काहिको भासै, केंहि उपदेशि फसावै ।
सो कर्ता कृत्रिम चिन्हें बिनु, फिरि फिरि योनिहि आवै ॥
मोक्षको धावत बंधन पावत, ठग सुखलेत चोराई ।
गले फांस डारि डोरिआवै, मोक्षमें चोर लुकाई ॥
जो ठग पूर्वाचार्यहिंको दुःख, दियो न चीन्हें बैना ।
कहै कबीर सो ठग चीन्है बिनु, दुःखी भये सब जेना ॥ १ ॥

साखी - षट द्रव्य जैनी मता, ताको यह निरधार ।
जीव पुदगल अधरम धर्म, काल अकाश विचार ॥ २ ॥
षट द्रव्य यह मानिके, जैनिहि चित्त हुलास ।
कहहि कबीर उपदेश केंहि, पूरव केंहि भई भास ॥ ३ ॥
जैनी साधन बहु किया, मुक्ति न आई हाथ ।
जेहि दुःख चाहे मुक्तिको, सो दुख उनके माथ ॥ ४ ॥
जैनी साधन मोक्ष हित, करै कष्ट बहु भांति ।
जेहि सुख नित साधन करे, होइ सो आत्म घात ॥ ५ ॥
जैनी जैन ३ कमाइया, करता ईस विसारि ।
चाहत है जय कृतमकी, करि करि कर्म फुसारि ॥ ६ ॥
कबीर जैनी लोभिया, ठगके हाथ बिकाय ।
मुक्ति आकासके उपरे, सुनि सुनिके ललचाय ॥ ७ ॥

कबीर तीर्थकर जैनके, चौबीसो भये मोख ।
मुक्ति कहै पुदगल छुटे, ग्रंथ कियो किमि चोख ॥ ८ ॥
मुक्ति भई तेहि जैनकी, चौबीस आदिक और ।
पुदगल उनकी छुट गई, बचन कहा केहि ठौर ॥ ९ ॥
रिषभ आदि जेहि बन रहै, तेहि बन लागी आगि ।
घेरेमें जब जरि मुये, दोष अठारह त्यागि ॥ १० ॥
जीभि कमान वचन शर, पनच श्रवण लगि तान ।
रिषभदेवसे धनुषधर, मान्यो यह षट बान ॥ ११ ॥
याहे छौ बानके लागते, जैनी भया अचेत ।
लागी मूच्छर्छा कर्मकी, दुःख भोगे सुख हेत ॥ १२ ॥
काली कुत्ती रिषभकी, साधन जुत्ती खाय ।
दोष अठारह चोरपर, षट मुख भूकै धाय ॥ १३ ॥
काली बिल्ली रिषभकी, खट पकवान बनाइ ।
आय यति होई जैन घर, भोजन कछुवो न खाइ ॥ १४ ॥
कबीर जैनीके हिये, बिल्लीकी इतवार ।
साधन व्यंजन मोक्षहित, सौपेउ तेहि भण्डार ॥ १५ ॥
काली कुत्ती रिषभकी, अनादि दन्त षट चोख ।
साधन बर्नहि खदेडिकै, मारै सावज मोख ॥ १६ ॥
कबीर वाणी रिषभकी, राणी भइ सरदार ।
जैनिके शिर मारिया, साधन दुःख पैजार ॥ १७ ॥
कबीर चोरवा जैन घर, मान्यो साधन सेंधि ।
सुख धन मूस्यो तिनहिको, रहा सकल दुःख बेधि ॥ १८ ॥
रिषभ आदि जेते जिन, अव्याकृत गुण मूल ।
जिन षट द्रव्य बुझाइया, है सोइ कारण मूल ॥ १९ ॥
कबीर जो पै मुक्ति होई, छुधा पिपासा छोड़ि ।
तौ काहैं अहार देइ, जैनिक मइया भोड़ि ॥ २० ॥
कबीर जैनिक माइया, जैने धर्म कमाय ।
साधन गुण जानत रही, तो काहे दूध पिलाय ॥ २१ ॥
वेश्या औ जैन यति, दो पथ एके आहि ।
मोल खरीद वेश्या सती, यति सों मोल विसाहि ॥ २२ ॥
मोल खरीद मुड़िया करे, मुये मुक्ति मोकाम ।

