भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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किया करता है तू गट गू, समझा नहीं तू मजंमूं ।
दिन चारमें कहाँ तू, हरिध्यान कर कबूतर ॥
ऐसी गिरह जो मारी, ऊपरको ले उडारी ।
वह जा नहीं तुम्हारी कुछ कानकर कबूतर ॥
आकासमें चढ़ाया हम जिन्स में बढाया ।
नहीं इल्म वह पढाया, गिरी आनकर कबूतर ॥
अपनी दिखाके बाजी लोगोंको करता राजी ।
यक दिन पकड़ ले क्राजी क्या मान कर कबूतर ॥
आजिजकी बात सुनले और मनमें अपने गुणले ।
सत्तनाम सबमें चुनलें पहचान कर कबूतर ॥
सुन सतगुरुकी वैना और समझ उनकी सैना ।
दिन चारमें तु हैना, सत्तनाम बोल मैना ॥
सीखी जबाँ केती, थी अकल तुझमें जेती ।
अबतक पकी न खेती, सत नाम बोल मैना ॥
बोली अजब बोला, सर काल कर कलोल ।
तब जाब कौन टोला, सत नाम बोल मैना ॥
पढ़ पढ़ जबाँ खपना, माने बिगानः अपना ।
दिन दो तीन होवे सपना, सत नाम बोल मैना ॥
आजिज तू छोड़ पिंजर, और रिश्तः तोंड़ पिबर ।
फिर फिर न जोड़ पिंजर, सत नाम बोल मैना ॥

तू तन मन धन लगाकर अपना गुरुपूज । क्रदमपर सिर झुकाकर अपना गुरुपूज ॥
न गुरु बिन हरिको पावे तु हरगिज । तू उस फर्मा बजाकर अपना गुरु पूज ॥
गुरुको मिहर पावेगा हरिको । सो साम्ना बनाकर अपना गुरु पूज ॥
गुरुको छोड़ हरिको ढूँढ अहमक । जहां पावे बुलाकर अपना गुरु पूज ॥
गुरु गोविन्दसे बढकर है बेशक । यही ईमान लाकर अपना गुरु पूज ॥
वचन कबीर साहबका यह आजिज । जहां होवे तू जाकर अपना गुरु पूज ॥
तु शमसे अपने रोयाकर विरिहिनी । मुंह आँसूसे तु धोया कर विरिहिनी ॥
उठें जब दर्द भारी तेरे अन्दर । कलेजा अपना टोयाकर विरिहिनी ॥
प्यारे बिन तेरा दुख कौन मेटे । तु अपनी जान खोयाकर विरिहिनी ॥
पपीहा ज्यों रटो अपना पिया पीय । मगुफ़लत ख़्वाब सोयाकर विरिहिनी ॥

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