भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1251

इस पिण्ड और ब्रह्माण्डमें जो कुछ दृष्टि आता है सब माया है, माया पुरुष केवल कबीर है, उसको जो पहचाने अपना पति बनावे वही सोहागिन हो । जिस स्त्रीने उस पुरुषको न पहचाना, उसको अपना पति न बनाया वह सफल काम न होगी । स्त्रीके साथ जो स्त्रीका विवाह हो तो उसकी आशा पूरी कैसे हो सकती है ?

उपरोक्त चार पशु मेरी बातोंको नहीं समझ सकते । न इसके ऊपर विचारकर सकते हैं क्योंकि, उनको यथार्थ विचार और विवेक नहीं पशुबुद्धि है । वे देखनेही के मनुष्य हैं नहीं तो यथार्थमें पशु हैं, जिसको परमात्माने विवेक और मानुषिक बुद्धि दी है वे अज्ञानताके कामसे अवश्य अलग रहेंगे, पाशुबिक वासनाओंसे अवश्य वञ्चित रहेंगे । पशुओं, कञ्जरों और पामरोंके लिये लिये मेरा उपदेश दोधारा तलवार है । मुमुक्षुओंके लिये अमृत है ।

कितनेही लोग कहते हैं कि, कबीर साहबका नाम वेद और पुराणोंमें नहीं है, यदि वेद और पुराणमें होता तो हम कबीर साहबको मानते । इसी वास्ते कई एक मन्त्र वेदोंको कबीर साहबके विषयमें लिखा है, नहीं तो उसके लिखनेकी कोई आवश्यकता नहीं थी । सहस्रों ऋषि मुनि, जो सर्वदा एक समानही रहते हैं, जिनका कभी नाश नहीं होता, उनके ज्ञान और विद्याके प्रकाशमें सब तुच्छ हैं । वे सब ऋषि, मुनि, कागभूसुण्ड, कुष्ठम ऋषि और लोमश ऋषिके समान कबीर साहबकी स्तुतिमें लगे रहते हैं । फिर उनकी विद्याके सम्मुख दुसरोँकी विद्या कैसे ठहर सकती है । सूर्यके सामने जिस प्रकार दीपकका प्रकाश कुछ नहीं कर सकता उसी प्रकार ऋषि मुनियोंके ज्ञानके सामने किताबोंका ज्ञान तुच्छ है ।

जिस देश, जिस धर्म, जिस जाति, जिस मण्डलीमें सच्चे साधु और सच्चे गुरुकी सेवा, प्रतिष्ठा और आज्ञाकारिता नहीं हैं उसमें ज्ञान, भक्ति और सत्यजीवन भी नहीं है । वहाँके लोग मृतक हैं, जहाँ सन्त नहीं रहते जिस घरमें सन्त और अभ्यागतोंका सम्मान नहीं होता, उस घरमें भूत, प्रेत रहते हैं । जिस धन धान्यमें साधु गुरुका भाग नहीं वह अशुद्ध है, वह नष्ट हो जावेगा । जो देह साधु और गुरुकी सेवा नहीं करती वह नरकमें जावेगी । जो सुन्दरी सच्चे साधु और गुरुओंके उपदेशको नहीं सुनती बरन् उनसे परदा करती हैं, वह शूकरी और कूकरी होकर नङ्गी फिरा करेगी । जिस विद्या और बड़ाईको सन्त और गुरुका स्वत्व न दिया जावे वह नीचदशाको प्राप्त करावेगी । सब प्रकारकी