भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1226

साधुके निन्दकको कहीं ठौर नहीं है ॥ ४ ॥
साधुकी निन्दासे धरम करम नाश हो ।
साधुकी निन्दा से घोर नरक बास हो ॥
साधुकी निन्दा न मिहर रब्ब की आस हो ॥
साधुकी मिहर, आजिज, जम जौर नहीं है ॥
साधुके निन्दक को कहीं ठौर नहीं है ॥ ५ ॥

मुरब्बा भौरा ।

पिया परदेस क्या भौरा भयोरी ।
तु गाफिल होके सोई क्यों है बारी ॥
तु हरदम ताक बैठी अपनी पूरी ।
तु सतगुरुसे न क्यों करती चिरौरी ॥ १ ॥
कोई पायक पिया की खबर दे ।
विरहिनि जिसके बदले अपना सिरदे ॥
मेरी प्रीतमकी पाती आन धरदे ॥
तु सतगुरुसे क्यों न करती चिरौरी ॥ २ ॥
कोई मोहि प्राण प्यारेसे मिला दो ।
कि मुझ मुर्दा विरिहिनीको जिला दो ॥
जो गुल कुम्हालाया है सो फिर खिला दो ।
तु सतगुरुसे न करती क्यों चिरौरी ॥ ३ ॥
उसी सतगुरुकी सब कुदरत जहाँमें ।
वही हाजिरो दंरपरदः निहॉयें ॥
वही देखते जमीन् और आस्मोंमें ।
तु सतगुरुसे न क्यों करती चिरौरी ॥ ४ ॥
मेरे साहब, मैं तेरे पायलागी ।
तेरी कृपासे मेरी भाग जागी ॥
तेरेही मिहर आजिज हो सुभागी ।
तु सतगुरुसे क्यों न करती चिरौरी ॥ ५ ॥

तरजीयबन्द खम्सः कौआ ।

होके नाकारा तो पड़ते भूलौआ । दवें आराम हाड़ और चाम चौआ ॥
बनावे बात क्या वक़्ते चलौआ । अमरफल छोड़कर क्यों हो कोह कौआ ॥
तुझे हरिनामसे क्या काम कौआ ॥