कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1168, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंमैं जीव ब्रह्म माया बना, सब दीदनी काया बना ।
सब धर्म और दाया बना, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥
मुशिद कदमकी खाक हो, आवागमनसे पाक हो ।
उसकी मिहर बेबाक हो, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥
वे वृक्षके इनसाँ मरे, आवागमनका दुख भरे ।
आजिज विचारा क्या करे, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥
जो बोलता है तो परमात्माकी बात, जो मौन होता है तो सोचता है परमात्माका ज्ञान, जो देखता है परमात्माका दर्शन, सच्चा साधु वही है । जिसने विचार नहीं किया वह साधु पद नहीं पा सकता । विवेकही सबका सार है, साधुके लक्षणोंमेंसे विवेकही मुख्य लक्षण है । विचार विवेक वह पदार्थ है कि, सब पापों और बुरे संकल्पोंको जड़से नाश कर देता है ।
अध्याय २२
मतोंका विशेष विचार
मनुष्य मात्रके धर्म ।
बुद्धिमान् विवेकी, विचारवानोंको विचार करना चाहिये कि, मनुष्यका क्या धर्म है ? किस कारण परमात्माने अपने स्वरूपमें प्रगट किया है ? जब सोचेगा तब ज्ञान हो जावेगा कि, पंतूक पदको प्राप्त करनेके लियेही यह उत्पन्न किया गया है । इसका धन वही है, जिससे आत्मस्वरूप जाना जाता है । इस कारण मनुष्यको उचित है कि, सांसारिक प्रपंचसे मन हटाकर अपने यथार्थ कर्तव्यमें लग जाय । ईश्वरने इसे अपना स्थानापन्न बनाया है । क्योंकि, सृष्टिमें कोई भी जीव-धारी ऐसा नहीं है, जिसको कि, ईश्वरने अपने स्वरूपमें बनाया हो । मनुष्यका कर्तव्य भी सबसे भिन्नही नियत किया है; इसकी बनाबटही ऐसी बनाई है कि, जिससे इसको विवश हो ईश्वरकी आज्ञा माननी पड़े । यथार्थमें परमात्माने भक्ति का भण्डार मनुष्यको दिया है, यदि इसकी पूर्ण रीतिसे रक्षा न करेगा तो दण्डका अधिकारी होगा ।
१ जंगम, २ स्थावर, ३ वनस्पति ये तीन प्रकारोंकी सृष्टि है; १ चलने, फिरने और संकल्पादि करनेवाला जंगम, २ केवल बढ़ने और पुष्ट आदि होनेकी शक्तिवाला वनस्पति और २ जड़, स्थावर है । सदाचार देवताओंका गुण है । मनुष्य बुद्धि रखता है । इस कारण उचित है कि; पशुधर्मको छोड़ दे । देवधर्मों को धारण करे । दैवी वह धर्म है, जो कि, सर्वथाही शुद्ध हो अर्थात् दैवी सम्पत्तिसे