कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1180, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकहें कबीर यहि जगतमें, जैनिक यति गुलाम ॥ २३ ॥
कबीर तिर्थकर जैनके, कियो अमोक्षी बाच ।
मुक्ति कहें पुदगल छुटै, ग्रंथ भये सब काँच ॥ २४ ॥
मोक्ष मुख चूंमन लगे, छौ घुनि घुनि बजाय ।
मारि तमाचा साधना, पटके जब खिसियाय ॥ २५ ॥
साधन सब लावा लखै, सिद्धि लखै सो बाज ।
शब्द विवेकी पारखी, सिद्धन्हके सिरताज ॥ २६ ॥
तात्पर्य—ऋषभनाथजीसे लेकर महावीर स्वामीतक चौबीस तीर्थकर हुये, उनका वृत्तान्त जानने पढ़नेसे विशेष जाना जावेगा । जैसे वेदधर्मके सिद्ध साधुओंका वर्णन है, वैसेही जैनधर्मके सिद्ध साधुका भी हाल है । सब जैनी अरहंतका नाम जपते और उसीसे मुक्ति चाहते हैं ।
बौद्ध—जैसे जैन धर्मी वैसेही बुद्ध धर्मके लोग भी वेद धर्मको नहीं मानते । वेद धर्म छोड़ ये लोग अलग तो हुये पर नानाप्रकारकी प्रतिमाओंकी पूजा अर्चा तो वैदिकोंकीसी करते ही रहे । विष्णुने इनको वेद धर्मसे तो छुड़ाया पर व्यर्थकी रीति व्यवहार तथा पाखण्डमें कंद कर दिया । यदि जैनियोंको यथार्थ प्रकाश मिलता तो सत्यको जानकर भी पाखण्डमें नहीं फँसते ।
गजल — टुक देखिये क्या खूब है जैनीका तमाशा ।
गाहे दिल मरगूब है जैनीका तमाशा ॥
बुत पेश जहाँ मर्द न जनों रक्स कुना हैं । कोई खासको मतलूब है जैनीका तमाशा ॥
जिसको वह खुदा कहते सो बाजार फिरावें । यह देखिये मायूब है जैनीका तमाशा ॥
कसरतसे मरौवज था यह अय्याम सलफ्रमें । इस असिरमें महजुब है जैनीका तमाशा ॥
जादू सेहर जन्तर मन्तरसे लगे हैं । मरहटसे मनसूब है जैनीका तमाशा ॥
अकसर मुतनाफिर है व लेकिन कोई कोई । अशखासको महबूब है जैनीका तमाशा ॥
सब दूत व भरम भूत जैनीको आजिज । यह नाकिस मकलूब है जैनीका तमाशा ॥ १ ॥
मूसा धर्म ।
हज़रत मूसाके द्वारा, इब्रानियोंको खुदाने शरीअत (शास्त्र— प्रदान किया । उनकी किताबमें दश आज्ञाही सर्वोत्कृष्ट हैं । जिसका वर्णन पहले लिख चुका हूँ । प्राचीन कालमें चाहे जैसा रहा हो पर वर्तमान कालमें तो मूसाके लोग बलिप्रदान आदिक कुछ रीतियोंकोही धर्म समझते हैं । अपने मन्दिरोंमें जाकर निमाज और बज़ीफा पढ़ा करते हैं इसीसे अपनी मुपित मानते हैं । सच्चे मोक्षदाताको ये क्या पहचानेंगे, जिस खुदाने मूसाकी अहकाम शरपी बतलाई,