कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1218, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुरब्बा ।
जिससे यह सब बदबू हुई तू होशकर तू होशकर ।
पहिचान सो बदबू हुई तू होशकर तू होशकर ॥
शहबत व लज्जत जो हुई तू होशकर तू होशकर ।
तेरी वासना जोरू हुई तू होशकर तू होशकर ॥
दुश्मनसे अपने प्यारके तू दूर अपना यारकी ।
पुर जहर जो क्रातिल तेरा महबूब खुद वहमारकी ॥
काटै तुझे मुरदा करे राह दिखावे नारकी ।
तेरी वासना जोरू हुई तू होशकर तू होशकर ॥
सीना लगाये वासना फिर जिन्दगीकी आशना ।
गम अलम घर घेर है रोना सदा न हासना ॥
यह खालिया सांपिन तुझे मुरशिद मेहरबां पासना ।
तेरी वासना जोरू हुई तू होशकर तू होशकर ॥
लड़ता तू अपने अक्ससे बाहोश या मजनू हुआ ।
खफ़क़ान तुझको होगया दिल सर बसर पुर खूँ हुआ ॥
तू कौन था और क्या हुआ पहिले अलि फिर नूँ हुआ ।
तेरी वासना जोरू हुई तू होशकर तू होशकर ॥
जोरूको अपने छोड़दे रिश्ते मुहब्बत तोड़दे ।
शहवात जिस्मानी चुने लज्जात दरिया रोड़दे ॥
आजिज न रख माशूक हो सब भर्मभांडा फोड़दे ।
तेरी वासना जोरू हुई तू होशकर तू होशकर ॥
मुसद्दस ।
बलखका शहनशाह था बे नजीर । थे जिस ताबे सदहा अमीर और वजीर ॥
जिसे ऐशो इशरत हुई दिल पजीर । किया इब्राहीम तर्क ताजो सरीर ॥
खदम खाक सो हो गया जिन्दा पीर । उगा दिलमें जिस इल्मका आप्ताब ॥
सो देखै मुल्क माल नकश बर आब । तूही अर्श मक्का तूही है किताब ॥
जुलूसे शहाँ साजो सामान था । जोयां दब दबः शौकतो शान था ॥
वह मारूफ दिल्लीका सुलतान था । धर्म मूरत साहब ईमान था ॥
मती सांचे सद्गुरुके फर्मान था । लिया जान दुनिया खयालो खवाब ॥
चरण धोये पिये सिकन्दर शिताब । तू ही अर्श मक्का तू ही है किताब ॥