भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1222

है करोड़ोंमें कोई रहबर एक । दुनिबवी खासोआम क्या जानें ॥
कहाँ आये कहाँको है जाना । अल्हे दुनिया मुकाम क्या जानें ॥
कौनसी राह चढ़ चलें किसपर । अस्प सो तेज गाम क्या जानें ॥
सन्त बतलावें जानै आजिज्ज सो । हिन्दियां हाड़चाम क्या जानें ॥

साखी कबीर साहबकी ।

सन्त जगतमें भगत हैं सन्त रामके पूत ।

सन्त न होते जगतमें तो राम जावता ऊत ॥

गजल—तेरा शीरीं कलाम ऐ तूती । हुई सैद बदाम ऐ तूती ॥
पिजरेसे तू छूट जाये किधर । कर जो तू सद सलाम ऐ तूती ॥
उड़ जिधर जावे तो पकड़ लावें । हो गई अब गुलाम ऐ तूती ॥
मीठी बोलोंसे आ तुझे घेरें । गर्द तुझ अजदहाम ऐ तूती ॥
अब तू सैयाद के हाथ पड़े । होवै एक दिन तआम ऐ तूती ॥
कर दिया है तुझे हब्स दायम । यह तेरी अकल खाम ऐ तूती ॥
गर करे बात बावर आजिज्ज की । जाप कर सत्य नाम ऐ तूती ॥

तू बात को न माना खुद अकिल पर दिवानः ।

शैतान वरगलाना कर काम मुर्ग बिस्मिल ॥

बे रहम काजी मुल्ला तू आन इनमें भूला ।

तुझको चढावै चूलहा कर कान मुर्ग बिस्मिल ॥

हर तरफ हैं कसाई इनसे न कुछ बसाई ।

तुझे घर की न रसाई कर कान मुर्ग बिस्मिल ॥

आजिज्ज को बात मानो उसी मेहरबानको जानो ।

मत बात अपनी ठानो कर कान मुर्ग बिस्मिल ॥

तू भार से लदा है खुद यारसे जुदा है ।

तेरा न हक अदा है क्या चीखता है गदहा ॥

कूड़ा कबाड़ खावें तो भी न होश आवें ।

वेददं हो लदावें क्या चीखता हैं गदहा ॥

दिनरात मार खाना उसही गलीमें जाना ॥

यह सब तेरे बिगानः क्या चीखता हैं गदहा ॥

धोबी कुम्हार लादा कहाँ तेरा बाप दादा ।

कहाँ मान और मर्यादा क्या चीखता है गदहा ॥