कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
अग्निचक्र अष्टसिद्धि, नवनिधि
खजाना जिसे लशकरो फील थे । शरीयत मुहम्मद बतामील थे ॥
खुदा तरसीमें जो यह तावील थे । मुकम्मिल न इसके ब तकमील थे ॥
बईमाने इस लाम तहलील थे । मगह मुल्क था बिजलीखां वह नवाब ॥
झुका सिजदे सत्गुरु ब आली जनाब । तूही अर्श मक्का तूही है किताब ॥
कैंते राजा महाराजा शाहनशाह । हुये बे अदद क्या करूं मैं बयों ॥
बुजुरगी है जिनकी ब हरदो जहां । नमूना थे नेकी यहां और वहाँ ॥
जो मुरशिद हकीकां हुआ मेहरबाँ । दिखारया उन्हें जल्द तर घर बहाब ॥
न आजिज पड़े फेर खिलकत खलाब । तूही अर्श मक्का तूही है किताब ॥
गजल—पढ़ गया सद किताब ऐ तोता । नहीं जानै जनाब ऐ तोता ॥
शीरीं गुप्तार और बलागतसे । पढ़ गया दर खलाब ऐ तोता ॥
दाम दाना बखेर है सैयाद । आपही दर हिजाब ऐ तोता ॥
अब तू आकर फँसा किससमें तू । खावे सदपेचो ताब ऐ तोता ॥
जाने इसरार यारसे आजिज । खोल वह जब नकाब ऐ तोता ॥
तर्जीय बन्द ।
कहीं भैरव पूजे कहीं हनुमान । कोई ठाकुरकी मूर्ति धर ध्यान ॥
कोई शिव लिङ्ग प्रेमसे पूजे । कहीं दफ्तर खुला है ब्रह्म ज्ञान ॥
कहीं रोजा निमाज बाँगजनी । कहीं कालीके दर पै है बलिदान ॥
हर तरफ कालकी खुली हडी । होश कर लुट गई तेरी घड़ी ॥
कोई गिरजा हरममें जाता है । पन्दो तालीमको बताता है ॥
बेखबर और की खबर देवै । धर्मकी धूलको उडाता है ॥
अन्धकने अन्धकर दिये आलम । वेद बाणी बहुत सुनाता है ॥
हर तरफ कालकी खुली हिस्ट्री । होश कर लुट गई तेरी घड़ी ॥
कोई पैरो हुआ कोई पीर । कोई नाजी हुआ कोई है असीर ॥
कोई दाना हुआ कोई नादा । कोई दिलबर हुआ कोई दिलगीर ॥
कोई नेक और कोई बद किरदार । कोई आजिज है साधू कोई ॥
हर तरफ कालकी खुली हडी । होश कर लुट गई तेरी घड़ी ॥
गजल ।
तुझे हक क्या खबर ऐ बैल तेली । फिरो दिन रात घर ऐ बैल तेली ॥
मशककतो मिहनत कर खा खली भूस ॥
मशककतो मिहनत कर खा खली भूस । उसीसे पेट भर ऐ बैल तेली ॥
खलीभूस खाके जबहो मस्त बैठ । कहाँ दरगाह दर ऐ बैल तेली ॥
भोगियोंका चक्र भेद, समन्वय
सिरिफ तू पेटकी खातिर है जुता । हुआ जेरो जबर ऐ बैल तेली ॥
कि जिसीने पेटमें यह पेट पाला । जरा इस रुख निगर ऐ बैल तेली ॥
कि जिसने शीर मादरको बनाया । कुछ उसका ध्यान धर ऐ बैल तेली ॥
खली खाना व दायम कैद रहना । यह तुझको खूब तर ऐ बैल तेली ॥
लगा शौतान तेरे कान दिन रात । हुआ कर बैल व खर ऐ बैल तेली ॥
नसा यह साधु गुरुको तू न मानै । परे हो कर तू मर ऐ बैल तेली ॥
अगर जज्जाल दुनिया छोड़ भागै । चरागह घास चर ऐ बैल तेली ॥
जो फिरते फिरते आदम घरमें आया । हुआ शबसे सेहर ऐ बैल तेली ॥
इस आजिज वाज सुन उठ जागगा फिल । चला खाब व खमसः ऐ बैल तेली ॥
इस दुनियाके कोई काम सच्च नहीं हैं ।
मृत लोक नरक स्वर्ग धाम सच्च नहीं हैं ॥
यह तीन लोक झूठ बाजीगरका तभाशा ।
ब्रह्मा व ईश वाम सच्च नहीं हैं ॥
यह सारा संसार सब झूठ पसारा ।
यमकाल और जज्जाल दाम सच्च नहीं हैं ॥
नेकी बदी व स्वर्ग नर्क दोनों कहाते ।
और नाद बिन्द हाड चाम सच्च नहीं हैं ॥
सब खांदे ना खांदे हुकमा जमानःके ।
दुनियामें कोई पुस्ता खाम सच्च नहीं हैं ॥
यह गरदू गरदाने और चन्द सितारे ॥
दिन रात वक्त सुबह शाम सच्च नहीं हैं ॥
पैदाइशो बक्का फना सो सारे मिस्ल खाब ।
कोई आजिज माया पर नाम सच्च नहीं हैं ॥
केती जबानै सीखलीं तोता व मंना खूब है ।
लोगोंको मुतहैयर करै बोलै बोल अजूब है ॥
पिजरेमें उसको बन्दकर गुफ्तारसे आनन्द कर ।
इस कैदको दह चन्दकर दुनियाका सो महबूब है ॥
बोलै जो शीरीं बोल सो ले लोगका दिल मोलसो ।
सुननेको आवैं गोलसो हर एकके वह मरगूब है ॥
इल्मों फ़नू सब सीख लिया यमराजको खुद सिर दिया ।
कबीर पन्थका जैनमत निरूपण
नहिं रब्त् सत्सङ्गृत किबा दरियायमें सो डूब है ॥
आजिज यह सब तू छोड दे दुनियासे रिश्तः तोड दे ।
बाग अपनी इनसे मोड दे आशिकको यह मायूब है ॥
उडकर न पार होगा तीतर बटेर भरें ।
आखिर शिकार होगा तीतर बटेर भरें ॥
कुछ सोच फिक् करले तू देख पार परले ।
दिल कब क्रारर होगा तीतर बटेर भरें ॥
आकाश उडके जावे वहां से पकड गिरावे ।
फिर सर ब दार होगा तीतर बटेर भरें ॥
बदबूय सारे आवे वह गुल कहां तु पावै ।
हर जामें खार होगा तीतर बटेर भरें ॥
जहां जाय सब बेगानः नहिं दोस्त और येगानः ।
नहिं विल फिगार होगा तीतर बटेर भरें ॥
आजिजकी गुफ्तगू सुनकर सीख लेवे वह गुण ।
नहिं सङ्गसारोंका तीतर बटेर भरें ॥
जगतके जीव राम क्या जानें । करना क्या है सो काम क्या जानें ॥
घास चरना व बोल हैवानी । भेड बकरा सलाम क्या जानें ॥
दबदबः दिले दिमागो दौलतो जाह । औज शाहां गुलाम क्या जानें ॥
