भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1178

जेहि चौबीसको मुक्त बतावै, जगते कहैं निरासा ।
तेहि रथ चढ़ाई राग करि फेरै, ज्यों नट करत तमाशा ॥
क्षुधा पिपासा आदि अष्टदश, दोष कहैं यह त्यागे ।
जा कारण सों सने दोषमें, ताहिमें निशि दिन पागे ॥
दर्शन ज्ञान वीर्य सुख चारी, जीव गुण कहैं विचारी ।
जीव पुदगल संबंध नहीं तव, कहु काको गुण चारी ॥
सती देह दुःख पलमें त्यागे, भूत लगा तेहि वृक्षे ।
जो साधन दुःख करि तन त्यागे, सो भुतवा नहि सूक्ष्ने ॥
रिषभ आदि चौबिस तीर्थकर, तिन्हें कहै मोक्षगामी ।
यह छौ कृतम क्षय कीयो सबके, अरुक्षे सेवक स्वामी ॥
जग उत्पत्ति कियो न काहू, पढ़ि गुणि कहे अनादी ।
कर्म करे कर्ता नहि मानै, भया अनीश्वर वादी ॥
आठ कर्ममें चारि बंध कहै, चारि कहे मोक्ष दीठा ।
जो जग कर्म किये ते नाहि, तो कृत करै करावे झूठा ॥
ये षट द्रव्य काहिको भासै, केंहि उपदेशि फसावै ।
सो कर्ता कृत्रिम चिन्हें बिनु, फिरि फिरि योनिहि आवै ॥
मोक्षको धावत बंधन पावत, ठग सुखलेत चोराई ।
गले फांस डारि डोरिआवै, मोक्षमें चोर लुकाई ॥
जो ठग पूर्वाचार्यहिंको दुःख, दियो न चीन्हें बैना ।
कहै कबीर सो ठग चीन्है बिनु, दुःखी भये सब जेना ॥ १ ॥

साखी - षट द्रव्य जैनी मता, ताको यह निरधार ।
जीव पुदगल अधरम धर्म, काल अकाश विचार ॥ २ ॥
षट द्रव्य यह मानिके, जैनिहि चित्त हुलास ।
कहहि कबीर उपदेश केंहि, पूरव केंहि भई भास ॥ ३ ॥
जैनी साधन बहु किया, मुक्ति न आई हाथ ।
जेहि दुःख चाहे मुक्तिको, सो दुख उनके माथ ॥ ४ ॥
जैनी साधन मोक्ष हित, करै कष्ट बहु भांति ।
जेहि सुख नित साधन करे, होइ सो आत्म घात ॥ ५ ॥
जैनी जैन ३ कमाइया, करता ईस विसारि ।
चाहत है जय कृतमकी, करि करि कर्म फुसारि ॥ ६ ॥
कबीर जैनी लोभिया, ठगके हाथ बिकाय ।
मुक्ति आकासके उपरे, सुनि सुनिके ललचाय ॥ ७ ॥