कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1219, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंखजाना जिसे लशकरो फील थे । शरीयत मुहम्मद बतामील थे ॥
खुदा तरसीमें जो यह तावील थे । मुकम्मिल न इसके ब तकमील थे ॥
बईमाने इस लाम तहलील थे । मगह मुल्क था बिजलीखां वह नवाब ॥
झुका सिजदे सत्गुरु ब आली जनाब । तूही अर्श मक्का तूही है किताब ॥
कैंते राजा महाराजा शाहनशाह । हुये बे अदद क्या करूं मैं बयों ॥
बुजुरगी है जिनकी ब हरदो जहां । नमूना थे नेकी यहां और वहाँ ॥
जो मुरशिद हकीकां हुआ मेहरबाँ । दिखारया उन्हें जल्द तर घर बहाब ॥
न आजिज पड़े फेर खिलकत खलाब । तूही अर्श मक्का तूही है किताब ॥
गजल—पढ़ गया सद किताब ऐ तोता । नहीं जानै जनाब ऐ तोता ॥
शीरीं गुप्तार और बलागतसे । पढ़ गया दर खलाब ऐ तोता ॥
दाम दाना बखेर है सैयाद । आपही दर हिजाब ऐ तोता ॥
अब तू आकर फँसा किससमें तू । खावे सदपेचो ताब ऐ तोता ॥
जाने इसरार यारसे आजिज । खोल वह जब नकाब ऐ तोता ॥
तर्जीय बन्द ।
कहीं भैरव पूजे कहीं हनुमान । कोई ठाकुरकी मूर्ति धर ध्यान ॥
कोई शिव लिङ्ग प्रेमसे पूजे । कहीं दफ्तर खुला है ब्रह्म ज्ञान ॥
कहीं रोजा निमाज बाँगजनी । कहीं कालीके दर पै है बलिदान ॥
हर तरफ कालकी खुली हडी । होश कर लुट गई तेरी घड़ी ॥
कोई गिरजा हरममें जाता है । पन्दो तालीमको बताता है ॥
बेखबर और की खबर देवै । धर्मकी धूलको उडाता है ॥
अन्धकने अन्धकर दिये आलम । वेद बाणी बहुत सुनाता है ॥
हर तरफ कालकी खुली हिस्ट्री । होश कर लुट गई तेरी घड़ी ॥
कोई पैरो हुआ कोई पीर । कोई नाजी हुआ कोई है असीर ॥
कोई दाना हुआ कोई नादा । कोई दिलबर हुआ कोई दिलगीर ॥
कोई नेक और कोई बद किरदार । कोई आजिज है साधू कोई ॥
हर तरफ कालकी खुली हडी । होश कर लुट गई तेरी घड़ी ॥
गजल ।
तुझे हक क्या खबर ऐ बैल तेली । फिरो दिन रात घर ऐ बैल तेली ॥
मशककतो मिहनत कर खा खली भूस ॥
मशककतो मिहनत कर खा खली भूस । उसीसे पेट भर ऐ बैल तेली ॥
खलीभूस खाके जबहो मस्त बैठ । कहाँ दरगाह दर ऐ बैल तेली ॥