कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1188, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो मूसा व ईसा के मतका खुदा । मुहम्मद के मजहब की सोई सदा ॥
बुजुर्ग व अफ़ज़ल हैं तीनां नबी । लिखा है कुरआं जो कलामे रबी ॥
वही खुदा है किया तीन ढंग । जहां जैसा वाजिब लगाया सो रंग ॥
हो जैसा खुदा वैसा बन्दः हुआ । जो हमरंग होवे आनन्दा हुआ ॥
जबह कत्ल जो खूरेजी करे । वह रहमान खुदाबन्द इससे परे ॥
ज़रा फ़िक्र को दिलमें रह दीजिये । ख्यालए बातिलको तह कीजिये ॥
अज़ल और अबद वा करम व फ़ज़ल । मदाम उसकी आईन है बेखलल ॥
शक्ति धर्म ।
आदि भवानी सब धर्मोंकी प्रवर्त्तक है; उसीकी इच्छासे सब धर्म प्रचलित होते हैं । ऐसा होनेपर भी विशेष धर्म मायाके नामसे “शक्ति धर्म” करके प्रसिद्ध है । शक्ति धर्मके सम्बन्धी जितने धर्म हैं सब ऐसे घृणित, नीच और अशुद्ध व्यवहारोंसे संयुक्त हैं कि, किसी मनुष्यकी कदापि प्रवृत्ति नहीं हो सकती । केवल राक्षस लोगही इसको धारण कर, उसके घृणित और नीच अशुद्ध नियमों को स्महार सकते हैं । यद्यपि देखनेमें मनुष्यही इस धर्मके भी ग्रहण करनेवाले हैं पर उनको मनुष्य कहना भूलका काम है । क्योंकि, आसुरी गुणोंको धारण करनेवालोंकोही उपसुर कहते हैं असुरों और राक्षसोंके सांग नहीं हुआ करते ।
इस धर्मवाले ऐसे २ नीच घृणित कार्यमें प्रवृत्त होते हैं कि, पिशाच भी उनकी क्रियासे घृणा करते हैं । उनके व्यवहारोंके स्मरण मात्रसे रोवें खड़े हो जाते हैं । उनके ऐसे घृणित और ग्लानि उपजानेवाले व्यवहार होते हैं कि, उनके लिखनेकी मेरी क्लम और वाणीमें सहन शक्ति नहीं कि, उनको लिख सकें । यह धर्म विशेष कर शिव और शक्तिका है । योगी, विषयी और मांसाहारी लोग इसके प्रवर्त्तक हैं । इस धर्मके द्वारा लाखों क्या अनन्त जीवोंकी नित्य हिंसा होती है, लाखों जीवधारियों के गलेपर छुरी चलती है । इसके अनुयायियोंके अन्तःकरणमें तनिक भी दयाका संचार नहीं होता, यदि राजभय न हो तो ये मनुष्योंको भी मारकर खाया करें । अबभी दाव घात पाते हैं मनुष्योंको मारे बिना नहीं रहते । ये मुर्दा जिन्दा सब खा जाते हैं । इस धर्ममें विशेष करके मूर्ख अपढ़ और नीच जातिके लोग बहुतसे होते हैं । जो लोग इस धर्मको स्वीकार करते हैं वे अपनेको छिपाये रहते हैं, क्योंकि, लोग उनके धर्मसे घृणाकी दृष्टिसे देखते हैं ।
इस धर्ममें मुक्तिके मूल पंच मकार मानते हैं—मुद्रा, मीन, मांस, मद, मंथुन यही पांच मकार हैं ।