गंदें गुफ्तार सुन हुये गन्दे । पाक साहब कलाम क्या जानें ॥
कैल फर्जन्द आम्बिया सिद्ध साधु । सत साहब पयाम क्या जानें ॥
काल बखशिशमें सब हुये मदहोश । अकबर २ इनाम क्या जानें ॥
जिन कोसिरमें है अकल हैवानी । जिन्दगी इन्तिजाम क्या जानें ॥
जो जमीनके हैं बुजदिलो गेदी । कद्र दारुलमुहाम क्या जानें ॥
झूठमें जगत लग रहा सारा । वस्फु सो सत्य नाम क्या जानें ॥
साधुका भेद कोई जाने साधु । विष्णु ब्रह्मा व बास क्या जानें ॥
दुनियवी आदमी हैं सब अन्धे । काल जज्जाल दाम क्या जानें ॥
अकल और नकल पीरो कुल आलम । अस्लको अकलखाम क्या जानें ॥
जोहरी कोई जान जोहर जो । बे बहा अजदहाम क्या जानें ॥
जिन्दगी बखश गोश नोशिन्दः । कौन साकी व जाम क्या जानें ॥
घर बघर देखिये खोरिश हैवों । कौन इन्सों तआम क्या जानें ॥
है करोड़ोंमें कोई रहबर एक । दुनिबवी खासोआम क्या जानें ॥
कहाँ आये कहाँको है जाना । अल्हे दुनिया मुकाम क्या जानें ॥
कौनसी राह चढ़ चलें किसपर । अस्प सो तेज गाम क्या जानें ॥
सन्त बतलावें जानै आजिज्ज सो । हिन्दियां हाड़चाम क्या जानें ॥
साखी कबीर साहबकी ।
सन्त जगतमें भगत हैं सन्त रामके पूत ।
सन्त न होते जगतमें तो राम जावता ऊत ॥
गजल—तेरा शीरीं कलाम ऐ तूती । हुई सैद बदाम ऐ तूती ॥
पिजरेसे तू छूट जाये किधर । कर जो तू सद सलाम ऐ तूती ॥
उड़ जिधर जावे तो पकड़ लावें । हो गई अब गुलाम ऐ तूती ॥
मीठी बोलोंसे आ तुझे घेरें । गर्द तुझ अजदहाम ऐ तूती ॥
अब तू सैयाद के हाथ पड़े । होवै एक दिन तआम ऐ तूती ॥
कर दिया है तुझे हब्स दायम । यह तेरी अकल खाम ऐ तूती ॥
गर करे बात बावर आजिज्ज की । जाप कर सत्य नाम ऐ तूती ॥
तू बात को न माना खुद अकिल पर दिवानः ।
शैतान वरगलाना कर काम मुर्ग बिस्मिल ॥
बे रहम काजी मुल्ला तू आन इनमें भूला ।
तुझको चढावै चूलहा कर कान मुर्ग बिस्मिल ॥
हर तरफ हैं कसाई इनसे न कुछ बसाई ।
तुझे घर की न रसाई कर कान मुर्ग बिस्मिल ॥
आजिज्ज को बात मानो उसी मेहरबानको जानो ।
मत बात अपनी ठानो कर कान मुर्ग बिस्मिल ॥
तू भार से लदा है खुद यारसे जुदा है ।
तेरा न हक अदा है क्या चीखता है गदहा ॥
कूड़ा कबाड़ खावें तो भी न होश आवें ।
वेददं हो लदावें क्या चीखता हैं गदहा ॥
दिनरात मार खाना उसही गलीमें जाना ॥
यह सब तेरे बिगानः क्या चीखता हैं गदहा ॥
धोबी कुम्हार लादा कहाँ तेरा बाप दादा ।
कहाँ मान और मर्यादा क्या चीखता है गदहा ॥
कर मीत से भित्ताई तदबीर यह बताई ॥
आजिज तुझे जताई क्या चीखता है गदहा ॥
पहिचान ले कसाई फिर नहीं गला कटाई ।
पञ्जे न उसके आई कर होश भेड़ बकरी ॥
गल कट्ट है जो तेरा इस घर किया है देरा ।
सुन व आज पन्द मेरा कर होश भेड़ बकरी ॥
पहिले न कहना माना हङ्कार दिलमें आना ।
खुद अकिल पर दिवानः कर होश भेड़ बकरी ॥
अब तो गला कटैगा क्रस्साब क्यों हठैगा ।
खुद ठाठ सो ठटैगा कर होश भेड़ बकरी ॥
आजिज खड़ा पुकारा तुम में जो हो कड़ारा ।
ले जो पुनह सहारा कर होश भेड़ बकरी ॥
अपनी जमाअत जोड़ै रिश्ता न जब तोड़ै ।
हरगिज न काल छोड़ै सुन बात ढक मकोड़े ॥
लशकर हजारहा है न शुमार कुछ कहा है ।
हरगिज न कोई हटावै आफ़ात ढक मकोड़े ॥
दौलत जखीरा सब है तेरी न रख वह रब है ।
जा ऐश और तरब है सदमात ढक मकोड़े ॥
क्यों ? जोड़ता जखीरा खूब यह वतीरा ।
आकर तुझे ले तौड़ें घर लात ढक मकोड़े ॥
पांवों तले तू पिस्ता तौ भी न तुझे दिस्ता ।
आकर तुझे ले तौड़ें घर लात ढक मकोड़े ॥
पांवों तले तू पिस्ता तौ भी न तुझे दिस्ता ।
आजिज की व आज सुन ले यह घात ढक मकोड़े ॥
बकरीका ग़ज़ल ।
सौ बार सिर कटाया तौ भी न होश आया ।
इस बार चेत भाई तू राम बोल बकरी ॥
अब तेरी क्या खता है क्यों तेरा शिर कटा है ।
तू घास फूस खाये तो राम बोल बकरी ॥
तुझपर जो जुल्म कर है, हकसे न उसको डर है ।
मूसा धर्म
सुनै वह तेरी दुहाई तू राम बोल बकरी ॥
क्रातिल तुझे जो काटै और मांस तेरी बाटै ।
सब हो तेरी सुनाई तू राम बोल बकरी ॥
बदला कभी न छूटे धर २ के काल कूटै ।
वह दाद गर कहाये तू राम बोल बकरी ॥
सो सबसे है सयाना आजिज वह मिहरवाना ।
मुन्सिफ़ है बे अददाई तू राम बोल बकरी ॥
हाथीका शब्दल ।
ऊँचा जो सिर उठाया, नीचे तुझे बैठया ।
आंकुसकी मार खाया, सुन कान देके हाथी ॥
गुरुको न सिर झुकाया, ऊपरको सिर टिकाया ।
झुकना मुहाल आया, सुन कान देके हाथी ॥
गुरु संतको झुकता, ऊपर न सिर तो रकता ॥
दुख द्रन्द होय मुक्ता, सुन कान देके हाथी ॥
संधे अतर लेला, दिन रात रंग मेला ।
हौ बेकरार डोला, सुन कान देके हाथी ।
तेरी नाक सो बढ़ाया, इसके वसीले खाया ।
आजिज तुझे बनाया सुन कान देके हाथी ॥
गुरुमहात्म्यका शब्दल ।
तीरथ हजार जाओ पुष्कर गया नहाओ ।
तीरथ न ऐसी पाओ, सद गंग गुरु चरणमें ॥