द्वितीय दृष्टान्त बाजीगरकी समाधि राजाके परिवारका बालक, समन्वय पथिकका दृष्टान्त

कहें कबीर यहि जगतमें, जैनिक यति गुलाम ॥ २३ ॥
कबीर तिर्थकर जैनके, कियो अमोक्षी बाच ।
मुक्ति कहें पुदगल छुटै, ग्रंथ भये सब काँच ॥ २४ ॥
मोक्ष मुख चूंमन लगे, छौ घुनि घुनि बजाय ।
मारि तमाचा साधना, पटके जब खिसियाय ॥ २५ ॥
साधन सब लावा लखै, सिद्धि लखै सो बाज ।
शब्द विवेकी पारखी, सिद्धन्हके सिरताज ॥ २६ ॥

तात्पर्य—ऋषभनाथजीसे लेकर महावीर स्वामीतक चौबीस तीर्थकर हुये, उनका वृत्तान्त जानने पढ़नेसे विशेष जाना जावेगा । जैसे वेदधर्मके सिद्ध साधुओंका वर्णन है, वैसेही जैनधर्मके सिद्ध साधुका भी हाल है । सब जैनी अरहंतका नाम जपते और उसीसे मुक्ति चाहते हैं ।

बौद्ध—जैसे जैन धर्मी वैसेही बुद्ध धर्मके लोग भी वेद धर्मको नहीं मानते । वेद धर्म छोड़ ये लोग अलग तो हुये पर नानाप्रकारकी प्रतिमाओंकी पूजा अर्चा तो वैदिकोंकीसी करते ही रहे । विष्णुने इनको वेद धर्मसे तो छुड़ाया पर व्यर्थकी रीति व्यवहार तथा पाखण्डमें कंद कर दिया । यदि जैनियोंको यथार्थ प्रकाश मिलता तो सत्यको जानकर भी पाखण्डमें नहीं फँसते ।

गजल — टुक देखिये क्या खूब है जैनीका तमाशा ।

गाहे दिल मरगूब है जैनीका तमाशा ॥

बुत पेश जहाँ मर्द न जनों रक्स कुना हैं । कोई खासको मतलूब है जैनीका तमाशा ॥
जिसको वह खुदा कहते सो बाजार फिरावें । यह देखिये मायूब है जैनीका तमाशा ॥
कसरतसे मरौवज था यह अय्याम सलफ्रमें । इस असिरमें महजुब है जैनीका तमाशा ॥
जादू सेहर जन्तर मन्तरसे लगे हैं । मरहटसे मनसूब है जैनीका तमाशा ॥
अकसर मुतनाफिर है व लेकिन कोई कोई । अशखासको महबूब है जैनीका तमाशा ॥
सब दूत व भरम भूत जैनीको आजिज । यह नाकिस मकलूब है जैनीका तमाशा ॥ १ ॥

मूसा धर्म ।

हज़रत मूसाके द्वारा, इब्रानियोंको खुदाने शरीअत (शास्त्र— प्रदान किया । उनकी किताबमें दश आज्ञाही सर्वोत्कृष्ट हैं । जिसका वर्णन पहले लिख चुका हूँ । प्राचीन कालमें चाहे जैसा रहा हो पर वर्तमान कालमें तो मूसाके लोग बलिप्रदान आदिक कुछ रीतियोंकोही धर्म समझते हैं । अपने मन्दिरोंमें जाकर निमाज और बज़ीफा पढ़ा करते हैं इसीसे अपनी मुपित मानते हैं । सच्चे मोक्षदाताको ये क्या पहचानेंगे, जिस खुदाने मूसाकी अहकाम शरपी बतलाई,

कोलम्बसका अमेरिका प्रगट करनेका वृत्तान्त

उसको भी नहीं जान सकते । उनके अन्तःकरण रूपी आँखोंमें अज्ञानताका पर्दा-
पड़ गया जिससे सत्यका विवेक नहीं कर सके । भ्रम और अज्ञान तो तब जाता है
जब ज्ञानका सच्चा प्रकाश हो । विवेकही नहीं तो सच्चा झूठा कौन जाने ?
सब मनुष्य इसी प्रकार पक्षपात और अज्ञानरूपी अन्धकारमें पड़कर ठोकरे
खाते हैं ।

नजम — भेड़िया भेड़का किया रखवाल । कौन दम मारे तेरी ऐसी चाल ॥
तेरी हिकमत्का तुही दाना है । आदम अन्धेरमें भूलाना है ॥
जिस तफक्कुरमें अल्ल हैरान है । बहर कुदरतमें तेरी तैरान है ॥
डूबती और उछलती है सद बार । गोता खाय है न पाये करार ॥
मौत मैदान मौत गोशह है । है सफर और कमर न तोशह है ॥
जङ्गल और दङ्गल दरिन्दः है । कौन जा पार ? जो परिन्द है ॥
दस्त गीरी करे तू रहमतसे । खुद बचावे ज़माने जहमतसे ॥
है करम फ़ज़ल तेरा बे पायान हमद बेहद है तेरेही शायान ॥

