भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1253

एक समय बादशाहका पेट फूल गया, अपानवायु बन्द हो गई, अत्यन्त दुःखी हुआ बल्कि मृत्युके पास पहुँच गया । वैद्योंने बहुत औषधि की पर कुछ भी लाभ न हुआ । उसी समय उपरोक्त बनवासी विरक्त महात्मा भी आ पहुँचे । बादशाहने देखतेही दुःख भरी दृष्टिसे संतको नमस्कार किया । संतने कहा कि, ऐ बादशाह ! यदि तू इस समय अच्छा हो जावे तो उसके बदले मुझे क्या दे ? बादशाहने कहा कि, मैं करोड़ों रुपये देसक्ता हूँ । संत ने कहा कि, तेरी जानके सम्मुख ये करोड़ों रुपये कोई बात नहीं । बादशाहने कहा कि, मैं आधा राज्य दे दूंगा । संतने कहा कि, यदि तू अपनी समस्त बादशाहत देदे उसका दानपत्र लिखदे तो मैं तुम्हारा जान बचा दूंगा । बादशाहने विचार किया कि, क्या हुआ, यदि राज्य नहीं रहा तो क्या ? जीवन तो रहेगा । यह निश्चयकर कारबारियोंको आज्ञा दी कि, कागज लाकर दस्तावेज लिखो । दस्तावेज लिखा गया, बादशाहने हस्ताक्षर करके संतको दे दिया । संतने बादशाहके पेटपर हाथ फेरा, उसी समय अपान वायु निकली, बादशाह अच्छा हो गया । पश्चात् संतने कहा कि, यद्यपि अब तुझे बादशाहतसे कुछ सम्बन्ध नहीं रहा, क्योंकि, वो अब मेरी हो गई है । तो भी मैं इस तुच्छ राज्यको लेकर क्या करूँगा । इसपर तो अज्ञानी लोगही अभिमान किया करते हैं । इतना कहकर संत चले गये ।

ऐसे सहस्रों ही दृष्टान्त है कि, संतोंने तीनों लोकके राज्योंको तुच्छ समझकर त्याग दिये हैं क्योंकि, सांसारिक वैभव जितना बढ़ता है उतनाही भजनमें विघ्न होता है ।

भारत वर्षकी धार्मिकावस्था ।

पूर्वमें भारतवर्षमें रीति थी कि, प्रथम अपनी सन्तानको धर्मके साधारण नियमोंको सिखलाते थे, पीछे व्यवहारकी रीति बतलाते थे, जिसके कारण सबके अन्तःकरणमें धर्मकी आस्था बनी रहती थी । सब कोई धर्मकी अपेक्षा त्रिलोकीको तुच्छ जानते थे । वर्तमान कालमें प्रथमही अंग्रेजी फ़ारसी आदि व्यावहारिक भाषा तथा व्यावहारिक विद्या सिखाते हैं । पहलेसे अन्तःकरणमें धर्मका बीज तथा धर्मका ज्ञान न होनेसे लोग धर्मविमुख हो जाते हैं । जिनके अन्तःकरणमें धर्मकी आस्थाही नहीं वे गुरु संतोंकी सेवा भक्ति क्या करेंगे ? ऐसे धर्मकी आस्थासे हीन पुरुषोंकी आयु परिश्रमी पशुके समान व्यतीत होती है । वे आपको बुद्धिमान् ज्ञानी समझते हैं पर बुद्धिकी तो उनके पास गंधतक नहीं आती, मिथ्या धृष्टता और निलंजितामें अपनी आयु व्यतीत करते हैं ।