तीरथ न और ऐसी, गुरु सेव जगमें जैसी ।
क्या क्या कहूँ मैं कैसी, सतसङ्ग गुरु चरणमें ॥
गुरु सेव हरिको पावे, सब युक्ति मुक्ति हाथ आवे ।
राह रास्तको दिखावे, गुण ढंग गुरु चरणमें ॥
गुरु बिन न हरिको मेला, सो पन्थ है दुहेला ।
फिर क्या करेगा चेला, सरहंग गुरु चरणमें ॥
गुरु पूजले तू अपना, जगत जात सबना ।
नाहकके मन खपना, सब रंग गुरु चरणनमें ॥
दौलत दुनियाका शब्दल ।
जीव अन्ध कर दिया है, जम बन्ध कर दिया ।
सब फन्द कर दिया है, यह दौलत और दुनिया ॥
ईसाई धर्म
दौलत जहाँ पर जावे, अन्धा उसे बनावे ।
दुख दन्दः कर दिया है, यह दौलत और दुनिया ॥
इसको जा छोड़ भागे, तब राम रंग लागे ।
दिल गन्द कर दिया है, मह दौलत और दुनिया ॥
दौलत करे जो घेरा, वहाँ होवे तेरा मेरा ।
जम बन्द कर दिया है, मह दौलत और दुनिया ॥
इससे है देहका सुख, जाय तो हो दिगर दुख ।
दह चन्द्र कर दिया है, यह दौलत और दुनिया ॥
यह भगतीको नसावे, फिर नरकमें बसावे ।
बुद्धि मन्द कर दिया है, यह दौलत और दुनिया ॥
दुनियासे कार दुनियाङ्क आज़िज और न गहना ॥
फर फन्द कर दिया है, यह दौलतो दुनिया ॥
तरजीअ बन्द ।
सब जाय खुद खुदाय, और नहीं है ।
नहीं ढूँढ़े उसे पाय, हर पूर नहीं है ॥
तदबीर करो लाख, वहाँ दौर नहीं है ।
वह दौरमें शीशः बिल्लौर नहीं है ॥
साधुके निन्दकको, कहीं ठौर नहीं है ॥ १ ॥
अन्धे बचार चश्म, साधु निन्दक चेत ।
सो दोज़खमें जाय, खाँय गीते केते ॥
जब्बार धरमराय, पकड़ लेखा लेते ॥
हैबान बशकल नर, जो फ़िक्र गौर नहीं कीते ॥
साधुके निन्दकको, कहीं ठौर नहीं है ॥ २ ॥
साहबको देख बेशक, है वह साधु जंगलमें ।
इस अस्लको ढूँढ़, देख जाय नकलमें ॥
पहचानता तू नहिं, न आवे तेरी अकलमें ।
न इल्म है इनसानकी, यह तौर नहीं है ॥
साधुके निन्दकको, कहीं ठौर नहीं है ॥ ३ ॥
साधु साहब हैं एक फ़र्क नहीं है ।
हर जा में वही गर्ब और शर्क नहीं है ॥
इस वृक्षमें फल फूल, कोई नूर नहीं है ।
बिन साधु गुरु ज्ञानी, ध्यान गर्क नहीं है ॥
साधुके निन्दकको कहीं ठौर नहीं है ॥ ४ ॥
साधुकी निन्दासे धरम करम नाश हो ।
साधुकी निन्दा से घोर नरक बास हो ॥
साधुकी निन्दा न मिहर रब्ब की आस हो ॥
साधुकी मिहर, आजिज, जम जौर नहीं है ॥
साधुके निन्दक को कहीं ठौर नहीं है ॥ ५ ॥
मुरब्बा भौरा ।
पिया परदेस क्या भौरा भयोरी ।
तु गाफिल होके सोई क्यों है बारी ॥
तु हरदम ताक बैठी अपनी पूरी ।
तु सतगुरुसे न क्यों करती चिरौरी ॥ १ ॥
कोई पायक पिया की खबर दे ।
विरहिनि जिसके बदले अपना सिरदे ॥
मेरी प्रीतमकी पाती आन धरदे ॥
तु सतगुरुसे क्यों न करती चिरौरी ॥ २ ॥
कोई मोहि प्राण प्यारेसे मिला दो ।
कि मुझ मुर्दा विरिहिनीको जिला दो ॥
जो गुल कुम्हालाया है सो फिर खिला दो ।
तु सतगुरुसे न करती क्यों चिरौरी ॥ ३ ॥
उसी सतगुरुकी सब कुदरत जहाँमें ।
वही हाजिरो दंरपरदः निहॉयें ॥
वही देखते जमीन् और आस्मोंमें ।
तु सतगुरुसे न क्यों करती चिरौरी ॥ ४ ॥
मेरे साहब, मैं तेरे पायलागी ।
तेरी कृपासे मेरी भाग जागी ॥
तेरेही मिहर आजिज हो सुभागी ।
तु सतगुरुसे क्यों न करती चिरौरी ॥ ५ ॥
तरजीयबन्द खम्सः कौआ ।
होके नाकारा तो पड़ते भूलौआ । दवें आराम हाड़ और चाम चौआ ॥
बनावे बात क्या वक़्ते चलौआ । अमरफल छोड़कर क्यों हो कोह कौआ ॥
तुझे हरिनामसे क्या काम कौआ ॥
पढ़ाकर वेद और काँकौ किया कर । खोरिशे नापाक खा करके जिया कर॥
कुतुब ख्वानीसे अपना दिलदिया कर । किधर आदम गया है और हौआ॥ तुझे
कि जिसने तुझको यह पोशिश दिया । न उस फर्माबरी कोशिश किया है ॥
तेरी खोरिश और आदत सब छिया है । कहेगा क्या जब आवे बुलौआ ॥ तुझे
सीखा तूने जो हुशियारी जहाँकी । खबर तुझको न इसरारे निहाँकी ॥
न परवाह तुझको आजिजके ब्यौकी । पड़े सिरके ऊपर तेरे ो पौआ॥ तुझे०
तरजिअ बन्द खम्साः (गुरुसेवा) ।
बना आदमका पुतला आवे वतीसे । खबर क्या इसको है नफते आपसीसे ॥
यह घेरा चार सू शैताने लयोसे । निगहकर अपनी इल्ममें दूरबीसे ॥
हैं सब नेअमत गुरु । खिदमत यकीसे ॥
पयम्बरपीर सदहा जो गुजरते । ऋषि मुनि ओलिया सब कहते मरते ॥
न गलती अपनी पर जो ध्यान धरते । खबर जिनको न बिलकुल कालकी से ॥
हैं सब नेअमत गुरु । खिदमत यकीसे ॥
हरीसे मप्स हैं बे इल्मानी । न इनको कुछ खबर घर जावेदानी ॥
हुई उनपर न मुशिद मिहरबानी । उठाले हाथ तू दुनिया वदीसे ॥
हैं सब ने अमत गुरु खिदमत यकीसे ॥
खबर नहीं जो खबर दारान आलिम । कहाँसे है नुमाँया नफत जालिम ॥
जो पैदा जग बचा कोई न सालिम । खबर तू पूछ अज्ज गोशेः गुजीसे ॥
हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥
कोई दिलगीर दिलबरकी खबर दे । कि जिसके बदले आशिक अपना सिरदे ॥
