कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1269, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंनन्दके अभिलाषी चाहे पठित अथवा अपठित कैसे भी क्यों न हो सब समानही हैं। जबतक मनुष्य विषयवासनाकी कामना देहाभिमान और जगतकी आपत्तिको उठा न दे तब तक भजनानन्द प्राप्त नहीं कर सकता। ईश्वरकी भक्ति और भजनमें ब्रह्मज्ञान नहीं मिल सकता जिसको ब्रह्मज्ञान न प्राप्त हो उसकी ब्रह्मज्ञानविषयक बातें करनी मिथ्या और मूर्खता है।
कर्मकाण्ड, योग, उपासना, ज्ञान ये चारों ब्रह्मज्ञानरूपी अटारी पर चढ़ने की सीढ़ीके ढण्डे हैं। विद्याभिमानी पहलेही (कर्मकाण्ड) ढण्डेपर खड़े हैं उनको चौथे ज्ञानके ढण्डेकी क्या सुधि है? सन्त तो चारों ढण्डोंके पार पहुँचे हैं। वे माकूलातके आशयको भली प्रकार समझते हैं। दूसरोंकी क्या शक्ति है कि उसके यथार्थको सङ्गम सकें? वे अपनी क्षुद्र बुद्धिके अनुसार अर्थ लगाते हैं। जैसी बुद्धिसे अर्थ लगाते हैं वैसेही उसका फल पाते हैं। अपनी बुद्धि और समझसे बढ़ कर कहाँसे लावें? और क्या लिखें?
८ प्रश्न—यथार्थ क्या है? उसको प्रगट क्यों नहीं करते? क्योंकि, सभी सत्यके चाहनेवाले हैं। सत्यको पुकार २ कर कहना चाहिए, जिससे सब लोग उसको जानकर सत्यपथ पर चले हुए मुक्ति पावें।
उत्तर—जो सत्य है वह असत्यके ओटमें इस प्रकार छिपा हुआ है कि, उसको देखते हुये भी नहीं देखते। जो सत्यकी इच्छा करेगा, उसके प्राप्त करनेका अधिकारी होगा उसको सत्य दिया जायेगा। सत्यका मार्ग कठिन जानकर उससे भागते हैं असत्यको स्वीकार करते हैं। मनुष्य पक्षपातमें पड़जाता है तो नीचसे नीच, निषेधसे निषेध कार्य्यको अज्ञानता वश नहीं छोड़ना चाहता। सत्य तो प्रत्यक्ष प्रगट सब स्थानमें सर्वदा पुकार रहा है पर असत्यके प्रेमी उसके परम तेजको नहीं सह सकते। सत्य प्रत्यक्ष, और प्रगट होने पर भी ऐसा गुप्त है, जैसे जबहरि-योंकी दूकान पर रत्न पेटियोंमें बन्द रहता है पर उसके ग्राहक जभी आते हैं तभी पेटी खोलकर उसको देखाते हैं। जो पारखी है उनके लिये रत्न सर्वदाही प्रत्यक्ष होता है। यद्यपि रक्षाके लिये पेटीमें रखा हो तो क्या? जो पारखसे रहित हैं उनके लिये यदि रत्नको बाहरही रखा जावे तब भी उनको कुछ लाभ नहीं हो सकता। इस कारण उचित है कि, जब कोई रत्नपारखी मिले तभी उसका सन्दूक खोलना चाहिये। हर एकके सामने खोलना ठीक नहीं, क्योंकि, सबके सामने खोलनेसे भय है कि, चोर डाकू नष्ट कर दें।
शब्द—जो कोई रत्न पारखी पेंये, हीरा जाय भँजये।
पलरा मूल तत्वकी ढाँडी, प्रेमको बांट बनये॥