भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1279

परमाणुमें अपनी दश पीढ़ी तक तीनों लोकका राज्य किया यह असंभव कैसे सम्भव हो सकता है ।

उत्तर—यह सारा संसार निर्मूल झूठ है इसमें कुछ भी सत्य नहीं है यह जीव जैसा सङ्कल्प करता है वैसाही इसके सन्मुख देख पड़ता है, दृढ़ सङ्कल्प, होनेसेही इसकी कामना पूर्ण होती है । यह सारा ब्रह्माण्ड एक परमाणुमें है, समस्त ब्रह्माण्डमें एक परमाणु है। जैसे समुद्र एक बुन्दमें है और एक बुन्दमें समुद्र है । जैसे ब्रह्माण्ड और परमाणु कुछ नहीं वैसेही समुद्र और बुन्द कुछ नहीं हैं । यह सब मायाके कौतुक हैं । माया सर्वशक्तिमतीप है जो चाहे तो एक परमाणुमें अनन्त ब्रह्माण्ड दिखादे और अनन्त ब्रह्माण्डोंको एक परमाणुमें लिखलावे । सहस्रों वर्षको एक क्षण और एक क्षणको सहस्रों वर्ष प्रतीत करावे । मायाका भेद किसीने नहीं पाया, सारे सिद्ध, साधु, पीर, पंगम्बर इसीमें पड़े गते खाते हैं किसीको पता नहीं लगता ।

जाकी गति ब्रह्मै नहिं पायो शिव सनकादिक हारे ।

ताकी गति नर कैसे पड़ही कहैं कबीर विचारे ॥

२८ प्रश्न—ईश्वरका प्रमाण—जो सारे संसारका ईश्वर है उसका प्रमाण किस प्रकारका हो सकता है ?

उत्तर—ईश्वर सबसे श्रेष्ठ है, उसको सिद्ध कर तो लिया सांसारिक बुद्धिज्ञान, अनुमान आदि सब निष्फल हैं । उसके लिये युक्ति प्रमाण सब तुच्छ हैं । यह प्रश्न तुम्हारा ऐसा है जैसे किसी एक नपुंसकको कोई एक तलवार देकर कहे कि, सारे । संसारको विजयकर आ, जैसे मच्छर बाज और शाहीनको मारे उसी तरह अगम अगोचर परमात्माकी सिद्धि में प्रमाण और बुद्धि लगाना है । समस्त सिद्ध साधु और विद्वान् मण्डली आदिसे अन्ततक सर्वदा ईश्वरके यथार्थ स्वरूपको प्रगट करनेमें असमर्थताही प्रगट करते रहे हैं ।

इसीपर अगस्तीन—नामका एक पादरी इस्त्री सनके ४०० में वर्तमान था वह बड़ा बुद्धिवान्, विद्वान् और धीर था । एकवार उसके मनमें ऐसी कल्पना उठी कि, ईश्वरने संसारमें पापको क्यों उत्पन्न किया ? वह सर्वशक्तिमान है, शैतानको उसने क्यों न बरजा ? यदि चाहता तो शैतानका नाश भी कर देता तथापि शैतानको न रोका, इसका क्या कारण है ! इसी प्रकार नानाप्रकारका संकल्प विकल्प करता, सोचता, विचारता, फिरता समुद्रके तटपर पहुंचा । वहाँ उसने देखा कि एक बालक किसी पक्षीके अण्डेका छिलका लिये हुये, उसीमें पानी भर-भर कर समुद्रसे बाहर एक छेदमें भरता है । वारंवार उस बालकको ऐसा करता