हैं जिनसे बात होती है न परदे । खबरको पूछले खातिर हजीसे ॥
हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥
न जाने भेद जो बातें बनाते । न भूले साधु लुच्चोंके भुलाते ॥
न आशिक कान उनके रख लगाते । तुझे क्या काम कोई नुकतः चीसे ॥
हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥
तू अपने रङ्गमें रंगा सदा रह । जगतसे पीठरु खुदबा खुदा रह ॥
फिराके यारके गमसे लदारह । तुझे क्या काम आजिजई व आँसे ॥
हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥
गञ्जल (चींटी) ।
ज्वलीरा क्या जमा करती है चिउँटी । तु किसके वासते धरती है चिउँटी ॥
नहीं जब तू ज्वलीरा यह कहाँ है । बिला गाहकमें क्यों मरती है चिउँटी ॥
विशेष कथन
न यह घर है तेरा घरकी न तू है । तो फिर घर किसलिये भरती है चिउँटी ॥
जब यक दिन आनकर तुझको लताडें । न तू उस रोजको डरती है चिउँटी ॥
सिखाया तूने यक दिन शह सुलेमों । आजिज बात रख रखती है चिउँटी ॥
गजल (साथ)
जर सीमसेकी जो प्यार ऐ सोंप । है तेरा वह घर वह बार ऐ सोंप ॥
आकरके खजाना पर तू बैठा । यह तेरा था दिल फ़िगार ऐ सोंप ॥
जिस दिलवरसे दिल लगाये । उस जामे तेरा क्रार ऐ सोंप ॥
जर सीम जहाविरात महबूब । उनसेही तेरा था प्यार ऐ सोंप ॥
माशूकके घर तुझे बैठाला । मिल शौकसे अपना यार ऐ सोंप ॥
कर दूर दफ़ीनः से आजिज । पावेगा तू हक्क दीदार ऐ सोंप ॥
गजल—जगतके आदमी हैं डोंगर ढोर । धरम धरधरके मारे डोंगर ढोर ॥
शमअ परवानः आदमोन कोई । हिर्स हैवान प्यारे डोंगर ढोर ॥
काल काबूमें कोई नहीं इन्साँ । मंरते खपते बिचारे डोंगर ढोर ॥
है बरी आदमी सब दुख द्रन्द । हाय तोबः पुकारे डोंगर ढोर ॥
पहन इन्सान लवास आजिज । जान घरको हमारे डोंगर ढोर ॥
तरजिय बन्द खमसः ।
यह कुल मखलूक आतशमें जले हैं । जो मरहम हाथ हसरतसे मले हैं ॥
गुनः करनेमें हरगिज नहीं टले हैं । जो रोराँ संगपर उनको तले हैं ॥
क़लम बाहेसे हलवाहे भले हैं ॥
हरीसे दुनियवी हों ग़र्क दुनिया । गुरु और साधु जो बातें न सुनिया ॥
जो बोया तूने सोई तुझको लुभिया । न दुनिया आक़बत यमजीऊ छले हैं ॥ क०
जो सीखे होशियारी कुछ जहाँकी । कहाँ जाना था सोली रह कहाँ की ॥
न जाना भेद इसरारे निहाँकी । सो हराराते जमीं मआदिन रले हैं ॥ क०
लगे इस बाग़ सद्दा बेल व बूटे । दरखतां वे अदद हर जाय फूटे ॥
जो हो फ़लदार सो मालीसे टूटे । सो काटे जायेंगे जो न फले हैं ॥ क० ॥
सदाजो साधुगुरुको सर झुकाये । भजन सुमिरनसे अपना दिल लगाये ॥
दया दान और धरमकी राहबनाये । गुरु और संत फरमांसमे चले हैं । क० ।
हुये जो खाके मोटे मस्त मग़रूर । हमेशः साधु गुरुसे सो रहे दूर ॥
ज़र्क और बर्क पोशिश ताज सुमबूर । सोहों बलिदान मोटे ो पले हैं ॥ क० ॥
नहीं दिलमें जिनके रब्ब रहमान । न उनपर होवे हरगिज रहम सुवहान ॥
सोई आजिज पड़े चौरासीकी खान । न पावें राह सो मर मर गले हैं ॥
क़लम बाहेसे हलवाहे भले हैं ।
मुसलमानी धर्म
गजल ।
लगे सब स्वान इस मुर्दार दुनिया । न कोई इनसान मुर्दार दुनियाँ ॥
है कूकरो शूकरो खर सियार पियारी । सो सब हँवान इस मुर्दार दुनिया ॥
जो मुर्दार लगे सो सब हैं मुर्दः । न उनमें जान न इस मुर्दार दुनिया ॥
न ईसमें कोई मजहब है न मिल्लत । सो चारो खानि इस मुर्दार दुनिया ॥
नहीं यह जिन्दगीकी जा है आजिज । यह सब समसान इस मुर्दार दुनिया ॥
कुत्ताका गजल ।
तू घर बघर भूंकता फिरता है कुत्ते । न तू हर्गिज सन्न करता है कुत्ते ॥
दिया था दान और किया था खैरात । जो नंग और भूख से मरता है कुत्ते ॥
जो दुर दुर सब करे और भूखा मारे । कहीं तेरा उदर भरता है न कुत्ते ॥
दिया नहीं फिर पावे तू कैसे । इसी से भूख दुख भरता है कुत्ते ॥
अगर आजिज बचन सुन सन्न करतू । तो फिर क्यायों भूखसे डरता है कुत्ते ॥
तो गाओ गीत सबमिली कहो सुहागिन । जो पाया है अमरबराय सुहागिन ॥
तुम्हें हरिनामसे है काम बरनः । तू बैठ आरामसे घर ऐ सुहागिन ॥
तेरा मालिक निगह वान है । जबरदस्त तुझे कुछ अब नहीं डर ऐ सुहागिन ॥
तुझे हरदो जहाँमें खुशनसीबी । तु पाया अपना घर ऐ सुहागिन ॥
तु है जुग ग अटल तेरी सब औलादा । जमीमें और जमाँ भर ऐ सुहागिन ॥
अगर आजिज पिया का प्यार तुझको । तो यकमूदीदः दिलधर ऐ सुहागिन ॥
खसम जो मर गया है ऐ रॉड । तुझे सब दुखने घेरा है ऐ रॉड ॥
तू चक्की पीस खा दीवार परदे । जो अपने चर्खाको फेरा है ऐ रॉड ॥
तू मिहनत व मजदूरी किया कर । तुझे दिन रात झक झरा है ऐ रॉड ॥
तुझे कहाँ पलंग और कहाँ बिछौने । तुझे गमके कुए गेरा है ऐ रॉड ॥
अब आजिज कहना सुन हरिनाम जपना । तू टूटी झोपडी धरा है ऐ रॉड ॥
खसम तेरे बहुत हरफि कसबी । न हो हरगिज कभी तू साफ कसबी ॥
लदी तू सद गुनाहो से है दिन रात । पहेन दिन चार तू जर बाफ कसबी ॥
