कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1187, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकार नहीं रखते तो भी साधारणतः इस धर्मके लोग दया और नम्रतासे बहुत प्रयत्न करते हैं । इन लोगोंमें क्रोध और निर्दयता सब जातियोंसे अधिक है । यही प्रत्यक्ष प्रमाण है कि, इनका मुख्य धर्म कुरबानी आदि है जो तमोगुण और अविवेक अज्ञानता, निर्दयता बिना हो ही नहीं सकता ।
जबतक मुसलमान लोग तमोगुणका आसरा छोड़ सतोगुणका आसरा न लेंगे उसको अपना आधार न बनावेंगे, तबतक इनके अंतः—करण की शुद्धता न होगी, न इनको मोक्ष मार्गही मिलेगा वरन् ईश्वरके कोपमें पड़े रहकर नाना-प्रकारकी गर्भ आदिकी नर्क यन्त्रणा सहते हुये भौसारगमें गोता खाते रहेंगे ।
नम्रम् ।
यह इनसान है दर्द दिलके लिये । कि बेरहम रजवाँ न राजी किये ॥
न पावे कोई वह विहिस्ती दरखत । कि दिल जिसका होवे मखलूकसे सख्त ॥
यहाँ और वहाँ हूर गिलमाँ वही । वही मर्दी जन और मुसलमाँ वही ॥
वही नेमत और खवान अलवान है । वही नोश वखुद शौकतो शान है ॥
न पहचान पैगम्बरके पाक जो । यहाँ और वहाँ है गिफ्तार सो ॥
तुर्ब और तरागः बहानः । किया हम्बमें जमीन और जमाना किया ॥
गिरफ्तार लज्जात नफ़सानियाँ । यहाँ और वहाँ एक सेहो मियाँ ॥
भला ! यह भला है ? गला काटना । मिहर या क्रहर खूनका चाटना ॥
किसी जिस्म और सूरतमें जानदार हो । जहाँ दार उसका अमाँदार हो ॥
किसीकी वह ईजा से राजी नहीं । कि बेइल्म मुल्ला व काजी नहीं ॥
वह रहमान है सबका मिहरवाँ पिदर । वह हाजिरो नाज़िर है देखो जिधर ॥
वह बेचून सब जहाँ का ले हिसाब । खड़े होवें जब रक्बके आली जनाब ॥
न बदला छुटे कोई हो पीरो अमीर । कि है कौल यह सत्त साहब कबीर ॥
खुदावन्दकी बारगाह बेरया । जो हरकसके इनसाफ़ में दिल दिया ॥
रहीम जो रहमान् मशहूर है । हमेशः सो बेरहमीसे दूर है ॥
गला घोटना उसको भाता नहीं । छूरो वह गलेपर चलाता नहीं ॥
न छिड़कावता खून मुजविह ऊपर । नहीं गोश्त खाता न खाता ज़िगर ॥
न खूँखार ग्रफ़्फ़ार सितार है । क्या सो गुमाँ बेगुमाँ पार है ॥
जले गोश्त और पोस्त बदबूई हो । जो खुशबूय कहे खिला फ़ेअकल सो ॥
वह कौसा खुदा अक्षल से ऊँघता । जो बदबूको खुशबूय कर सृंघता ॥
जला करके कुरबान हो जाने जो । जो सृंघे वो खावे खुदा कौसा हो ? ॥
यह मूसाके मजहबकी बातें लिखा । जो मूसा धरम ईसा सोई कहा ॥