कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1251, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस पिण्ड और ब्रह्माण्डमें जो कुछ दृष्टि आता है सब माया है, माया पुरुष केवल कबीर है, उसको जो पहचाने अपना पति बनावे वही सोहागिन हो । जिस स्त्रीने उस पुरुषको न पहचाना, उसको अपना पति न बनाया वह सफल काम न होगी । स्त्रीके साथ जो स्त्रीका विवाह हो तो उसकी आशा पूरी कैसे हो सकती है ?
उपरोक्त चार पशु मेरी बातोंको नहीं समझ सकते । न इसके ऊपर विचारकर सकते हैं क्योंकि, उनको यथार्थ विचार और विवेक नहीं पशुबुद्धि है । वे देखनेही के मनुष्य हैं नहीं तो यथार्थमें पशु हैं, जिसको परमात्माने विवेक और मानुषिक बुद्धि दी है वे अज्ञानताके कामसे अवश्य अलग रहेंगे, पाशुबिक वासनाओंसे अवश्य वञ्चित रहेंगे । पशुओं, कञ्जरों और पामरोंके लिये लिये मेरा उपदेश दोधारा तलवार है । मुमुक्षुओंके लिये अमृत है ।
कितनेही लोग कहते हैं कि, कबीर साहबका नाम वेद और पुराणोंमें नहीं है, यदि वेद और पुराणमें होता तो हम कबीर साहबको मानते । इसी वास्ते कई एक मन्त्र वेदोंको कबीर साहबके विषयमें लिखा है, नहीं तो उसके लिखनेकी कोई आवश्यकता नहीं थी । सहस्रों ऋषि मुनि, जो सर्वदा एक समानही रहते हैं, जिनका कभी नाश नहीं होता, उनके ज्ञान और विद्याके प्रकाशमें सब तुच्छ हैं । वे सब ऋषि, मुनि, कागभूसुण्ड, कुष्ठम ऋषि और लोमश ऋषिके समान कबीर साहबकी स्तुतिमें लगे रहते हैं । फिर उनकी विद्याके सम्मुख दुसरोँकी विद्या कैसे ठहर सकती है । सूर्यके सामने जिस प्रकार दीपकका प्रकाश कुछ नहीं कर सकता उसी प्रकार ऋषि मुनियोंके ज्ञानके सामने किताबोंका ज्ञान तुच्छ है ।
जिस देश, जिस धर्म, जिस जाति, जिस मण्डलीमें सच्चे साधु और सच्चे गुरुकी सेवा, प्रतिष्ठा और आज्ञाकारिता नहीं हैं उसमें ज्ञान, भक्ति और सत्यजीवन भी नहीं है । वहाँके लोग मृतक हैं, जहाँ सन्त नहीं रहते जिस घरमें सन्त और अभ्यागतोंका सम्मान नहीं होता, उस घरमें भूत, प्रेत रहते हैं । जिस धन धान्यमें साधु गुरुका भाग नहीं वह अशुद्ध है, वह नष्ट हो जावेगा । जो देह साधु और गुरुकी सेवा नहीं करती वह नरकमें जावेगी । जो सुन्दरी सच्चे साधु और गुरुओंके उपदेशको नहीं सुनती बरन् उनसे परदा करती हैं, वह शूकरी और कूकरी होकर नङ्गी फिरा करेगी । जिस विद्या और बड़ाईको सन्त और गुरुका स्वत्व न दिया जावे वह नीचदशाको प्राप्त करावेगी । सब प्रकारकी