खोरिशों पोशिश हैं यह दो चार दिनको ।
हंसी और मसखरी और लाफ कसबी ॥
तेरा देरा हो दोजख आग में जब ।
न फिर हो जूर्म तेरा मुआ कसबी ॥
न आजिज व आज रख तू कान करती ।
कहेंगे तुझको लामो काफ कसबी ॥
किया करता है तू गट गू, समझा नहीं तू मजंमूं ।
दिन चारमें कहाँ तू, हरिध्यान कर कबूतर ॥
ऐसी गिरह जो मारी, ऊपरको ले उडारी ।
वह जा नहीं तुम्हारी कुछ कानकर कबूतर ॥
आकासमें चढ़ाया हम जिन्स में बढाया ।
नहीं इल्म वह पढाया, गिरी आनकर कबूतर ॥
अपनी दिखाके बाजी लोगोंको करता राजी ।
यक दिन पकड़ ले क्राजी क्या मान कर कबूतर ॥
आजिजकी बात सुनले और मनमें अपने गुणले ।
सत्तनाम सबमें चुनलें पहचान कर कबूतर ॥
सुन सतगुरुकी वैना और समझ उनकी सैना ।
दिन चारमें तु हैना, सत्तनाम बोल मैना ॥
सीखी जबाँ केती, थी अकल तुझमें जेती ।
अबतक पकी न खेती, सत नाम बोल मैना ॥
बोली अजब बोला, सर काल कर कलोल ।
तब जाब कौन टोला, सत नाम बोल मैना ॥
पढ़ पढ़ जबाँ खपना, माने बिगानः अपना ।
दिन दो तीन होवे सपना, सत नाम बोल मैना ॥
आजिज तू छोड़ पिंजर, और रिश्तः तोंड़ पिबर ।
फिर फिर न जोड़ पिंजर, सत नाम बोल मैना ॥
तू तन मन धन लगाकर अपना गुरुपूज । क्रदमपर सिर झुकाकर अपना गुरुपूज ॥
न गुरु बिन हरिको पावे तु हरगिज । तू उस फर्मा बजाकर अपना गुरु पूज ॥
गुरुको मिहर पावेगा हरिको । सो साम्ना बनाकर अपना गुरु पूज ॥
गुरुको छोड़ हरिको ढूँढ अहमक । जहां पावे बुलाकर अपना गुरु पूज ॥
गुरु गोविन्दसे बढकर है बेशक । यही ईमान लाकर अपना गुरु पूज ॥
वचन कबीर साहबका यह आजिज । जहां होवे तू जाकर अपना गुरु पूज ॥
तु शमसे अपने रोयाकर विरिहिनी । मुंह आँसूसे तु धोया कर विरिहिनी ॥
उठें जब दर्द भारी तेरे अन्दर । कलेजा अपना टोयाकर विरिहिनी ॥
प्यारे बिन तेरा दुख कौन मेटे । तु अपनी जान खोयाकर विरिहिनी ॥
पपीहा ज्यों रटो अपना पिया पीय । मगुफ़लत ख़्वाब सोयाकर विरिहिनी ॥
लिखाकर और किया कर वस्फ उसकी । जबों अपनोको गोया कर विरिहिनी ॥
तुही तुही तुही तू देख हर रुख । तु दिल दरिया बिलाया कर विरिहिनी ॥
तुयक रुख हो नजर कर अपने आजिज । भरम दरिया डुबोयाकर विरिहिनी ॥
रोतेही शामसे सेहर आया । यार अबतक न मेरे घर आया ॥
आह व नालोंमें सारी गुजरी रात । मेरी महरू न मन मिहर आया ॥
करूँ तदबीर कौन है चारा । किस लिये उसके दिल क्रहर आया ॥
मेरी भिन्नत सुना मेरे क्रासिद । अब तलक नहीं प्यामबर आया ॥
नहीं आसूँके तार टूटेंगे । अबतो दिल दीद अपना भर आया ॥
तुही तू तूही तू नजर आवे । हमः मौजब सर बसर आया ॥
नहीं तुझसे है खाली कोई जाय । हर जगह एकसा नजर आया ॥
किस लिये वस्लसे किया महरूम । शोम बद मेरा काम कर आया ॥
हो गया सख्त क्यां तेरा दिल मोम । क्या करूँ अबतो उससे दर आया ॥
तेरा दामन न छोड़ेगा आजिज । जान लग तक मेरा अगल आया ॥
नहीं तेरा जो मुशिद मिहरवों है । तो एकही ढंग जाहिलो वेद ख्वों है ॥
अगर तिशनःसे तू होवे जो बेताब । तो साक्री हाथ प्याला हरजमाँ है ॥
अगर प्यासा नहीं तो क्या पिलावे । वह दायम दूर तुझसे बेगुमाँ है ॥
जहां चाहे तु पीय प्याले इश्क । तुझ क्या खौफ पीले दमाँ है ॥
तुझे मिलनेकी जब हो बेकरारी । तू पीव उसकी जहाँ दूढे वहाँ है ॥
दरू भी वह बेरुसे तुझको देखे । वह जाहिर और परदः निहाँ है ॥
नहीं पहचानता उसको वह तकसीर । अब उस पहचान आँख एसी कहाँ है ॥
नहीं दिलगीर माल और जानदेखुद । करशमये नाजका शेवः बुताँ है ॥
कि, तेरा आह व नाला गिरियः जारी । कशीदः दिल करे दिलबर जहाँ है ॥
कि, तू नाचीज व नालायक है आजिज । और वह बसके ऊपर शहनशाहूँ है ॥
तेरा खुशतर जमाल ऐ पाक दामन । तु खुश खुल्क और ख्याल ऐ पाक दामन ॥
सितारोंमें है जैसे बन्द रौशन । तु सब सखियोंमें लाल ऐ पाक दामन ॥
है तू जो अपने पीतमकी प्यारी । तेरा खुश वक्त हाल ऐ पाक दामन ॥
तेरे हुसनो नमक नाजो अदाके । मुकाबिल न जमाल ऐ पाक दामन ॥
फटे कपड़े व मैली गर तेरी भेस । तेरा बरतर जलाल ऐ पाक दामन ॥
इधर और उधर हरगिज तू न ताके । तेरा फजलो कमाल ऐ पाक दामन ॥
खसम अपनेकी तू फर्मा बर्दारि । मिलेंगी लागजाल ऐ पाक दामन ॥
तेरा खाविन्द हक तुझसे मिलादे । तू आजिज हो बहाल ऐ पाक दामन ॥
शक्ति धर्म
समझ कर ऐसा दूँढो वर कुमारी । सदा सुखसे रह अपने घर कुमारी ॥
जो आसेबसे तुझको बचावे । रहे बाकी न कोई डर कुमारी ॥
हया और शरम तेरी रख रख जहाँमें । वही भर्तार अपना कर कुमारी ॥
यह तीनों लोक है भरपूर नारी । है सबमें एकता एक नर कुमारी ॥
उसी नरको तू पहचाने जो आजिज । वही है एक तेरा वर कुमारी ॥
तु क्या बैठ लगाकर ध्यान बगला । तू अन्दरसे कपटकी खान बगला ॥