ईसाई धर्म ।

हज़रत ईसा तो मूसाई धर्मवालोंमेंही उत्पन्न हुये थे पर पुरानी शरीअतसे
अपना नयाही ढङ्ग निकाला । पुराने अहदनामेसे इनके अहदनामेमें भेद है ।
इस धर्मके लोगोंमें मांस आहारकी विशेषता होनेके कारण परमात्माकी भजन
भक्तिकी और विशेष प्रवृत्ति नहीं होती । सांसारिक व्यवहारमें ही विशेष निमग्न
रहते हैं । अन्य धर्मवालोंको बहुत उपदेश करते फिरते हैं पर अपने औगुणोंकी
और बहुत कम दृष्टि देते हैं ।

क्रिता—जरा अपने ऐबोंके ऊपर गौर कर । बअकल और दानिश नज़र कीजिये ॥
तू ग़ैरोंकी बदबीनीसे दर गुज़र । नफ़ा हो न उसमें नज़र कीजिये ॥

साखी — औरनको समझावते, मुखमें पड़ गइ रेत ।

राशि बिरानी राखते, खायो वरका खेत ॥

गज़ल — खुद पन्थ चला खैर खरीदार मसीहा ।

है यक बड़ा विष्णुका औतार मसीहा ॥

मैं लाविदमें वालिद मुझ सूरतमें देख ।

यों सबसे कहा बरसरे बाज़ार मसीहा ॥

खतरमें दिया डाल सो खुद आपको वे खौ ।

सर्दारी की खातिरसे चढ़े दार मसीहा ॥

मुसलिब जो होवे सो चले संग हमारे

यों साफ किया सबसेही इजहार मसीहा ॥

नारदजीकी कथा

हैं एकही दोनों न कं उनमें आजिज । कोई विष्णुको पूजे कोई दिलदार मसीहा ॥

यह धर्म सारी पृथ्वीपर प्रचलित है । पादरी लोग सब देशों, शहरों, गावोंमें फिर २ कर उपदेश दिया करते हैं । इसमें किसी प्रकारका कोई ऐसा धार्मिक नियम नहीं है जिसके कि, करनेमें इस धर्मवालोंको कुछ कठिनता जान पड़े । रोज़ा नमाज़, पूजा, पाठ, कोई भी ऐसा नियम नहीं, जो अवश्य करना पड़ता हो । हाँ ! पादरियोंको तो कुछ नियम मानने पड़ते हैं, क्योंकि, उनको वही काम है । पादरियोंके भी भजनका कोई विशेष नियम नहीं, वरन् रविवारको गिर्जाघरमें जाकर उपस्थित होना और आये हुये लोगोंको बाइबल आदि किसी-धार्मिक पुस्तकका कुछ भाग पढ़कर सुनानाही उनका नियम है ।

पहले इस धर्मके फकीर (पादरी) लोग भजन और संयम किया करते थे, गुफाओंमें बैठकर ईश्वरके नामका अभ्यास किया करते थे, जिससे उनका अन्तःकरण शुद्ध और प्रकाशमय होता था । अब पादरियोंमें यह बात कहीं नहीं पाई जाती । ईश्वरके नाम स्मरण, बिना अन्तःकरणकी शुद्धि और ज्ञानका प्रकाश प्राप्त होना कठिनही नहीं वरन् असम्भव है ।

इतिहासोंसे जाना जाता है कि, वे पादरी, जिनसे कि, ईश्वरके नामका स्मरण और ईश्वरकी भक्तिका प्रकाश ईसाई धर्ममें फैलता था वे अब नहीं हैं । न उनका उपदेश किया हुआ नामही इन धर्मवालोंमें शेष रहा । वह नाम जिससे ईसाई साधु लोग ईश्वरी ज्ञान प्राप्त करते थे अब उसका कहीं पता नहीं । वर्तमानके ईसाईलोग नाम तो क्या लेंगे, वरन् अन्य धर्मवालोंको ईश्वरका नाम लेते देखकर हँसी, ठट्ठा उड़ाते हैं । यहाँ तक कि, उनके खण्डनमें सैकड़ों पुस्तकें छापकर प्रकाशित भी कर चुके हैं ।

जो भोजन भक्ति ईसाइयोंमें प्रथम भी थी अब उसका लेश भी नहीं रहा वरन् सबके सब सांसारिक विषय वासनाओंमें पड़कर ईश्वर भूल बैठे हैं, जो धर्मके उपदेशक पादरी लोग हैं, भारी २ वेतन पाते हैं, बगी और घोड़े दौड़ाते हैं, विषय वसानामें खूब मस्त रहते हैं; वे ईश्वरका नाम क्या जान सकते हैं ।

