कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1223, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकर मीत से भित्ताई तदबीर यह बताई ॥
आजिज तुझे जताई क्या चीखता है गदहा ॥
पहिचान ले कसाई फिर नहीं गला कटाई ।
पञ्जे न उसके आई कर होश भेड़ बकरी ॥
गल कट्ट है जो तेरा इस घर किया है देरा ।
सुन व आज पन्द मेरा कर होश भेड़ बकरी ॥
पहिले न कहना माना हङ्कार दिलमें आना ।
खुद अकिल पर दिवानः कर होश भेड़ बकरी ॥
अब तो गला कटैगा क्रस्साब क्यों हठैगा ।
खुद ठाठ सो ठटैगा कर होश भेड़ बकरी ॥
आजिज खड़ा पुकारा तुम में जो हो कड़ारा ।
ले जो पुनह सहारा कर होश भेड़ बकरी ॥
अपनी जमाअत जोड़ै रिश्ता न जब तोड़ै ।
हरगिज न काल छोड़ै सुन बात ढक मकोड़े ॥
लशकर हजारहा है न शुमार कुछ कहा है ।
हरगिज न कोई हटावै आफ़ात ढक मकोड़े ॥
दौलत जखीरा सब है तेरी न रख वह रब है ।
जा ऐश और तरब है सदमात ढक मकोड़े ॥
क्यों ? जोड़ता जखीरा खूब यह वतीरा ।
आकर तुझे ले तौड़ें घर लात ढक मकोड़े ॥
पांवों तले तू पिस्ता तौ भी न तुझे दिस्ता ।
आकर तुझे ले तौड़ें घर लात ढक मकोड़े ॥
पांवों तले तू पिस्ता तौ भी न तुझे दिस्ता ।
आजिज की व आज सुन ले यह घात ढक मकोड़े ॥
बकरीका ग़ज़ल ।
सौ बार सिर कटाया तौ भी न होश आया ।
इस बार चेत भाई तू राम बोल बकरी ॥
अब तेरी क्या खता है क्यों तेरा शिर कटा है ।
तू घास फूस खाये तो राम बोल बकरी ॥
तुझपर जो जुल्म कर है, हकसे न उसको डर है ।