तेरे नजदीक मच्छी कोई न आवे । जो उनमें अकल हो पहचान बगला ॥
दशाकी हाट यह तूने जो खोला । न आवे कोई तेरी दूकान बगला ॥
खबर जिसने न गुरुसे अपने पाया । फँसेंगे सो तेरे जाल आन बगला ॥
खबरदारोंको आजिज क्यों फँसावे । फँसेंगे आनकर वे ज्ञान बगला ॥
तरकीब बन्द ।
हुई यह आग सत पुरुषसे पैदा । हुआ जिसपर है कुल आलम यह शैदा ॥
उसीसे तीन गुन और पांच तत्त्व है । उसीसे चौदहो प्झन्दी हवैदा ॥
है उसका कारखाना कुल जहाँमें । उसीसे खलकको की पीस मैदा ॥
सभी सुरनर मुनीश्वर उसको पूजें । यही गुरु सिख है रोगी व बँदा ॥
जहां सत पुरुषकी भगती न पावे । वहां ऐ आग तू डेरा बनावै ॥ १ ॥
उसी आतशसे पैदाइश वका है । उसीसे फेर कुल आलम फन्ना है ॥
उसी आतशकी पूजा कुल जमींमें । उसी आतशको देखो जा बजा है ॥
उसे पूजे फिरिश्ते आसमोंमें । उसीको देख कुल अर्जों समों है ॥
उसीका कारखाना सब नमूदार । वही ब्रह्माण्ड और पिण्डो बना है ॥
जहां गुरु साधुकी सेवा न होवे । वहां तू आग इल्मो अकल खोवे ॥ २ ॥
जलाया उस आगने सारा जमानः । ठगे सबको किया सदहा बहानः ॥
ठगे ब्रह्मा व विष्णु शिव भवानी । ठगे सिद्ध साधु पैगम्बर जमानः ॥
ठगे सब औलिया पीरों फ़क़ीरों । ठगे सब अस्ल दुनिया मुजरिमानः ॥
ठगे चौरासी लाख जानदार सारे । पड़ सब जालमें मुर्गी ब दानः ॥
जहां तू देख होवे साधु निन्दा । वहां ऐ आग हैं सब तेरे बन्दः ॥ ३ ॥
जहां मयनोशी व शहवत परस्ती । जहां क्रस्साब खाना और बस्ती ॥
जहांपर गोशत ख्वारी, किन्न कीनः । जहां बेखबरी बेहोशी व मस्ती ॥
हैं जो कोई झूठ जुल्मो जब्र आदी । तेरी खातिर हैं उनकी जान सस्ती ॥
हैं जो तहक़ीर करते साधु गुरुकी । उन्हीको दीन दुनियामें पस्ती ॥
जहां गुरु साधुमें हो जाय खाली । वहां ऐ आग तूने आग डाली ॥ ४ ॥
देवी और आसुरी संप्रदाय
तुही ऐ आग खालिक है जहाँकी । तुही महरम है इसरारे निहाँकी ॥
तुही ऐ आग सब जाँदार मामूर । तुही मालिक जमीन और आस्माँकी ॥
तुही देती है सबको खौफ अल्लाह । तु देवे फेर अकल राजदोंकी ॥
जहां आजिज न पण्डित स्वसंवेदी । तु बैठी अकल पर हर वेद ख्वाँकी ॥
जहां सत गुरु न कोई हंस उसके । वहां ऐ आग तू रह बैठ घुसके ॥५॥
यथा ।
नहीं दर्वेश सा कोई जहांमें । कि जिनको फिक्क हक्क दिल और देहों हैं ॥
जितने दुनिया सलातीन और गनी हैं । न कोई हक्क शनास इन जेरकोंमें ॥
न जिनको अपने अपने हक्कसे खबर है । सो हैवान सूरत आदम वहाँ में ॥
जिन्हें हक्कसे खबर सूर्य शहदो आलम । उनहीसे हक्क इनसानी अदा है ॥
गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ १ ॥
जिन्हें शबो रोज अशरतमें गुजरते । न जो गुरु साधुओंका संग करते ॥
पचे निसिदिन ब आफातेन जमाना । तमअ हिसों हवस शहवतसे मरते ॥
हसद कीनः व बुगजो पुर अदावत । कभी जिकरो फिक्क हक्क दिल न धरते ॥
कुछ नहीं होश जिसको आखरतकी । सरापा सद् गुनाहोंसे लदा है ॥
गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ २ ॥
हैं फुकरा बावशाहों आलिमोंके । सोई रहबर है मुफनसि जालिमोंके ॥
वहीं हैं जाबना बरते खुदाई । वहां बखशिन्दः हैं सब तालिमोंके ॥
वही हैवानको इनसान करते है । कायम उनसे ईमों सालिमोंके ॥
यही सुलतान यही सुलतान यही हैं । जमीं और आप्तमोंमें यह सदा है ॥
गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ ३ ॥
तु दिलमें देखले अपने दिवाने । अदमके मुल्क जब आदम समाने ॥
न तू तब है न में और है न दुनिया । न हशमत जाहका कोई कोई कारखाने ॥
फैना सब हों रहे कोई न बाकी । पलट जावेंगे जब कुछ जिस जमाने ॥
रहेंगे बाकी आशिक अल्लाह आजिज । वही बदबखत जो हक्कसे जुदा है ॥
गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ ४ ॥
नज़म ।
तू कैसी खूब अरबी बोलता ऊंट । पकड़ लैवेगा तौभी जब तेरा घूंट ॥
जो झींगर हैं यह पण्डित सामवेदी । सो दाऊदी लहनका खूब भेदी ॥
बतक बोले अलेमानी व युनानी । रहे बाकी व तेरी भी कहानी ॥
कबूतर तीतरो बोल अरबी तुर्की । तुम्ही कह क्या खबर उस धाम धुरकी ॥
सिंहावलोकन
जो बोले संस्कृत मीठी तु मोरा । तेरा गर्दन भी धरकर काल तोरा ॥
तु अंगरेज़ी ो बोले बोल मैना । तेरा भी टूटेगा यकरोज़ डैना ॥
जो शिरीं बोल तूती फारसी है । पकड़ पिंजरेमें तुझको ड़रासी है ॥
ऐ मँढक तू सिलंगी बोल बोला । तेरे सरके ऊपर जमकर कलौला ॥
फ़रासीसी लातीनी सिख वैरा । तेरी गर्दन ऊपर भी छुरी फ़ेरा ॥
जो मेगपयी बोलयी सदहा जवानों । तुझे मारेंगे धर कहरवानों ॥
ज़ीलतसे रज़ीलत घरमें जावे । अगर सदहा जवानें सीख आवे ॥
हुआ हैवान तू इनसान मूरत । न पहचाना जो अपनी अस्ल सूरत ॥
किया था किसलिये आदमको पैदा । हुआ तू किसके ऊपर आनके शैदा ॥
तू खालिक याद कर अपना ऐ नादों । शबोरोज़ो शाम बाम दादों ॥
