कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1252, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंभलाई साधु गुरुकी सेवाके आधारपर है, जहां साधु और गुरु नहीं वहां कुछ भी नहीं।
जो कोई कबीर धर्मकी शुद्धता और सत्यताका ज्ञाता बनना चाहता है, वो धर्मदास साहबके पुत्र चूडामण्णिदास साहबके स्थानापन्न महन्त और संत, जो विद्वान् सब भेदोंके जाननेवाले और स्वयम् उसके ऊपर चलनेवाले हों उनसे पूछलें। जो कोई धर्मदास साहबके धर्मको जाननेवाले, माननेवाले और उसके ऊपर चलनेवाले उसी गद्दीके सन्त महन्त होंगे उन्हींसे पूछनेका अधिकार होगा। नाममात्रके मूर्ख कबीर पन्थियोंसे पूछनेसे भेद न मिलेगा। क्योंकि, बहुत लोग अपनेको कबीर पन्थी बतलाते हैं पर यथार्थमें वे कबीरपन्थी नहीं हैं गुरु मुखता उनमें नहीं, मुखसे अपनेको कबीर पन्थी कहते हैं, पर कबीरसाहबकी आज्ञा और वाणीका आदर नहीं करते जो कोई केवल नामसेही अपनेको कबीरपन्थी कहने वालेके वचनों पर विश्वास करेगा, वह अवश्य धोखेमें पड़ेगा। इस कारण सोच बिचार कर विवेकद्वारा सत्सङ्ग करना उत्तम बात है। एवं दूसरे जो निष्पक्ष विद्वान् हों वे भी बता सकेंगे।
ईश्वर प्रेमियोंके उपदेश
जो लोग परमात्मासे प्रेम करते हैं, वे सब सामग्री और सुखोंको तुच्छ जानते हैं, उनकी समस्त सांसारिक वासनाएँ निवृत्त हो जाती हैं, किसी प्रकारकी कामना शेष नहीं रह जाती। संसारमें सबसे उत्तम राज्यसुख और राज्य माना जाता है, पर ईश्वरके सच्चे प्रेमी विरक्त पुरुष तीनलोकके राज्यको तुच्छ जानते हैं।
दृष्टान्त एक विरक्त किसी बनमें रहता था वह ईश्वरके प्रेममें मग्न संसारसे उदास, भक्तिमें रत था। एक दिन एक बादशाह उसी बनके मार्गसे कहीं जा रहा था। उसने महात्माको बैठा हुआ देखा। उनकी दरिद्रता और बाहरी हीनावस्था देखकर बादशाहने कहा—महाराज ! आप शहरमें चलो, वहाँ आपकी सेवा और भक्ति भली प्रकार होगी। विरक्तने कहा कि, संसार और संसारके सब सुख अति तुच्छ और मिथ्या हैं। बादशाहने कहा कि, संसारके सुखके तुल्य कोई भी सुख नहीं, आपने उसका आनन्द नहीं भोगा है इसी कारण उसका प्रतिवाद करते हो। संतने बहुत प्रकार समझाया पर बादशाहने एक बातभी न मानी, अपनी ही कहता रहा। संत चुप हो गये बादशाह अपने राज-महलको गया।