कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1287, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाकी निन्दा सुने जो कोई । जाको रुचे सो जाय विगोई ॥
माला तिलक साहबको बाना । जाहि देखि यम काल डराना ॥
साखी— माला तिलक निन्दा करें, ते प्रगट यमदूत ।
कहैं कबीर विचारिके, तेई राक्षस भूत ॥
द्वादश तिलक बनावई, अगँ अगँ अस्थान ।
कहै कबीर विराजही, उज्वल हंस अमान ॥
५७ प्रश्न—पारख गुरु प्राप्त होनेकी युक्ति बताइये ।
उत्तर—गुरुकी सेवा तन मन धनसे करना, उसकी आज्ञासे कभी बाहर न जाना । गुरुके समान साधुकी सेवा भक्ति करनी और साधुमें किसी प्रकार भेद दृष्टि न करनाही पारख गुरुके मिलनेका सहज मार्ग है । इसी प्रकार साधु गुरुके सेवा करते २ गुरुमेंसे ही पारख गुरु प्रगट हो जावेगा । जैसे फूलमेंसे सुगन्धि निकल पड़ती है ।
५८ प्रश्न—स्वसंवेदसे वेदका प्राकट्य, आपने कहा कि, उत्पत्तिसे प्रथम चार वेद प्रगट हुये, स्वसंवेद कबीर साहबने पीछेसे कहा, फिर स्वसंवेदसे वेदका प्रागट्य कैसे माना जाय ?
उत्तर—माया सृष्टिसे प्रथमही स्वसंवेद था उसीसे निकालकर चार वेद व्यक्त हुए मायासृष्टिके पहले जीवसृष्टि और ब्रह्मसृष्टि दो सृष्टि थीं उसमें स्वसंवेद था स्वसंवेद स्वयम् सत्पुरुषका वचन है । उसके प्रथम कोई नहीं है । वेदके आदिमें स्वसंवेद था, अंतमें भी वही रहेगा, वही सर्वदा रहता है ।
५९ प्रश्न—भजनकी विधि, भजन किस प्रकार किया जाता है ? उसकी कितनी रीतियाँ हैं ?
उत्तर—साधारण नियम यह है कि, अपने गुरुकी आज्ञानुसार भजन कर-गुरु भक्ति, साधु सेवा तथा तपस्यामें स्वयम् मग्न हो जाना ॥
? सत्य पुरुषके लोकमें पहुँचानेवाली विद्याको परा विद्या या स्वसंवेद कहते हैं वो भी वेदोंमेंही है ज्ञान चिन्तामें वही प्रधान है इस कारण प्रधान पहिला एवं अप्रधान पीछे कहा जा सकता है । क्योंकि, जो जिसके कार्योंमें न आवे वो उसके जाने पीछाही है इसी प्रकार जो कबीर दर्शनमें परा विद्या विषयक साहित्य है वो तो उसी समयका कहा जा सकता है उसका वर्ण विन्यास भी उसी समयका होगा यह शब्द आदिमें उर्दू आदि आज कालकी भाषाओंके शब्दोंको देखनेसे जाना जाता है पर उसका जो परा विद्या विषयक तात्पर्य है वो ही स्वसंवेद कहला सकता है उसेही ज्ञान चिन्तावाले मुख्य कह सकते हैं एवं तात्पर्य मुख्य है वही स्वसंवेद है अन्य नहीं ।