भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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१०—प्रश्न प्यारेकी मिलनेकी क्या युक्ति कौनसी—करनी चाहिये ?

उत्तर—प्रथम सच्चे धर्म (महजब) की खोज करनी चाहिये, फिर उसके सन्तोंकी सेवा और सङ्ग करना चाहिये जब साधुओंमें कोई ऐसा दृष्टि आवे कि, जो धर्मके मार्गको भलीप्रकार बतला सकता हो, संशयको दूर कर सकता हो, पारखपदको दिखला सकता हो आत्मज्ञानका मार्ग सुझा सकता हो तो, ऐसे सन्तको पाकर अपनेको धन्य जाने उसीको गुरु बनावे । श्रद्धा और प्रेमके साथ गुरुकी सेवा भक्ति करे उससे कभी न फिरे । गुरु करनेके पीछे उससे श्रद्धाहीन हो जानेकी अपेक्षा पहलेही गुरुको भली प्रकार पहचान कर उसके गुणदोषकी परीक्षा कर लेना चाहिये । गुरु करलनेके बाद पीछे दोषदृष्टी उचित नहीं । अपने गुरुके चरणकी धूल हो जाना उचित है । इस बातको श्रद्धा और विश्वास पूर्वक भली प्रकार निश्चय रखे कि, गुरुकी कृपासे गोविन्द मिलेगा गुरुकीही मूर्तिमेंसे गोविंद प्रगट होगा ।

शब्द—साईं तेरा अर्श तख है दूर ।

विन मुरसिद कोई भेद न पावे, भटकि मुये सब कूर ॥

चौदह तबक ख्वाबकी रचना, आतशकासा फूल ।

राज छोड़ि जिन काज किया है, भये चरणकी धूल ॥

नासूतमें माया खड़ी, मलकूत गुण अस्थूल ।

जो कोई निजको समझे बूझ, तामें नाहिं शऊर ॥

जबरूतमें सब यम जाल है, लाहूत अक्षर फूल ।

हाहूतमें अचिन्त पुरुष, बजत अनहद तूर ॥

वेद पुराण कुराण किताबा, यहां लगि खबर जहूर ।

सोहं इच्छा वहांसे आई, सब घट व्यापक नूर ॥

सब जीवनको त्रास देखिये, समरथ वचन कुबूल ।

कहे कबीर हम खुदके अहदी, लाये हुकुम हजूर ॥

११ प्रश्न—गुरु और चेलेकी पहचान, क्या चिन्ह और है ?

उत्तर—गुरुके चार लक्षण हैं । चेलेके भी चार चिन्ह हैं । गुरुके चार चिन्ह ये हैं कि, १—पूर्ण भक्तिसे सम्पन्न हो, २—अपने धर्म ग्रन्थ तथा शास्त्र और वेदोंके आशयको समझनेवाला हो, ३—समदृष्टि अर्थात् ईश्वरको सबमें


१ पीछे छवि अर्थ किया था जो तात्पर्यार्थ है क्योंकि जब अनहद बाजे बजेंगे तबही अनहदकी छवि सुन पड़ेगी ।