भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1286

यह वैष्णव भेष भक्ति मुक्तिका चिन्ह है। कंठी तिलक और माला तथा उज्वल वस्त्रादि जो कि, वैष्णव रखते हैं यह मुक्तिका चिन्ह है। जलका रंग श्वेत है, सब रंगोंका मूल यही रंग है। यही सत्गुणका चिह्न एवं दयाका रूप है। जहां यह भेष होता है वहां दया तो आगे पताका लेकर चलती है। यह वैष्णव भेष दयाका भण्डार इसी भेषमें दयाका निवास है।

इस भेषके विषयक एक कथा।

एक मछुआ मछली मारनेके लिये नदीमें जाल डाले हुये बैठा था इतनेमें एक राजाकी सवारी सह सैन्य उधर आ निकली। सैन्यको देख मछुआ डर गया कि, राजा मुझे अवश्य दण्ड देगा। क्योंकि वह वैष्णव था। मछुयेका नाम कालू था, उसने अपने जालमें लगे हुये मुद्रियोंका तो मनिका बनाया और जालसे धागा ले एक माला बनायी, मिट्टीका तिलक लगाकर जालको पानीमें छिपा माला फेरने लगा। इतनेमें राजाकी सवारी आगई। राजाने देखा कि, कोई साधु बैठे भगवत्नाम जप रहा है। भक्ति पूर्वक उसके निकट जाकर राजा नमस्कार कर कुछ भेंट रखकर चल दिया, राजाकी देखादेखी सब सेना भरके लोगोंने पूजा भेंट चढ़ाई। नदी पार उतर चले जानेपर कालूने आँख खोलकर देखा। अपने आगे नाना प्रकारके वस्त्र और द्रव्यादि पदार्थोंका ढेर देख मनमें विचार करने लगा कि, जब मैंने केवल ढोंग करके भयसे वैष्णवका स्वाँग बनाया था तो मेरी इतनी प्रतिष्ठा हुई। यदि मैं सच्चा वैष्णव बन जाऊँ तो न मालूम मुझे क्या फल मिलेगा? ऐसा विचार कर कालू उसी समय हृदयसे मछुएका काम छोड़ दिया वैष्णव हो यह दोहा कहा—

दोहा— बाना बड़ा दयालका, छाप तिलक उर माल।

यम डरपे कालू कहे, भय माने भूपाल ॥

उसी दिनसे कालू सब औगुणोंको त्यागकर सच्ची वैष्णवताको प्राप्त कर, परमानन्दमें मग्गन हो गया।

इसी पर कबीर साहबकी—पुस्तकोंमें भेषकी महिमा बहुत लिखी है,

चौ०— माला तिलक मनोहर बाना। जाकी महिमा सकल बखाना ॥

राजस यज्ञ करे जब राजा। माला तिलक बिनु घण्ट न बाजा ॥

माला तिलक जब आन बिराजा। शंख पञ्चायन तबही बाजा ॥

तब यह महिमा प्रगटहि जानी। अपने मुख कहि शारंग पानी ॥

जाकी महिमा अगम अभेवा। निगुरा कहैं जाने गुरु सेवा ॥

निगुरा निज मुख निन्दा करई। ढोल बजाय नरकमें परई ॥