कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1250, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसब मनुष्य एकही अच्युत परमात्माकी भक्तिका दावा रखते हैं। चाहे वह भूतही पूजते हों वा ईश्वरकी भक्ति करते हों। यदि किसीसे कहो कि, तू बुत्तपरस्त है, सच्चे अच्युत परमात्माकी भक्ति नहीं जानता, तो इस बातपर अवश्यही क्रोधित होया। हठसे कहेगा कि, मैं एकही परमात्माकी पूजा करता हूँ। इस बातके लिये प्रथम हिन्दूजातिकी ओर ध्यान देना चाहिये, जिसको प्रथम ईश्वरने वेद प्रदान किया उसके अनुसार ये चलने लगे। यद्यपि वेदके आशयको समझना बहुत कठिन है पर सब मतावलम्बियोंने अपने विचारानुसार मन्त्रोंके अर्थ किये, उसीपर सन्तोष करके बैठ रहे। अपनेको कृतार्थ समझ लिया। यह किसीको सुधि नहीं रही कि, वेदके अमुक मन्त्रका क्या अर्थ है? उसका यथार्थ आशय क्या है? जैसा जिस धर्मके आचार्योंने अर्थ किया, उनके अनुयायी उसीके अनुसार अनुकरण करते आये। अपने आचार्योंसे बढ़कर न किसीकी बुद्धि होती है, न प्रयत्न करके वह अपनी बुद्धिको फैलानाही चाहता है, क्योंकि, पक्षपातमें पड़कर हठ और दुराग्रहसे अपने आचार्यकोही सर्व शिरोमणि, सर्व गुणविद्या और ज्ञाननिधान जानता है, यदि उसको सारासार विचारणीय बुद्धि हो तो भ्रमकी ओर ध्यान न दे जो ऐसे पक्षपाती हैं उनको सत्यमार्ग भी बतलाओ, वह सत्य जान भी ले तो भी दुराग्रहसे उसे स्वीकार न करेंगे, बरन् उसी असत्यको पुष्ट और सिद्ध करनेके लिये नाना प्रकारकी युक्ती और प्रमाण लाते हैं। ऐसे मनुष्य नरपशु कहाते हैं।
सबसे प्रतिष्ठित और बड़े ब्रह्मा हैं उनको भी अद्वैत परमात्माकी बिलकुल सुधि नहीं है, यदि वो जानते तो दुःख सुखमें क्यों पड़े रहते? दूसरे सिद्ध हैं यदि वह अद्वैत परमात्माको जानते तो ऐसे छल कपट क्यों करते? दूसरोंको भी नष्ट करके आप क्यों नष्ट होते? तीसरे बड़े वेदपाठी शिव हैं, यदि उनको भी एक परमात्माका ज्ञान होता तो इतनी योग युक्ति करनेपर भी क्यों कामके वश होते? जितने ऋषि, मुनि, सिद्ध, साधु, सन्त, महन्त, इन्द्रियोंके वशमें विषय वासनाके बन्धनमें सांसारिक अभिलाषाओंके घेरमें पड़े हुये हैं, वे सब मायाके पुजारी हैं। अद्वैत परमात्माकी पूजा करके फिर कोई शारिरक कामनाओंमें बन्द नहीं होता, जितने लोग वेद अथवा किसी दूसरे आचार्यके पक्षपात में पड़े हुये हैं, सारासारका विचार नहीं करते, वे बन्धनमेंही रहेंगे, कभी मोक्षको प्राप्त नहीं होंगे; जैसे यारतके अनेक धर्मावलम्बीपक्षपातमें पड़कर सत्य परमात्माको भूल बैठे हैं वैसेही पश्चिम देशके सब अम्बिया, औलिया पीर और पैगम्बर परमात्माकी पूजासे अज्ञात हैं।