॥ ल-यह मान मड़क तेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ।
यह भीड़ भड़क डेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ।
यह शान और शौकत इधर उधरका सैर ।
हर चार सिम्त फेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ॥
यह माल मुल्क जाह और हशमत व कुलाह ।
यह दुनअबी उरझेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ॥
इससे न बड़ी नेमत है यह देह बशरकी ।
कागज़का दुनी बेरा सो दिनमें गुज़रजा ॥
सत नाम यक साहब सच पकडले आजिज़ ।
यह तेरा और मेरा दो दो दिनमें गुज़रजा ॥
छिपाया यारको ऐ शोर बखते । लखाया ग़ारको ऐ शोर बखते ॥
किया दिलने मेरे दिलबरसे परदः । जताया नाज़को ऐ शोर बखते ॥
रहे रहमां तू कर दिया बन्द । बताया मारको ऐ शोर बखते ॥
जहर धरदी हेयाते आबकर दूर । कियाबन्द कारको ऐ शोर बखते ॥
नहीं नेमत सरासर गन्दगाकी । लगा अम्बारको ये शोर बखते ॥
गया जब भूल आजिज़ ठग भूलाया । दिया दारको ऐ शोर बखते ॥
साधुसेवा जो त्याग दुनियादार । हर तरफ देख आगदुनियादार ॥
देख आतश जिधरको जावेगा । फिर किधर जावे भागदुनियादार ॥
साधुगुरु बिनकहां ठिकाना और । है पड़ा पीछे नाग दुनियादार ॥
कुछ कर सोच दिलमें ऐ नादां । अब तू उठ और जागदुनियादार ॥
तेरे दिलदीलः भी मुकदर है । मोडले अपनी बाग दुनियादार ॥
संत सेवा बिना न पावे राह । उनकी खिदमतमें लाग दुनियादार ॥
संतके जा पकड़ कदम आजिज । देख तब राग रँग दुनियादार ॥
साधु सेवा करो भला होवे । इससे तन मन जो निर्मला होवे ॥
साधु सेवा जो करे मुवारक सो । इससे दूर अपनी बला होवे ॥
संत गुरु बिन फ़तह न पावेगा । गर तेरे हाथ रह कला होवे ॥
संतकी, रोशनीसे तब कुछ देख । होवे जों रातदिन जो ढला होवे ॥
संत बिन हो न तू रहा आजिज । कौसाही गर तू दिलचला होवे ॥
मुरब्बा ।
दुनिया पड़े वनाम खुदा जो कमायेगा । गर पेटभरने अपनेसे ज्यादा तू पायेगा ॥
देनावहक जरूर तेरे हकमें आयगा । खुमस जकात भूल बनी मार खायगा ॥
हरगिजन भूल दुनिअबी खुमसजकातको । जिसने तुझको दिया उसलाय मौतको ॥
तकसीम करता है सोई हरयकके कूबतको । खुमसजकात भूल घनी मार आयगा ॥
देना तुझे जो कुछ है सो दहीके छुटेगा । गर देनेको न देवेतो घर काल कूदेगा ॥
दौलत मताअमाल सबयकरी रोज लूटेगा । खुमस जकात भूल घनी मार आयगा ॥
यह तुही शाही शहनशाह आलमी । छुटे नहीं बहुनिपान छुटेगा सो वहीँ ॥
जाहिरकी आखदेख वातिनकी भी बबी । खुसम जकात भूल घना मार खायगा ॥
खुमसबजकातदी नहीं कारूँ होहलाक । जिनको नहीं है वौफ खुदाबर तरी पाक ॥
करतेबसर रहे जिन्दगी अपनी वाक । खुमसजकात भूल घनी मार खायगा ॥
खुमः जकातजितने हैं जमीपरमुनकराँ । बेशक तू उनको जानलेकारूँ विरादराँ ॥
भड़केगायका जगज्रबरब्वेकहरमां । न खुमसजकातभूघनीमार खायगा ॥
सनतौसिपाहसाहबफिरते जहाँ तहाँ । उनके हवालेकर जो देना बहकसुबहों ॥
पीछेखजाना खासनआजिजहैशकवहाँ । खुमसजकातभूलघनीमार खायगा ॥
तर्जियाबन्दखम्सः ।
सूझता तुमको है नहीं अन्धा । इसलिये काल कैदमें बन्धा ॥
पावेगा भेद शब्दके सन्धा । कौन कह भेद तुझ उस रब्बकी ॥
संत सूरत हैं सांच साहबकी ॥
होवे साहब वहाँ हों संत । संत बिन तु कभी न पावे कंत ॥
मुनता लीलाअपार और बेअन्त । उनकी बातें हैं कुछ जुदेढबका ॥
संत सूरत हैं साँचे साहबकी ।
हिन्दुओंके मुसलमान होनेका कारण
सन्त महिमा अकथ सो जाने कौन । सन्त जावें जहाँ न पानी पौन ॥
निःअंगमनिःनिगम हैं साधुके भौन । आजिज वह बात और कहों तबकी॥
संत सूरत हैं सब सौंचे साहबकी ॥
यथा-ज्वरो जन व वेद बानी । है । यह गिर तारकी निशार्नी है ॥
इनसे हो जा अलग सो ज्ञानी । है मौतके तीरकी सोई गांसी ॥
हैं यही तीन कालकी फांसी ॥
गुल खिल हैं यह तीन मायारूप । डालदे आदमी अंधेरे कूप ॥
सूझे उसको न कोई साया धूप । है यह माया मायाके तीनहूँ हाँसी ॥
हैं यही तीन कालकी फांसी ।
इनको जब छोडदे सो होवे फ़क़ीर । ज़हर आलूद इनकी है तासीर॥
आजिज इनसेही मिल है पुर तक्कसीर । है सोई धर्मरायकी हँसी ॥
हैं यही तीन कालकी फांसी ॥
ग़ज़ल ।
करदिया आके अन्ध धन विद्या । कोई न मुक्ता हो पाके धन विद्या ॥
इल्मो अमलसे खबर न रही । वेखबर दिल लगाके धन विद्या ॥
जहां जाकर क्या भये दोनों । मूक उसको बनावे धन विद्या ॥
जगहमें सो नेकबख्त कहलावे । हक्कको बातिल बातवे धनन विद्या ॥
फंस मेरे कार दुनियवी दिनरात । याद हक्कको भुलावे धन विद्या ॥
तब कहाँ गुरु है और कहाँ है साधु । रहे दोजख दिखावे धन विद्या ॥
हक्को चाहे तो दोनों छोड़ आजिज । हवस दिलमें न आवे धन विद्या ॥
कारमें दुनियवी हुआ अन्धा । है तेरे वासते हुआ अन्धा ॥
डालदेवें अज़ाबमें तुझको । तब कहाँ खाला बुआ अन्धा ॥
