भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 1174, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1174

करके धातु क्रिया करनेका समय आता है। नौ गज लम्बा (कहीं कहीं पन्द्रह हाथ लिखा है) चार अंगुल चौड़ा बारीक और नम्र वस्त्र लेता है। उसको मुखके राहसे निगलकर बाहर निकालता है। पानी पीकर भीतर आंतोंको साफ करता है। फिर कपड़ेमें लगे हुये कफ आदिको साफ करके फिर निगलता है। ऐसेही वारम्बार करनेसे अभ्यास पड़ जाता है, तो गज २ भर चौड़ा और नौगज लम्बा भी निगलता और निकाल देता है। इस प्रकार जब यह क्रिया पूरी होती है तो योगी नाभीसे वायुको उठाकर मणिपूरक चक्रमें भरता है।

अनाहत चक्र — तब योगी अपान और प्राणको एक करता है। सवा हाथ की एक दातून बनाकर कण्ठके मार्गसे पेटमें चलाता है। पेटभर पानी पीकर बाहर निकालता है, जिससे अन्दर पेट, कलेजे और फेफड़ोंके, कफ आदि निकल जाते हैं इस क्रियाको कुंजर क्रिया कहते हैं। इस क्रियासे बड़ी आनन्दता और प्रकाश मिलता है। इसी क्रियासे योगी अनाहत शब्द सुनने लग जाता है। यद्यपि अनाहत शब्दमें बहुत प्रकारके शब्द सुनाई देते हैं पर सभोंमें दशप्रकारके शब्द प्रधान हैं।

१ घण्टका शब्द; २ शंखका शब्द; ३ छोटी २ घण्टियोंका शब्द; ४ भंवरेकी गुंजारका शब्द; ५ पहाड़से पानी नीचे गिरनेके समय जैसा शब्द होता है वैसा शब्द; ६ बांसुरीका शब्द; ७ शहनाईका शब्द; ८ छोटे २ पक्षियोंका शब्द; ९ वेणुका शब्द; १० चंग (सीटीका) शब्द; यही दश प्रकारके प्रधान अनाहत शब्द हैं। इनके अतिरिक्त नाना प्रकारके बाजे आदिके शब्द भी सुनाई देते हैं, जिससे मनको बड़ा आनन्द होता है। फिर इसको भी वेधके आगेको बढ़ता है।

विशुद्ध चक्र भेद — प्राण, अपान और समान तीनों वायुको कण्ठस्थानमें योगी एकत्रित (समान) करता है। इस साधनको लम्बिका योग कहते हैं। इसके साधनेके समय केवल दूधही पीकर रहना होता है, नाज नहीं खाना पड़ता। मक्खन और सँधे नमकसे जिह्वा को नित्य रगड़के पतला करना और जिह्वाकी जड़की रगोंको शनैः शनैः काटके (जिह्वाको) इतना बढ़ाना पड़ता है कि, दशवें द्वार तक पहुँच सके। जिह्वाको उलट कर ब्रह्मरंध्रके मार्गको रोककर ऊपरसे टपकते हुये अमृतको पीता है। इसके पीनेमें शरीरकी कांति तेजोमय हो जाती है। इस प्रकार अमृत पीनेका आनन्द प्राप्त हो जाता है तो योगीको लम्बिकायोग का साधन पूरा हो जाता है।