यह वर्तमानके विद्याभिमानी, पक्षपाती, धर्मद्वेषी और ढोंगियोंका कर्तव्य है कि, अब संसारसे ईश्वरके नामका जप स्मरण सब उठ गया । कुत्ब मुकद्दस (पवित्र पुस्तक) बाइबिलमें अपनी सम्मति मिलाकर बहुत भेद डाल दिया । उसमें जो गुण पहले था वह अब नहीं रहा । धर्मद्वेषी और विद्याभिमानियोंकी समझमें सूक्ष्म भेदकी बातें नहीं आती, बाहरी साधारण बातोंको कुछ २ समझ कर अपने विचारोंके ढंगकी बना लिया है । वास्तवमें उनका कुछ

अपराध नहीं, जैसी उनकी बुद्धि है वैसेही बनाते और करते हैं । विद्याभिमानियोंको अंतरीय प्रकाश कभी नहीं होती, फकीरोंको अंतर प्रकाश मिलता है, उससे वे लोग जो कुछ जानते हैं उसे दूसरेसे नहीं प्रगट कर सकते ।

अंतरीय प्रकाश, बिना सच्चे संत और सच्चे गुरुको कदापि नहीं मिल सकता । यही कारण है कि, सच्चे संत और विद्याभिमानी तथा संसारको चाहनेवाले ढोंगियोंमें सदासे भेद चला आता है । सच्चे संत और सच्चे साधु, ढोंगियों और मिथ्या विद्याभिमानियोंको ढोंग पाखण्ड और मिथ्या अभिमान छोड़नेको कहते हैं। तब वे कहते हैं कि, मुझे प्रत्यक्ष कुछ लाभ दिखलाओ। वो बात होनेवाली नहीं क्योंकि, सत्य विचार और निर्णयके बिना अंतरीय प्रकाश, नहीं मिल सकता । जो सर्वदा सांसारिक व्यवहार और विषयवासनामें फँसा रहेगा उसको प्रकाश कहाँसे मिले ? जो सच्चा ईसाई हो इनजीलके अनुसार कर्म करे तनिक भी विभिन्नता न होने दे तबही ज्ञानका प्रकाश प्राप्त कर सकता है ।

ईसाइयोंने साधुओंकी निन्दा करनी आरम्भ करदी। संत लोग इनसे अलग हो गये । संतोंके अलग होनेसे गुरु कहाँ रह सकते हैं ? गुरुही नहीं रहे तो पथ कौन बतावे ? इस समयमें इस धर्मके लोग साधुओंके स्थानमें पादरियोंको मानते हैं । सर्व प्रकारके शुभ कर्म करते हैं पर वह बात नहीं कि, जो सन्तोंके उपदेशसे मिलता है। क्योंकि, जब संसारीका गुरु संसारी हुआ तो; जैसे कीचसे कीचके धोनेसे शुद्धता नहीं होती उसी तरह गृहस्थी गुरुसे किसी प्रकार कल्याण नहीं हो सकता जबतक अवधूत, विरक्त, गुरु और आचार्य न मिलेगा तब तक कल्याण होना असम्भव है, जब गुरु विरक्त होगा तब भी सत्यके प्रकाश का मार्ग बतावेगा । इस धर्ममें रोजा निमाजकी कुछ भी ताकीद नहीं है यही कारण है कि, इस धर्मके लोग इन्द्रिय दमन नहीं कर सकते । इसमें बड़े २ विद्वान्, बुद्धिमान और शूरवीर लोग हैं इनके पास द्रव्य उपार्जनकी जैसी युक्ति है वैसे संसारकी किसी भी जातिमें न होगी । पर धार्मिक विचारमें ऐसे कच्चे हैं कि, उनके बराबर धर्ममें, पीछे संसारकी छोटीसे छोटी जाति भी नहीं है ।

सुना गया है कि, थोड़े दिनोंसे मेजर टकर साहब नामक किसी अंगरेजने मुक्ति फौज नामक एक मण्डली बनाई है, जिसमें सबके सब साधुओंके भेषमें रहते हैं, मन और इन्द्रिय दमन भी करते हैं । शायद वे लोग इनजील से उस वचनका कुछ आशय समझते होंगे कि:—

हजरत ईसाने किस लिये कहा कि, जो कोई अपना सलीब उठावे अपनेको भूल जावे, वह मेरे पीछे आवे प्रतिदिन सलीब उठावे । जिसने बाइबुलकी इस बातका आशय समझ लिया वही सच्चा ईसाई हुआ ।