कौन तब काम तेरे आवेगा । आके जम नाग जब छुआ अन्धा ॥
याद हकबिन जो होगया तू बैल । मोठेपर अपने धर जुआ अन्धा ॥
वेद पढ़ पढ़के क्यों हुआ नादां । मैनाही काका और तब अन्धा ॥
रहन पावें बेगैर सतगुरुके । राम क्या बोले तर सुआ अन्धा ॥
तूने उमीदकी जो समरसे । आखिर उससे उड़ा छुआ अन्धा ॥
आजिज आखिरको उस सेहो नाउमीद । देख उसमें तू था रवा अन्धा ॥
रख न उमीद बेवफा दुनिया । है यह बेसिदक़ और सफ़ा दुनिया ॥
तनको यह पालती व रूह ऊपर । करती है जोर और जफ़ा दुनिया ॥
धर्म रक्षक हिन्दू धर्मकी दुर्दशा
पहले तरगीब देकेलेवे फँसा । पीछेसे होवे फिर ख । दुनिया ॥
तेरा इनसानी बामाकर बरबाद । फेर देवेंगे यह दशा दुनिया ॥
इससे किसको है बरखोरी आजिज । पावे हरगिज न रह बका दुनिया ॥
दुनिया जो कुछ सो तेरा तन है । हेच जान इसको सोई साधन है ॥
हेच इसको जो कर तो सब कुछ हेच । फिर न दुनियाके बीच पागन है ॥
प्यार इस तनसे प्यार दुनिया है । देह दुनियाको छोड भागन है ॥
देह दुनिया नहीं तो सतगुरु देख । आखड़ा होवे तेरे आँगन है ॥
जबतलक देह दुनियासे है प्यार । तबतलक वह लगन न लागन है ॥
मारसे तुझको व्यार हो आजिज । तो मुहब्बत ये दोनों त्यागन है ॥
जो गुलामां इश्क शह आया । कुल आलमका क़िबले गह आया ॥
अर्श और फर्श सब हुये रौशन । अब मेरे घरमें मेरा मेह आया ॥
भटका फिरता था जो व्यावामें । खाके ठोकरको अपने रह आया ॥
इश्क हजरत जहां नहीं रहबर । रहमें उसके ग़ार वह छह आया ॥
इश्कसे भागजा किधर आजिज । यह अमानत जो रखने कह आया ॥
क्या हमलमें करार कर आया । उससे अब तू फिरार कर आया ॥
उसका अब तुझको नहीं कुछ होश । घेर अब अन्धकार कर आया ॥
नहीं सुनता न सूझता है कुछ । धुन्ध गर्द व गुब्बार कर आया ॥
याद अब तुझको है नहीं अपना कौल । सत्यसाहब पुकारकर आया ॥
होश करता नहीं तू ऐ बेहोश । ख्याब गुफलत खुमार कर आया ॥
होगये जीव अन्धे और बहरे । बाज़ वह हर दयार कर आया ॥
अपने बन्धनके वासते आजिज । काम तू बेशुमार कर आया ॥
जहां जाओ वहां यह नागिन है । कहरबान मिइरबान यह नागिन है ॥
सीम व ज़र वेद बानी औरत जो । भरी सारी जहां यह नागिन है ॥
जितेदुतिवाके तालिब और मतलब । ज़हर पुर दर्द यहाँ यह नागिन है ॥
काट खावें सब अहल दुनियोंको । रह बरो हमरहों यह नागिन है ॥
यही आशिक हुई वही माशूक । सब पै शहनशाह यह नागिन है ॥
लोग और वेद आजिज इसका है । साथ हरदो ज़बान यह नागिन है ॥
जगतको अन्धकार दिया उलमा । अपना घर अज्ञान भर दिया उलमा ॥
न इबादत न जोहर है तक्वा । खोल राह सक़र दिया उलमा ॥
कहां रहमान रब्ब न साध गुरु । हिर्स हैवान समर दिया उलमा ॥
हिन्दू धर्मकी श्रेष्ठता
अहल दुनिया दब मरे सारे । सरपर भारी हिजर दिया उलमा ॥
पेटके वासते नचे दिनरात । ख्वाब गुफलत खुमर दिया उलमा ॥
कोई न वेडार सब हुये ग्राफल । राह दिखला देहर दिया उलमा ॥
आब हैवों प्याला को कर दूर । हवस हैवों चर दिया उलमा ॥
रास्ती सूझी और न वृझ कोई । तलक्रीन शैतां सर दिया उलमा ॥
खुलक इनसानसे सब हुये महरूम । राह बतला दिये हरदिया उलमा ॥
अपने खालिकको छोडकर बतला । उन्स जोरु व जर दिया उलमा ॥
होके आदम न पावे सीधी राह । शर सद हरबशर दिया उलमा ॥
दी छिया रास्ती और खोल दरोग । राह उमीद व डर दिया उलमा ॥
कुत्ब और किससा और शरआशीरी । सबक करे व फर दिया उलमा ॥
हर बरारको सो मांगना सिखलाये । भीख रह दर बदर दिया उलमा ॥
सारे टिडी हुये उड़े आस्मां । सबको परवाज पर दिया उलमा ॥
वहां जाकर करार पावे । कौन । जाने चौरासी धर दिया उलमा ॥
कीच कसरत खबर न वहदतकी । मौज मेल मकर दिया उलमा ॥
गोता खावे हजार निकले किधर । वहरमें सद चक्र दिया उलमा ॥
पेटके काममें पचे परपंच । फिक्क व फाका फुक्क दिया उलमा ॥
ऐश व अशरतमें फँस गये आदम । ख्याबखोरिस व जहर दिया उलमा ॥
आजिज अब क्या तू आह व नालःकरे । डाल खौफ़ व खतर दिया उलमा ॥
पार जावेंगे आलिम आमिल । राह दिखावेंगे आलिम आमिल ॥
सुखरु सोई हैं दरदो जहां । दुख न पावेंगे आलिम आमिल ॥
आफ़्ररीं सद है उनको और शावास । रह लगावेंगे आलिम आमिल ॥
आप किसती चढ़े चढ़ावें और । फिर न आवेंगे आलिम आमिल ॥
आलिम आमिलकी खूबी यह आजिज । मत सिखावेंगे आलिम आमिल ॥
लिया मायाने खा चतुर व चिकनिया । गये दोजख समा चतुर व चिकनिया ॥
मिली उनको सतगुरु दस्तगीरी । रहे तारीक्या चतुर व चिकनिया ॥
न उनपर साधु गुरुकी मिहरबानी । अँधेर दिल छुटा चतुर चिकनिया ॥
वह घर आजिज फिरातन सादः लौहों । वहां कोई न जा चतुर चिकनिया ॥
भजन भगवान कर मीत प्यारे । लगा शैतान है ऐ मीत प्यारे ॥
है दिनमें काम सब जौर व सोच । कहाँ रहमान है ऐ मीत प्यारे ॥
तो जल्दी सोच जप हरी नामसे लग । यह तन इनसान है ऐ मीत प्यारे ॥